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क्या तकनीक मानवीय उपस्थिति और संवेदनाओं का स्थान ले सकती है

प्रकाशित: 09-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
हरियाणा के सोनीपत से सामने आई एक घटना ने समाज को भावनात्मक, सामाजिक और नैतिक स्तर पर सोचने के लिए विवश कर दिया है। बताया जाता है कि मुंबई के व्यापारी रहे शिव रामचरण गुप्ता के निधन के बाद उनकी बेटियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करवाई और आर्थिक सहायता भेजकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने का प्रयास किया। हालांकि इस घटनाक्रम ने समाज में एक व्यापक बहस को जन्म दिया है कि क्या माता-पिता के प्रति संतान का दायित्व केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित है या फिर उनके जीवन और मृत्यु दोनों परिस्थितियों में भावनात्मक उपस्थिति भी उतनी ही आवश्यक है। जानकारी के अनुसार शिव रामचरण गुप्ता कभी मुंबई में व्यवसाय से जुड़े हुए थे, लेकिन व्यापार में घाटा होने के बाद उनका जीवन संघर्षपूर्ण हो गया। बाद में वे सोनीपत आकर रहने लगे और वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद स्थानीय धर्मशाला के संचालकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़कर उनके अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। इतना ही नहीं, उनकी अस्थियों के विसर्जन का कार्य भी स्थानीय लोगों द्वारा ही संपन्न किया गया। इस पूरी प्रािढया में उनकी बेटियां प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं हुईं और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अंतिम संस्कार की औपचारिकताओं में शामिल होने की बात सामने आई। यह घटना केवल एक परिवार की निजी परिस्थिति भर नहीं रह गई, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक संबंधों पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करती है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को सर्वोच्च सम्मान देने की परंपरा रही है। जीवन भर संतान के पालन-पोषण, शिक्षा और भविष्य के लिए संघर्ष करने वाले माता-पिता अपने अंतिम समय में परिवार के स्नेह और साथ की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे में जब किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार परिजनों की अनुपस्थिति में सामाजिक संस्थाओं या अन्य लोगों द्वारा किया जाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से संवेदनशील चर्चा का विषय बन जाता है। हालांकि किसी भी परिवार की परिस्थितियों को पूरी तरह जाने बिना अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यह भी संभव है कि बेटियों के सामने कुछ ऐसी व्यक्तिगत, स्वास्थ्य संबंधी, आर्थिक या अन्य बाध्यताएं रही हों जिनके कारण वे उपस्थित न हो सकी हों। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, दूरियां और पारिवारिक परिस्थितियां कई बार ऐसे निर्णयों को प्रभावित करती हैं।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।