बदलाव के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं
प्रकाशित: 09-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा में 21 वर्षीय सुरेंद्र सिंह चौधरी, जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘बिट्टू तबाही' के नाम से जाना जाता है, ने यह साबित किया है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और जिम्मेदारी की भावना सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। अजनार नदी की बेहद खराब स्थिति देखकर उन्होंने सरकारी कार्रवाई का इंतजार करने के बजाय स्वयं इसकी सफाई का बीड़ा उठाया।
26 जनवरी 2026 से शुरू हुआ उनका अभियान धीरे-धीरे व्यक्तिगत प्रयास से जनजागरूकता की मिसाल बन गया। नदी में जमा प्लास्टिक, शैवाल, कीचड़ और अन्य कचरे को उन्होंने सामान्य औजारों की मदद से निकालना शुरू किया। शुरुआत में कुछ मित्र उनके साथ थे, लेकिन बाद में उन्होंने लगभग अकेले ही यह अभियान जारी रखा। सीमित साधनों और सुरक्षा उपकरणों के अभाव के बावजूद उन्होंने महीनों तक मेहनत की और नदी के एक हिस्से की तस्वीर ही बदल दी। यह काम जितना प्रेरणादायक है, उतना ही यह व्यवस्था के लिए एक गंभीर सवाल भी खड़ा करता है। इस घटना से एक बड़ा संदेश यह निकलता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और अभियानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए
किसी युवा को अपनी बचत खर्च करके, बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के और अपने स्वास्थ्य को जोखिम में डालकर नदी की सफाई करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? नदियों और जलस्रोतों की सफाई केवल किसी एक व्यक्ति या स्वयंसेवी की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। स्थानीय निकाय, प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी सरकारी एजेंसियों को नियमित निगरानी और वैज्ञानिक तरीके से सफाई की व्यवस्था करनी चाहिए।
बिट्टू तबाही के अभियान की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद उनकी चर्चा देशभर में हुई। उनके काम से प्रभावित होकर नीदरलैंड स्थित पर्यावरण संगठन ‘द ओशन क्लीनअप' के संस्थापक एवं सीईओ बोयान स्लाट की ओर से उन्हें काम करने का निमंत्रण मिलने की खबर ने इस छोटे से स्थानीय प्रयास को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया। यह घटना बताती है कि स्थानीय स्तर पर किया गया ईमानदार पर्यावरणीय कार्य भी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
बिट्टू के प्रयासों ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का ध्यान भी आकर्षित किया। मुख्यमंत्री ने उन्हें मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर उनके कार्य की सराहना की और सरकारी सहयोग का आश्वासन दिया। यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन वास्तविक सम्मान तभी होगा जब अजनार नदी की सफाई को स्थायी सरकारी योजना का हिस्सा बनाया जाए और अन्य नदियों तथा जलस्रोतों के संरक्षण के लिए भी ठोस नीति तैयार की जाए।
देश में हजारों नदियां, तालाब और जलस्रोत प्लास्टिक, सीवेज, औद्योगिक कचरे और अपामण की समस्या से जूझ रहे हैं। यदि एक 21 वर्षीय युवक सीमित संसाधनों के बावजूद अपने स्तर पर इतना बड़ा प्रयास कर सकता है, तो सरकार, स्थानीय प्रशासन, उद्योगों और समाज के संयुक्त प्रयास से इन जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना निश्चित रूप से संभव है।
जरूरत इस बात की है कि बिट्टू तबाही जैसे युवाओं को केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता या पुरस्कार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण, आर्थिक सहायता और संस्थागत सहयोग दिया जाए। साथ ही उनके अभियान को जनभागीदारी से जोड़कर नदी के आसपास कचरा फेंकने पर प्रभावी रोक, नियमित सफाई, सीवेज नियंत्रण और जल गुणवत्ता की वैज्ञानिक निगरानी सुनिश्चित की जाए।
