हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण
प्रकाशित: 14-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
पिछले दिनों बकरीद के अवसर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री मुख्तार अब्बास नकवी जी को बकरीद की हार्दिक शुभकामनाएं देने गया। इस दौरान नकवी साहब से मेरी आने वाली अगली पुस्तक जो हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण पर चर्चा होने लगी और इस चर्चा में श्री ऩकवीने मनुस्मृति में कर्म के आधार पर दी गई वर्ण व्यवस्था की तारीफ करते हुए बताया की मनु के वर्ण व्यवस्था से हमको परंपरागत रूप में दक्ष कारीगर मिल जाते थे जैसेलोहार, सोनार, बढ़ई, नाई, बुनकर दर्जी या अन्य कार्यों के लिये बगैर किसी ट्रेनिंग के दक्ष कारीगर मिल जाया करते हैं और यह प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, यद्यपि मनुस्मृति में महिलाओं और शूद्रों की शिक्षा व धर्म ग्रंथो पर जो प्रतिबंध था उसको जायज नहीं ठहराया जा सकता, फिर भी मुझे नकवी जी के तर्कों में दम लगा और मुझे उचित प्रतीत हुआ कि इस समय हिंदू धर्म में सवर्ण बनाम दलित पिछड़े का जो विवाद चल रहा है उस पर विस्तार से चर्चा की जाए, वैसे सभी लोगों को यह पता होगा कि मुख्तार अब्बास नकवी देश के उन गिने चुने नेताओं में से एक है जिसके यहां ईद -' होली- दिवाली उसी उत्साह से मनाई जाती है।
हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था एक ऐसा विषय है जो प्रारंभिक काल से आज तक विद्यमान है। प्रारंभ में वर्ण व्यवस्था समाज के विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से करने के लिए निर्धारित की गई थी पर वही वर्ण व्यवस्था हिंदू समाज में आज तनाव का कारण बनी हुई है और जब से सोशल मीडिया आया है तब से दलित बनाम सवर्ण का विवाद अपने विकराल रूप में आ गया है, जिसे रोका जाना अत्यंत आवश्यक है इसके लिए हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों को हिंदू धर्म के मर्म को जाना आवश्यक है। आज हिंदू दलितों को राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू तो मान लेते हैं पर उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते, वहीं दलित अपने आप को हिंदू नहीं मानते पर संविधान में प्रदाता आरक्षण कल का लाभ लेने के लिए अपने आप को हिंदू कहते हैं इस कारण हिंदुत्व के मौलिक स्वरूप को जानना अत्यंत आवश्यक है।
हिंदुत्व प्राचीन काल से भारतीय समाज की संस्कृत व संस्कारों की रक्षा करता रहा है वेद, पुराण, हमारे अन्य ग्रंथ धर्म ग्रंथ हमारी संस्कृति के मौलिक स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं, वास्तव में हिंदू धर्म हमें नीति बद्ध तरीके से चलकर सुकर्म करते हुए जीने की कला सिखाता है स्वस्थ समाज के निर्माण में धर्म का पालन आवश्यक है इसके बिना एक स्वस्थ आदर्श समाज का निर्माण नहीं हो सकता।समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म का पालन करें जैसे समाज में पिता का धर्म, पुत्र का धर्म, राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, शिक्षक का धर्म, विद्यार्थी का धर्म निश्चित कर दिए गए हैं यदि इनमें से कोई भी अपने धर्म से विमुख होता या अपने धर्म का अपामण करेगा तो समाज में अराजकता व्याप्त हो जाएगी जैसे आजकल हिंदू समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, पंच वर्ण दलित समाज के टकराव के कारण हिंदू