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रूसी तेल और पाकिस्तान को हथियार: जयशंकर की कूटनीतिक मास्टर क्लास

प्रकाशित: 14-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
रूसी तेल और पाकिस्तान को हथियार: जयशंकर की कूटनीतिक मास्टर क्लास
आदित्य नरेन्द्र
जयशंकर की बुद्धिमत्ता: पश्चिमी कूटनीति के दोहरे मापदंड का सटीक खुलासा भारतीय विदेश नीति के चाणक्य डॉ. एस. जयशंकर एक बार फिर विश्व मंच पर अपनी स्पष्टवादिता और गहन अंतर्दृष्टि से सभी को प्रभावित कर गए हैं। फिनलैंड के कल्टारांता टॉक्स में दिए गए उनके हालिया बयानों ने पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंड को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। जब भारत की रूसी तेल खरीद पर सवाल उठाए गए, तो जयशंकर जी ने तथ्यों के साथ जवाब दिया: अमेरिका ने ही उस समय भारत से विशेष रूप से रूसी तेल खरीदने को कहा था, विश्व बाजार को स्थिर करने के लिए। उन्होंने आगे कहा, अब जब सूट करता है तब करो, जब नहीं सूट करता तब मत करो आई मीन कम ऑन, वी आर ऑल एडल्ट्स इन द रूम। वी नो व्हाट द गेम इज।
यह बयान महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति की कड़वी सच्चाई है। 2022 में रूस-पोन संघर्ष शुरू होने के बाद यूरोप ने मध्य पूर्व से तेल खरीदना शुरू किया, जिससे रूसी तेल सस्ता और उपलब्ध हो गया। भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हित और करोड़ों भारतीयों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसे खरीदा। जयशंकर जी ने स्पष्ट किया कि भारत तेल लागत और उपलब्धता के आधार पर खरीदता है, न कि नैतिक उपदेशों के आधार पर। अमेरिका ने स्वयं यह अनुरोध किया था, लेकिन अब जब सुविधा बदल गई तो नीति भी पलट गई। जयशंकर जी की बात यहीं नहीं रुकी। उन्होंने यूरोप की नैतिकता पर सीधा प्रहार किया: कोई यूरोपीय देश भारतीय हथियारों से हमला नहीं झेला। लेकिन यूरोपीय हथियारों के मामले में भारत के लिए मैं ऐसा नहीं कह सकता। यूरोप हथियार बेचता है जो भारत पर हमला करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। हमने यूरोप को कभी खतरे में नहीं डाला। यह टिप्पणी भारत की पीड़ा को उजागर करती है। दशकों से पाकिस्तान को यूरोपीय हथियार मिलते रहे, जो भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए। वहीं भारत की हथियार निर्यात नीति शांतिपूर्ण रही है। जयशंकर जी ने पश्चिम को आईना दिखाया जब यूरोप अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से गैस खरीदता है तो वह व्यावहारिक है, लेकिन भारत जब सस्ता तेल खरीदता है तो नैतिकता का प्रश्न उठता है। डॉ. जयशंकर भारत की मल्टी-एलाइनमेंट नीति के सच्चे प्रतीक हैं। वे न रूस को छोड़ते हैं, न अमेरिका-यूरोप के साथ बढ़ते संबंधों को। यह बयान विकासशील देशों को संदेश देता है कि अब पश्चिम के नैतिक उपदेश मानने का समय बीत चुका है। हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेगा। जयशंकर जी की शैली तथ्यपरक, व्यंग्यात्मक और बिना किसी झिझक की भारतीय कूटनीति को नई ऊंचाई दे रही है। आज विश्व महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का दौर देख रहा है, भारत अपनी स्वतंत्र राह पर चलकर गेम समझते हुए आगे बढ़ रहा है। ऐसे विदेश मंत्री पर भारत को गर्व है, जो न सिर्फ देश के हितों की रक्षा करते हैं बल्कि विश्व को सच्चाई का सशक्त पाठ भी पढ़ाते हैं। जयशंकर जी ने साबित कर दिया कि कूटनीति में बुद्धिमत्ता और साहस सबसे बड़ा हथियार है।