पीओके में अपनी कब्र खुद ही खोद रहा है पाकिस्तान
प्रकाशित: 14-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
लगता है कि पाकिस्तान अशांत रहने के लिए अभिशप्त है। ब्लूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के बाद अब पीओके में जो हालात बन चुके हैं उससे लगता है कि पाकिस्तान वहां अपनी कब्र खुद ही खोद रहा है। पीओके में इंटरनेट पर पाबंदी होने के बावजूद वहां से छन-छनकर आ रही खबरें बताती हैं कि पाक सेना शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही पीओके की आवाम पर गोलियां बरसा रही है। बताया जाता है कि 5 जून से अब तक 53 लोगों की जान जा चुकी है। पीओके में आंदोलन की शुरुआत महंगाई बढ़ने के साथ शुरू हुई। महंगाई इतनी बढ़ गई कि आम आदमी के लिए गुजारा मुश्किल हो गया। लोगों के पास रोजगार नहीं है। सरकार की तरफ से उनकी कोई सुनवाई भी नहीं है। ऐसे में जब गेहूं-चावल जैसी चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े और बिजली के बिल आसमान छूने लगे तो अपनी परेशानियां बताने के लिए पीओके के लोग सड़कों पर उतर आए। उन्हांने जेएएसी अर्थात संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी के तहत आंदोलन शुरू कर दिया। पाक सरकार को यह नागवार गुजरा। उसने जेएएसी पर पाबंदी लगा दी और उसके चार नेताओं पर एक करोड़ का इनाम घोषित कर दिया। इससे मामला और बिगड़ गया। आंदोलनकारियों के एक नेता सरदार अमान खान ने कहा कि हम निहत्थे लोग हैं। हम सिर्फ अस्पताल, रोटी और रोजगार मांग रहे हैं लेकिन पाकिस्तानी सेना हमें आतंकवादी बुला रही है। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई नहीं रुकेगी, लोग अपने हक के लिए लड़ते रहेंगे। वहां से आ रही रिपोर्टें के अनुसार विरोध प्रदर्शन अब केवल रावलकोट तक ही सीमित नहीं है। अब मुजफ्फराबाद, मीरपुर, टाटापानी और प्लांदरी जैसे कई क्षेत्रों में भी बंद और प्रदर्शन का आ"ान किया गया है। पीओके को लेकर कई देशों में भी विरोध प्रदर्शन की खबरें हैं। रिपोर्ट के अनुसार यूके में एकजुटता प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं जबकि अमेरिका और आस्ट्रेलिया के विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पीओके में मानवाधिकारों की स्थिति का मुद्दा उठाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। रावलकोट में जारी तनाव और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के कारण पीओके की स्थिति क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती है। कभी महंगाई को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन का रूप व्यापक हो चुका है। अब उनकी सबसे महत्वपूर्ण मांग है कि पीओके विधानसभा में जो 12 आरक्षित सीटें हैं उन्हें तुरंत समाप्त किया जाए। दरअसल यह 12 सीटें पाक सरकार द्वारा भारत से आए शरणार्थियों के नाम पर भरी जाती हैं। 53 सदस्यों वाली पीओके विधानसभा की यह 12 सीटें पाक सरकार के नियंत्रण में होने के कारण पाक सरकार इनका इस्तेमाल अपने समर्थकों को सत्ता में बिठाने के लिए करती है। हकीकत यह है कि इन सीटों पर दावा करने वाले शरणाथी क्षेत्र में लगभग न के बराबर रहते हैं। पाक सरकार अपना यह हक छोड़ना नहीं चाहती। यही कारण है कि वह पीओके में लाशें गिराने पर उतर आई है। भारत सरकार ने पाक बलों की इस बर्बरता की कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हमें उम्मीद है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को उसके कुकर्में और मानवाधिकारों के हनन के लिए जवाबदेह ठहराएगा। पीओके में रहने वाले जब भी कभी भारत के जम्मू-कश्मीर की तरक्की को देखते होंगे तो उन्हें यह अफसोस जरूर होता होगा कि वह भी भारत का हिस्सा क्यों नहीं बने। उनका यही अफसोस पीओके में पाकिस्तान की कब्र खोदने के लिए काफी है। आने वाले सालों में यदि पीओके भारत का हिस्सा बनने के लिए कदम बढ़ाता दिखे तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