धर्म पतन की ओर जा रहा है लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या तो पाखंडवाद की ओर जा रहे हैं या वे नास्तिक हो रहे हैं जबकि समाज अपने शैशवकाल से आज तक धर्म सापेक्ष रहकर एक सुंदर समाज के रूप में विद्यमान है धर्म से ही मानव जीवन में नैतिक मूल्य और संस्कारों का रोपण होता है और धर्म से ही मानवता अभी संचित व अभिसंचित होती है। समाज में विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से चलने के लिए वर्ण व्यवस्था निश्चित की गई गीता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है की चार वर्णों का निर्माण कर्म और योग्यता के आधार पर निर्धारित किया गया परंतु कालांतर में यह कब जन्म पर आधारित हो गया यह शोध का विषय है। प्रारंभ में हिंदू धर्म में चार वर्ण अस्तित्व में आए- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को कर्मों के अनुसार बांटा गया ब्राह्मण का मुख्य कार्य यज्ञ करना वेद पढ़ना और उनका अध्ययन करना था तथा आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में शिक्षा देना एवं पुरोहित के रूप में समाज में आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करना था। वे कानून और न्याय प्रणाली के विशेषज्ञ माने जाते थे तथा कानून और न्याय के मामले में उनका परामर्श लिया जाता था, परंपरागत रूप से ब्राह्मण को सामाजिक वर्गों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, क्षत्रिय पदापाम में ब्राह्मण के बाद आता था। क्षत्रिय वर्ण के लोगों का काम गांव कबीलों को राज्य की रक्षा करना था मनु के अनुसार इस वर्ण के लोगों का कर्तव्य वेद अध्ययन, प्रजापालन दान और दक्षिणा करना तथा विषय वासना से दूर रहना था वशिष्ठ ने इन लोगों का मुख्य व्यवसाय अध्ययन शास्त्रअभ्यास और प्रजापालन बताया है।
हिंदू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य समाज वर्णाश्रम का तीसरा स्तंभ था इसको लक्ष्मी पुत्र भी कहा जाता था, ऐसा माना जाता है कि वैसे समाज की 90ज्ञ् जातियां पहले क्षत्रिय थी और वर्ण व्यवस्था का चौथा वर्ण शूद्र पदानुक्रम क्रम में चौथे स्थान पर था, शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था वेदों में शूद्रों को सेवा करने वाले और श्रमिक के रूप में प्रस्तुत किया गया वह अपने श्रम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था उस पर अनेक प्रतिबंध थे पर वे अछूत नहीं थे। प्रसिद्ध अर्थशास्त्राr राष्ट्रवादी चिंतक डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था की व्युत्पत्ति के लिए हिंदू धर्म में स्थानांतरण को दोषी मानते हैं, वे कहते हैं कि दलितों की व्युत्पत्ति 5000 साल के हिंदू काल में नहीं हुई, बल्कि 800 वर्षों के मुस्लिम शासन 200 वर्षों के अंग्रेज शासन के दौरान जिन्होंने जजिया कर नहीं दिया और ना ही धर्मांतरण किया उन्हें मैला ढोने और मरे हुए पशुओ को ढोने व उनकी खाल उतारने तथा उनका मांस खाने के लिए विवश कर दिया गया और वे अछूत बन गए! वास्तव में ये लोग कट्टर हिंदू थे जिन्होंने उपेक्षित और अपमानित होने के बावजूद न तो मुगलों की गुलामी स्वीकार की और न ही धर्म परिवर्तन किया तथा हिंदू बने रहे, वे शूद्र व दलित मूलत ब्राह्मण और क्षत्रियों के वंशज हैं जिन्होंने हिंदू वर्ण व्यवस्था में जाति पदापाम से बाहर होना स्वीकार किया लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया, आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए उन्हें कोटिश प्रणाम करना चाहिए कि उन्होंने भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया भले ही उन्होंने अपमान और दमनझेला और आज भी झेल रहे हैं।
