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अमेरिका से सजगता जरूरी

प्रकाशित: 14-06-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
अमेरिका से सजगता जरूरी
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो का भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर से यह कहना कि सभी कॉमर्शियल जहाजों को होर्मूज स्ट्रेट में अमेरिकी सेना के आदेशों का तुरन्त पालन करना चाहिए और अमेरिकी नाकेबन्दी का उल्लंघन एवं ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस बात का स्पष्ट संदेश है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका हर हथकण्डा अपना रहा है। अमेरिका जिस तरह ईरान को घेर कर बैठा है, इससे एक बात तो साफ है कि अब या तो विवश होकर ईरान समझौता कर ले अथवा समझौते का विकल्प हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। यह अमेरिका की रणनीतिक चाल है कि एक तरफ उसने समझौते की संभावना की खबर फैला दी है और इजरायल की नाराजगी की हवा फैला दी है जबकि दूसरी तरफ ईरान के लिए स्थाई मुसीबत खड़ी कर दी है।
उल्लेखनीय है कि 8 जून को अमेरिकी सेना ने पलाऊ के झण्डे वाले तेल टैंकर ‘मेरीवैक्स' तेल टैंकर को बेकार कर दिया था जिसमें 24 भारतीय नाविक सवार थे। इस हमले में तो सभी क्रू मेम्बर बचा लिए गए किन्तु 10 जून को अमेरिकी सेना ने पलाऊ के झंडे लगे एक और टैंकर ‘सेटेबेलो' पर हमला किया जिसमें सवार 24 भारतीय नाविकों में से तीन की मौत हो गई। बृहस्पतिवार यानि 11 जून को एक और जहाज ‘जलवीर' पर भी हमला हुआ जो गिनी बिसाऊ के झंडे वाला टैंकर था और जिसमें 20 भारतीय सवार थे।
असल में विदेश मंत्री जयशंकर अपने यूरोप प्रवास में हैं और उन्होंने अपने अमेरिकी समकक्ष से कॉमर्शियल जहाजों पर इस तरह के हमले को गलत बताया तब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो ने जवाब में दो टूक कहा कि अमेरिकी सेना ऐसे हमले करती रहेगी क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता कि कोई भी टैंकर ईरान से तेल लेकर होर्मूज स्ट्रेट से गुजरे। इसका मतलब यह हुआ कि अमेरिकी राजदूतावास के डिपटी चीफ आफ द मिशन (डीसीएम) जेसन मोक्स को जब शुक्रवार को विदेश मंत्रालय में बुलाकर स्पष्ट किया जा रहा था कि अमेरिकी सेना के इस तरह टैंकरों पर हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और अमेरिकी राजनायिक का यह कहना कि हमले गलती से हुए तथा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इस घटना पर सफाई देते हुए यह कहना कि इन टैंकरों पर हमले ईरान ने किया है कितना भ्रामक है। सच तो यह है कि राजदूतावास के डीसीएम और राष्ट्रपति तो बहाना बना रहे थे लेकिन विदेश मंत्री ने स्पष्ट रूप से अपनी रणनीति की जानकारी डॉ. जयशंकर को दे दी।
यह सच है कि अमेरिका दुनिया के किसी भी देश के राष्ट्रीय हितें की कोई परवाह नहीं करता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो यूरोप अमेरिका के अनुयायी और अंध समर्थक के रूप में जाना जाता था, ट्रंप के मौजूदा अमेरिका ने उसके राष्ट्रीय हितों की कोई परवाह नहीं की तो भारत को यह भूल जाना चाहिए कि अमेरिका नई दिल्ली को अपना स्वाभाविक मित्र मानता है। भारत को अमेरिका पर कोई भरोसा नहीं करना चाहिए किन्तु दुश्मनी से बचना भी चाहिए। मतलब यह कि खुद को मजबूत, समृद्ध और प्रभावशाली बनाए, अमेरिका से किसी भी तरह की उम्मीद न करे। भारत को यह समझने की जरूरत है कि एक तरफ तो वह नई दिल्ली को अपना मित्र बताता है जबकि भारतीय नाविकों को मार रहा है किन्तु चीन के टैंकर धड़ल्ले से होर्मूज स्ट्रेट से निकल रहे हैं जिन पर अमेरिकी सैनिक हमले नहीं करते। इसका सीधा हिसाब यही है कि अमेरिका शक्ति की भाषा समझता है, इसलिए इस वक्त भारत को अनावश्यक उलझने की बजाए अपनी ताकत बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए और अमेरिका के साथ संबंधों की संतुलित एवं कैलकुलेटिव ही रखना चाहिए अन्यथा वह भारत को अपने दोस्ती का झांसा देकर शत्रुवत व्यवहार करता रहेगा।