बिट्टू की कहानी केवल एक नदी की सफाई की कहानी नहीं है। यह उस युवा शक्ति की कहानी है जो समस्या देखकर शिकायत करने के बजाय समाधान के लिए आगे आती है। अजनार नदी की गंदगी ने एक युवक को परेशान किया और उसी परेशानी ने उसे कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। अब जिम्मेदारी सरकार और समाज की है कि इस प्रेरणा को एक स्थायी पर्यावरण आंदोलन में बदला जाए, ताकि देश की नदियां किसी एक ‘बिट्टू तबाही' की प्रतीक्षा न करती रहें।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
26 जनवरी 2026 से शुरू हुआ उनका अभियान धीरे-धीरे व्यक्तिगत प्रयास से जनजागरूकता की मिसाल बन गया। नदी में जमा प्लास्टिक, शैवाल, कीचड़ और अन्य कचरे को उन्होंने सामान्य औजारों की मदद से निकालना शुरू किया। शुरुआत में कुछ मित्र उनके साथ थे, लेकिन बाद में उन्होंने लगभग अकेले ही यह अभियान जारी रखा। सीमित साधनों और सुरक्षा उपकरणों के अभाव के बावजूद उन्होंने महीनों तक मेहनत की और नदी के एक हिस्से की तस्वीर ही बदल दी। यह काम जितना प्रेरणादायक है, उतना ही यह व्यवस्था के लिए एक गंभीर सवाल भी खड़ा करता है। इस घटना से एक बड़ा संदेश यह निकलता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और अभियानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए
किसी युवा को अपनी बचत खर्च करके, बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के और अपने स्वास्थ्य को जोखिम में डालकर नदी की सफाई करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? नदियों और जलस्रोतों की सफाई केवल किसी एक व्यक्ति या स्वयंसेवी की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। स्थानीय निकाय, प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी सरकारी एजेंसियों को नियमित निगरानी और वैज्ञानिक तरीके से सफाई की व्यवस्था करनी चाहिए।
बिट्टू तबाही के अभियान की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद उनकी चर्चा देशभर में हुई। उनके काम से प्रभावित होकर नीदरलैंड स्थित पर्यावरण संगठन ‘द ओशन क्लीनअप' के संस्थापक एवं सीईओ बोयान स्लाट की ओर से उन्हें काम करने का निमंत्रण मिलने की खबर ने इस छोटे से स्थानीय प्रयास को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया। यह घटना बताती है कि स्थानीय स्तर पर किया गया ईमानदार पर्यावरणीय कार्य भी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर सकता है।
बिट्टू के प्रयासों ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का ध्यान भी आकर्षित किया। मुख्यमंत्री ने उन्हें मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर उनके कार्य की सराहना की और सरकारी सहयोग का आश्वासन दिया। यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन वास्तविक सम्मान तभी होगा जब अजनार नदी की सफाई को स्थायी सरकारी योजना का हिस्सा बनाया जाए और अन्य नदियों तथा जलस्रोतों के संरक्षण के लिए भी ठोस नीति तैयार की जाए।
देश में हजारों नदियां, तालाब और जलस्रोत प्लास्टिक, सीवेज, औद्योगिक कचरे और अपामण की समस्या से जूझ रहे हैं। यदि एक 21 वर्षीय युवक सीमित संसाधनों के बावजूद अपने स्तर पर इतना बड़ा प्रयास कर सकता है, तो सरकार, स्थानीय प्रशासन, उद्योगों और समाज के संयुक्त प्रयास से इन जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना निश्चित रूप से संभव है।
जरूरत इस बात की है कि बिट्टू तबाही जैसे युवाओं को केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता या पुरस्कार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण, आर्थिक सहायता और संस्थागत सहयोग दिया जाए। साथ ही उनके अभियान को जनभागीदारी से जोड़कर नदी के आसपास कचरा फेंकने पर प्रभावी रोक, नियमित सफाई, सीवेज नियंत्रण और जल गुणवत्ता की वैज्ञानिक निगरानी सुनिश्चित की जाए।
बिट्टू की कहानी केवल एक नदी की सफाई की कहानी नहीं है। यह उस युवा शक्ति की कहानी है जो समस्या देखकर शिकायत करने के बजाय समाधान के लिए आगे आती है। अजनार नदी की गंदगी ने एक युवक को परेशान किया और उसी परेशानी ने उसे कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। अब जिम्मेदारी सरकार और समाज की है कि इस प्रेरणा को एक स्थायी पर्यावरण आंदोलन में बदला जाए, ताकि देश की नदियां किसी एक ‘बिट्टू तबाही' की प्रतीक्षा न करती रहें।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।