प्रसिद्ध लेखक शेयरिंग एम एम ने अपनी पुस्तक हिंदू कास्ट एंड ट्राइब्स में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत के निम्न अछूत जाति के लोग कोई और नहीं बल्कि ब्राह्मण और क्षत्रिय थे एक और लेखक स्टेकर राइट्स ने अपनी पुस्तक" कस्टम्स एंड देयर ओरिजिन "में लिखा है कि दलित जातियां वे हैं जो मुगलो से हारी तथा मुगलों ने उन्हें अपमानित करने के लिए मानवाने तरीके से उनसे गंदे से गंदे काम करवाएं, पार आश्चर्य इस बात का है की 1857 में मुगल साम्राज्य का अंत हो गया और 1947 में देश हजार वर्ष की गुलामी के बाद आजाद हो गया पर मुसलमानो द्वारा चलाए बनाए गए दलितों के साथ बार-बार अमानवीय घटनाएं उन हिंदुओं द्वारा दी गई जो इस देश के गुलाम बनने से पूर्व उन्हीं के वर्ण के थे। विगत कुछ वर्षों से देश में जिस प्रकार से जातिवादी हिंसा की घटनाएं हो रही है वह चिंता का विषय बनी हुई है, वर्ण विशेष के कुछ लोग जिन्हें वेद पुराण उपनिषद और स्मृतियों के विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है वे भारत को हिंदू राज बनाने की आड़ में दलित और उनके आदर्श डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं, इन अज्ञानी लोगों को इस बात का आभास नहीं है कि दलित अछूत और पिछड़े समुदाय के लोग यदि हिंदू धर्म से अपने आप को अलग कर ले तो क्या 15ज्ञ् आबादी वाला सवर्ण हिंदू समाज हिंदू धर्म प्रतिनिधित्व कर सकेगा, ऐसे लोगों की मनसा यदि पूरी हो गई तो हिंदू राष्ट्र की स्थापना तो दूर हिंदू धर्म का ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जो हिंदू धर्म लगभग 1000 वर्षों की गुलामी के बावजूद भी अपने आप को सुरक्षित रखने में सफल रहा इन स्वयंभू राष्ट्र भक्तों के कारनामों के कारण समाप्त होने की कगार पर है आवश्यकता इस बात की है कि हिंदुस्तान का हर नागरिक स्थिति को माने की हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी कोई भी व्यक्ति एक जाति विशेष में जन्म लेने से ब्राह्मण नहीं हो जाता है, न क्षत्रिय हो जाता है ना वैश्य हो जाता है और नीचे अछूत हो जाता है पर भारत में महार जाति में जन्म लेने के कारण अपने समकालीन नेताओं में सबसे शिक्षित डॉ. आंबेडकर दलित नेता की पहचान से बाहर नहीं निकाल पाए।
वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्र स्थापना के फर्जी झंडा वरदार सीमा पार से और सीमा कें अन्दर से गैर हिंदुओं द्वारा चलाए जा रहे आतंकवाद का विरोध करने के बजाय हिंदू धर्म के पंच वर्ण (दलित) और उनके महापुरुष डॉ भीमराव अंबेडकर के अस्तित्व को समाप्त करने की बात कर रहे हैं और इसके जवाब में बहुजन समाज भी हिंदू धर्म और उनके आराध्य देवी देवताओं का विरोध कर रहे हैं जब कि इस विवाद से हिंदू धर्म को ही हानि पहुंचेगी।इस बात को ध्यान देने की जरूरत है कि हिंदू धर्म में विकृतियां समाप्त हो और हिंदू धर्म में चाहे अनचाहे जो पंच एकी स्थापना हो गई है उसे न छूना, मंदिर में उसका प्रवेश न होना, उनके शादी विवाह में घोड़ी पर न चढ़ने देना जैसी कुरीतियों को बंद किया जाए और उन्हें अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार हिंदू के रूप में बराबर का अधिकार दिया जाए इससे भारतीयता और हिंदुत्व दोनों मजबूत होंगे।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)
