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दिव्यांग बेटे को पीठ पर बैठा कर रोज पहुंचाती है स्कूल

प्रकाशित: 08-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
गोपाल दास बंसल
शहडोल । जिले के झींक बिजुरी गांव में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाला राजकुमार जायसवाल शारीरिक परेशानी के कारण ठीक से चल-फिर नहीं पाता। स्कूल पहुंचने के लिए उसकी मां फूल कुमारी रोज उसे अपनी पीठ पर बैठा कर घर से बस स्टैंड और फिर स्कूल तक ले जाती हैं। दरशिला गांव से स्कूल करीब 10 किलोमीटर दूर है और आने-जाने में करीब 50 रुपये बस किराया खर्च होता है। जिले के झींक बिजुरी गांव से सामने आई है। यहां 12वीं कक्षा में पढ़ने वाला राजकुमार जायसवाल शारीरिक परेशानी के कारण ठीक से चल-फिर नहीं पाता। स्कूल जाने के लिए उसे अपनी मां की पीठ का सहारा लेना पड़ता है। मां रोज बेटे को अपनी पीठ पर बैठा कर घर से बस स्टैंड तक और फिर स्कूल तक पहुंचाती है। राजकुमार शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झींक बिजुरी में पढ़ता है। दरशिला गांव से स्कूल की दूरी करीब 10 किलोमीटर है। आने-जाने में करीब 50 रुपये बस किराया भी खर्च होता है। घर में मां और बेटे के अलावा कोई नहीं है। ऐसे में बेटे की पढ़ाई जारी रखने की जिम्मेदारी भी मां के कंधों पर है। राजकुमार की शारीरिक स्थिति ऐसी है कि उसे चलने-फिरने में काफी परेशानी होती है। स्कूल जाने के लिए उसे किसी सहारे की जरूरत पड़ती है। लेकिन गरीबी और परेशानी के बावजूद उसकी मां ने बेटे की पढ़ाई नहीं रुकने दी। वह कभी उसे पीठ पर उठाकर तो कभी सहारा देकर स्कूल तक पहुंचाती है। बस स्टैंड से घर और स्कूल तक बेटे को अपनी पीठ पर लेकर आना-जाना मां की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। एक ओर घर की जिम्मेदारी है तो दूसरी ओर बेटे के भविष्य की चिंता। इसके बावजूद मां का हौसला कम नहीं हुआ।
राजकुमार की इच्छा है कि उसे एक इलेक्ट्रिक साइकिल मिल जाए, ताकि वह खुद स्कूल आ-जा सके और अपनी मां पर निर्भर न रहे। उसका कहना है कि अगर इलेक्ट्रिक साइकिल मिल जाती है तो वह बिना किसी पर निर्भर हुए अपनी पढ़ाई जारी रख सकेगा। राजकुमार ने प्रशासन से भी मदद की गुहार लगाई है। 11 सितंबर को झींक बिजुरी में जन विश्वास शिविर आयोजित होना है। राजकुमार को उम्मीद है कि शिविर में उसकी समस्या प्रशासन तक पहुंचेगी और उसे इलेक्ट्रिक साइकिल उपलब्ध कराने की पहल होगी। राजकुमार की कहानी सिर्फ एक दिव्यांग छात्र की परेशानी नहीं, बल्कि एक मां के संघर्ष की कहानी भी है। जिस उम्र में बच्चे अपने पैरों पर चलकर स्कूल जाते हैं, उसी उम्र में राजकुमार अपनी मां की पीठ पर बैठ कर शिक्षा का सफर तय कर रहा है। मां के लिए बेटे को उठाना शायद शारीरिक रूप से कठिन हो, लेकिन उसके भविष्य के सामने यह तकलीफ छोटी है। बेटे की आंखों में पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का सपना है और मां उस सपने को अपनी पीठ पर उठाकर हर दिन स्कूल तक पहुंचा रही है। अब जरूरत सिर्फ इतनी है कि प्रशासन और समाज इस मां-बेटे की पुकार सुने। एक इलेक्ट्रिक साइकिल राजकुमार के लिए महज साधन नहीं होगी, बल्कि उसकी आत्मनिर्भरता, शिक्षा और भविष्य की राह आसान करने वाला सहारा बनेगी।