लगता है कि पाकिस्तान अशांत रहने के लिए अभिशप्त है। ब्लूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के बाद अब पीओके में जो हालात बन चुके हैं उससे लगता है कि पाकिस्तान वहां अपनी कब्र खुद ही खोद रहा है। पीओके में इंटरनेट पर पाबंदी होने के बावजूद वहां से छन-छनकर आ रही खबरें बताती हैं कि पाक सेना शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही पीओके की आवाम पर गोलियां बरसा रही है। बताया जाता है कि 5 जून से अब तक 53 लोगों की जान जा चुकी है। पीओके में आंदोलन की शुरुआत महंगाई बढ़ने के साथ शुरू हुई। महंगाई इतनी बढ़ गई कि आम आदमी के लिए गुजारा मुश्किल हो गया। लोगों के पास रोजगार नहीं है। सरकार की तरफ से उनकी कोई सुनवाई भी नहीं है। ऐसे में जब गेहूं-चावल जैसी चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े और बिजली के बिल आसमान छूने लगे तो अपनी परेशानियां बताने के लिए पीओके के लोग सड़कों पर उतर आए। उन्हांने जेएएसी अर्थात संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी के तहत आंदोलन शुरू कर दिया। पाक सरकार को यह नागवार गुजरा। उसने जेएएसी पर पाबंदी लगा दी और उसके चार नेताओं पर एक करोड़ का इनाम घोषित कर दिया। इससे मामला और बिगड़ गया। आंदोलनकारियों के एक नेता सरदार अमान खान ने कहा कि हम निहत्थे लोग हैं। हम सिर्फ अस्पताल, रोटी और रोजगार मांग रहे हैं लेकिन पाकिस्तानी सेना हमें आतंकवादी बुला रही है। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई नहीं रुकेगी, लोग अपने हक के लिए लड़ते रहेंगे। वहां से आ रही रिपोर्टें के अनुसार विरोध प्रदर्शन अब केवल रावलकोट तक ही सीमित नहीं है। अब मुजफ्फराबाद, मीरपुर, टाटापानी और प्लांदरी जैसे कई क्षेत्रों में भी बंद और प्रदर्शन का आ"ान किया गया है। पीओके को लेकर कई देशों में भी विरोध प्रदर्शन की खबरें हैं। रिपोर्ट के अनुसार यूके में एकजुटता प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं जबकि अमेरिका और आस्ट्रेलिया के विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पीओके में मानवाधिकारों की स्थिति का मुद्दा उठाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। रावलकोट में जारी तनाव और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के कारण पीओके की स्थिति क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती है। कभी महंगाई को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन का रूप व्यापक हो चुका है। अब उनकी सबसे महत्वपूर्ण मांग है कि पीओके विधानसभा में जो 12 आरक्षित सीटें हैं उन्हें तुरंत समाप्त किया जाए। दरअसल यह 12 सीटें पाक सरकार द्वारा भारत से आए शरणार्थियों के नाम पर भरी जाती हैं। 53 सदस्यों वाली पीओके विधानसभा की यह 12 सीटें पाक सरकार के नियंत्रण में होने के कारण पाक सरकार इनका इस्तेमाल अपने समर्थकों को सत्ता में बिठाने के लिए करती है। हकीकत यह है कि इन सीटों पर दावा करने वाले शरणाथी क्षेत्र में लगभग न के बराबर रहते हैं। पाक सरकार अपना यह हक छोड़ना नहीं चाहती। यही कारण है कि वह पीओके में लाशें गिराने पर उतर आई है। भारत सरकार ने पाक बलों की इस बर्बरता की कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हमें उम्मीद है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को उसके कुकर्में और मानवाधिकारों के हनन के लिए जवाबदेह ठहराएगा। पीओके में रहने वाले जब भी कभी भारत के जम्मू-कश्मीर की तरक्की को देखते होंगे तो उन्हें यह अफसोस जरूर होता होगा कि वह भी भारत का हिस्सा क्यों नहीं बने। उनका यही अफसोस पीओके में पाकिस्तान की कब्र खोदने के लिए काफी है। आने वाले सालों में यदि पीओके भारत का हिस्सा बनने के लिए कदम बढ़ाता दिखे तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।