पिछले दिनों बकरीद के अवसर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री मुख्तार अब्बास नकवी जी को बकरीद की हार्दिक शुभकामनाएं देने गया। इस दौरान नकवी साहब से मेरी आने वाली अगली पुस्तक जो हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था और धर्मांतरण पर चर्चा होने लगी और इस चर्चा में श्री ऩकवीने मनुस्मृति में कर्म के आधार पर दी गई वर्ण व्यवस्था की तारीफ करते हुए बताया की मनु के वर्ण व्यवस्था से हमको परंपरागत रूप में दक्ष कारीगर मिल जाते थे जैसेलोहार, सोनार, बढ़ई, नाई, बुनकर दर्जी या अन्य कार्यों के लिये बगैर किसी ट्रेनिंग के दक्ष कारीगर मिल जाया करते हैं और यह प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, यद्यपि मनुस्मृति में महिलाओं और शूद्रों की शिक्षा व धर्म ग्रंथो पर जो प्रतिबंध था उसको जायज नहीं ठहराया जा सकता, फिर भी मुझे नकवी जी के तर्कों में दम लगा और मुझे उचित प्रतीत हुआ कि इस समय हिंदू धर्म में सवर्ण बनाम दलित पिछड़े का जो विवाद चल रहा है उस पर विस्तार से चर्चा की जाए, वैसे सभी लोगों को यह पता होगा कि मुख्तार अब्बास नकवी देश के उन गिने चुने नेताओं में से एक है जिसके यहां ईद -' होली- दिवाली उसी उत्साह से मनाई जाती है।
हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था एक ऐसा विषय है जो प्रारंभिक काल से आज तक विद्यमान है। प्रारंभ में वर्ण व्यवस्था समाज के विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से करने के लिए निर्धारित की गई थी पर वही वर्ण व्यवस्था हिंदू समाज में आज तनाव का कारण बनी हुई है और जब से सोशल मीडिया आया है तब से दलित बनाम सवर्ण का विवाद अपने विकराल रूप में आ गया है, जिसे रोका जाना अत्यंत आवश्यक है इसके लिए हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों को हिंदू धर्म के मर्म को जाना आवश्यक है। आज हिंदू दलितों को राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू तो मान लेते हैं पर उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते, वहीं दलित अपने आप को हिंदू नहीं मानते पर संविधान में प्रदाता आरक्षण कल का लाभ लेने के लिए अपने आप को हिंदू कहते हैं इस कारण हिंदुत्व के मौलिक स्वरूप को जानना अत्यंत आवश्यक है।
हिंदुत्व प्राचीन काल से भारतीय समाज की संस्कृत व संस्कारों की रक्षा करता रहा है वेद, पुराण, हमारे अन्य ग्रंथ धर्म ग्रंथ हमारी संस्कृति के मौलिक स्वरूप को समझने का प्रयास करते हैं, वास्तव में हिंदू धर्म हमें नीति बद्ध तरीके से चलकर सुकर्म करते हुए जीने की कला सिखाता है स्वस्थ समाज के निर्माण में धर्म का पालन आवश्यक है इसके बिना एक स्वस्थ आदर्श समाज का निर्माण नहीं हो सकता।समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म का पालन करें जैसे समाज में पिता का धर्म, पुत्र का धर्म, राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, शिक्षक का धर्म, विद्यार्थी का धर्म निश्चित कर दिए गए हैं यदि इनमें से कोई भी अपने धर्म से विमुख होता या अपने धर्म का अपामण करेगा तो समाज में अराजकता व्याप्त हो जाएगी जैसे आजकल हिंदू समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, पंच वर्ण दलित समाज के टकराव के कारण हिंदू धर्म पतन की ओर जा रहा है लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या तो पाखंडवाद की ओर जा रहे हैं या वे नास्तिक हो रहे हैं जबकि समाज अपने शैशवकाल से आज तक धर्म सापेक्ष रहकर एक सुंदर समाज के रूप में विद्यमान है धर्म से ही मानव जीवन में नैतिक मूल्य और संस्कारों का रोपण होता है और धर्म से ही मानवता अभी संचित व अभिसंचित होती है। समाज में विभिन्न कार्यों को सक्षम रूप से चलने के लिए वर्ण व्यवस्था निश्चित की गई गीता में स्पष्ट रूप से लिखा गया है की चार वर्णों का निर्माण कर्म और योग्यता के आधार पर निर्धारित किया गया परंतु कालांतर में यह कब जन्म पर आधारित हो गया यह शोध का विषय है। प्रारंभ में हिंदू धर्म में चार वर्ण अस्तित्व में आए- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को कर्मों के अनुसार बांटा गया ब्राह्मण का मुख्य कार्य यज्ञ करना वेद पढ़ना और उनका अध्ययन करना था तथा आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में शिक्षा देना एवं पुरोहित के रूप में समाज में आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करना था। वे कानून और न्याय प्रणाली के विशेषज्ञ माने जाते थे तथा कानून और न्याय के मामले में उनका परामर्श लिया जाता था, परंपरागत रूप से ब्राह्मण को सामाजिक वर्गों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, क्षत्रिय पदापाम में ब्राह्मण के बाद आता था। क्षत्रिय वर्ण के लोगों का काम गांव कबीलों को राज्य की रक्षा करना था मनु के अनुसार इस वर्ण के लोगों का कर्तव्य वेद अध्ययन, प्रजापालन दान और दक्षिणा करना तथा विषय वासना से दूर रहना था वशिष्ठ ने इन लोगों का मुख्य व्यवसाय अध्ययन शास्त्रअभ्यास और प्रजापालन बताया है।
हिंदू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य समाज वर्णाश्रम का तीसरा स्तंभ था इसको लक्ष्मी पुत्र भी कहा जाता था, ऐसा माना जाता है कि वैसे समाज की 90ज्ञ् जातियां पहले क्षत्रिय थी और वर्ण व्यवस्था का चौथा वर्ण शूद्र पदानुक्रम क्रम में चौथे स्थान पर था, शूद्र मुख्य रूप से समाज का श्रमिक वर्ग माना जाता था वेदों में शूद्रों को सेवा करने वाले और श्रमिक के रूप में प्रस्तुत किया गया वह अपने श्रम से समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान देता था उस पर अनेक प्रतिबंध थे पर वे अछूत नहीं थे। प्रसिद्ध अर्थशास्त्राr राष्ट्रवादी चिंतक डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था की व्युत्पत्ति के लिए हिंदू धर्म में स्थानांतरण को दोषी मानते हैं, वे कहते हैं कि दलितों की व्युत्पत्ति 5000 साल के हिंदू काल में नहीं हुई, बल्कि 800 वर्षों के मुस्लिम शासन 200 वर्षों के अंग्रेज शासन के दौरान जिन्होंने जजिया कर नहीं दिया और ना ही धर्मांतरण किया उन्हें मैला ढोने और मरे हुए पशुओ को ढोने व उनकी खाल उतारने तथा उनका मांस खाने के लिए विवश कर दिया गया और वे अछूत बन गए! वास्तव में ये लोग कट्टर हिंदू थे जिन्होंने उपेक्षित और अपमानित होने के बावजूद न तो मुगलों की गुलामी स्वीकार की और न ही धर्म परिवर्तन किया तथा हिंदू बने रहे, वे शूद्र व दलित मूलत ब्राह्मण और क्षत्रियों के वंशज हैं जिन्होंने हिंदू वर्ण व्यवस्था में जाति पदापाम से बाहर होना स्वीकार किया लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया, आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए उन्हें कोटिश प्रणाम करना चाहिए कि उन्होंने भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया भले ही उन्होंने अपमान और दमनझेला और आज भी झेल रहे हैं।
प्रसिद्ध लेखक शेयरिंग एम एम ने अपनी पुस्तक हिंदू कास्ट एंड ट्राइब्स में स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत के निम्न अछूत जाति के लोग कोई और नहीं बल्कि ब्राह्मण और क्षत्रिय थे एक और लेखक स्टेकर राइट्स ने अपनी पुस्तक" कस्टम्स एंड देयर ओरिजिन "में लिखा है कि दलित जातियां वे हैं जो मुगलो से हारी तथा मुगलों ने उन्हें अपमानित करने के लिए मानवाने तरीके से उनसे गंदे से गंदे काम करवाएं, पार आश्चर्य इस बात का है की 1857 में मुगल साम्राज्य का अंत हो गया और 1947 में देश हजार वर्ष की गुलामी के बाद आजाद हो गया पर मुसलमानो द्वारा चलाए बनाए गए दलितों के साथ बार-बार अमानवीय घटनाएं उन हिंदुओं द्वारा दी गई जो इस देश के गुलाम बनने से पूर्व उन्हीं के वर्ण के थे। विगत कुछ वर्षों से देश में जिस प्रकार से जातिवादी हिंसा की घटनाएं हो रही है वह चिंता का विषय बनी हुई है, वर्ण विशेष के कुछ लोग जिन्हें वेद पुराण उपनिषद और स्मृतियों के विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है वे भारत को हिंदू राज बनाने की आड़ में दलित और उनके आदर्श डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं, इन अज्ञानी लोगों को इस बात का आभास नहीं है कि दलित अछूत और पिछड़े समुदाय के लोग यदि हिंदू धर्म से अपने आप को अलग कर ले तो क्या 15ज्ञ् आबादी वाला सवर्ण हिंदू समाज हिंदू धर्म प्रतिनिधित्व कर सकेगा, ऐसे लोगों की मनसा यदि पूरी हो गई तो हिंदू राष्ट्र की स्थापना तो दूर हिंदू धर्म का ही अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जो हिंदू धर्म लगभग 1000 वर्षों की गुलामी के बावजूद भी अपने आप को सुरक्षित रखने में सफल रहा इन स्वयंभू राष्ट्र भक्तों के कारनामों के कारण समाप्त होने की कगार पर है आवश्यकता इस बात की है कि हिंदुस्तान का हर नागरिक स्थिति को माने की हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी कोई भी व्यक्ति एक जाति विशेष में जन्म लेने से ब्राह्मण नहीं हो जाता है, न क्षत्रिय हो जाता है ना वैश्य हो जाता है और नीचे अछूत हो जाता है पर भारत में महार जाति में जन्म लेने के कारण अपने समकालीन नेताओं में सबसे शिक्षित डॉ. आंबेडकर दलित नेता की पहचान से बाहर नहीं निकाल पाए।
वर्तमान समय में हिंदू राष्ट्र स्थापना के फर्जी झंडा वरदार सीमा पार से और सीमा कें अन्दर से गैर हिंदुओं द्वारा चलाए जा रहे आतंकवाद का विरोध करने के बजाय हिंदू धर्म के पंच वर्ण (दलित) और उनके महापुरुष डॉ भीमराव अंबेडकर के अस्तित्व को समाप्त करने की बात कर रहे हैं और इसके जवाब में बहुजन समाज भी हिंदू धर्म और उनके आराध्य देवी देवताओं का विरोध कर रहे हैं जब कि इस विवाद से हिंदू धर्म को ही हानि पहुंचेगी।इस बात को ध्यान देने की जरूरत है कि हिंदू धर्म में विकृतियां समाप्त हो और हिंदू धर्म में चाहे अनचाहे जो पंच एकी स्थापना हो गई है उसे न छूना, मंदिर में उसका प्रवेश न होना, उनके शादी विवाह में घोड़ी पर न चढ़ने देना जैसी कुरीतियों को बंद किया जाए और उन्हें अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुसार हिंदू के रूप में बराबर का अधिकार दिया जाए इससे भारतीयता और हिंदुत्व दोनों मजबूत होंगे।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)