अदालत ने समय से पहले जन्मे और कमजोर शिशु को छोड़ने के मामले में माता-पिता को दोषी ठहराया
प्रकाशित: 14-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली , (विसं)। दिल्ली की एक अदालत ने अस्पताल में समय से पहले जन्मे और चिकित्सकीय रूप से कमजोर शिशु को छोड़ने के मामले में पति-पत्नी को दोषी ठहराया।
अदालत ने दंपति की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिशु को विशेष चिकित्सा सुविधा वाले अस्पताल में छोड़ने का उद्देश्य उसे इलाज मुहैया कराना था, न कि त्यागना।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुनील कुमार ने हरीना रे उर्फ रीना और उसके पति जीतू कुमार को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 317 और धारा 34 के तहत दोषी करार दिया।
आईपीसी की धारा 317 के तहत 12 साल से कम उम्र के बच्चे को उसके माता-पिता या देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा लावारिस छोड़ने या खतरे में डालने पर सात साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।
अदालत ने 10 सितंबर को दिये आदेश में कहा, ''रिकॉर्ड में साबित हुई परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि बच्चे को छोड़ने के पीछे उसे पूरी तरह त्यागने की मंशा थी, जो आईपीसी की धारा 317 के तहत अपराध है।'' अदालत ने कहा कि बच्ची का जन्म 12 दिसंबर, 2014 को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में समय से पहले हुआ था और कम वजन व चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में भर्ती कराया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माता-पिता अस्पताल छोड़कर चले गए और उनसे बार-बार संपर्क करने के प्रयासों के बावजूद वे शिशु की देखभाल के लिए वापस नहीं आए।
अभियोजन पक्ष ने बताया कि इसके बाद 12 मार्च, 2015 को बच्ची को देखभाल के लिए निर्मल छाया भेज दिया गया, जहां कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई। अदालत ने अन्य साक्ष्यों के अलावा डीएनए रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिसमें यह पुष्टि हुई कि रीना और जीतू कुमार मृत बच्ची के माता-पिता थे। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिशु को विशेष चिकित्सा सुविधा वाले अस्पताल में छोड़ने का उद्देश्य उसका इलाज कराना था, न कि उसे त्यागना।
अदालत ने कहा, ''इस अपराध का मूल तत्व बच्चे को पूरी तरह त्यागने की मंशा से उसे छोड़ना या लावारिस हालत में रखना है।''
अदालत ने दंपति की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिशु को विशेष चिकित्सा सुविधा वाले अस्पताल में छोड़ने का उद्देश्य उसे इलाज मुहैया कराना था, न कि त्यागना।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुनील कुमार ने हरीना रे उर्फ रीना और उसके पति जीतू कुमार को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 317 और धारा 34 के तहत दोषी करार दिया।
आईपीसी की धारा 317 के तहत 12 साल से कम उम्र के बच्चे को उसके माता-पिता या देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा लावारिस छोड़ने या खतरे में डालने पर सात साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।
अदालत ने 10 सितंबर को दिये आदेश में कहा, ''रिकॉर्ड में साबित हुई परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि बच्चे को छोड़ने के पीछे उसे पूरी तरह त्यागने की मंशा थी, जो आईपीसी की धारा 317 के तहत अपराध है।'' अदालत ने कहा कि बच्ची का जन्म 12 दिसंबर, 2014 को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में समय से पहले हुआ था और कम वजन व चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में भर्ती कराया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माता-पिता अस्पताल छोड़कर चले गए और उनसे बार-बार संपर्क करने के प्रयासों के बावजूद वे शिशु की देखभाल के लिए वापस नहीं आए।
अभियोजन पक्ष ने बताया कि इसके बाद 12 मार्च, 2015 को बच्ची को देखभाल के लिए निर्मल छाया भेज दिया गया, जहां कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई। अदालत ने अन्य साक्ष्यों के अलावा डीएनए रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिसमें यह पुष्टि हुई कि रीना और जीतू कुमार मृत बच्ची के माता-पिता थे। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिशु को विशेष चिकित्सा सुविधा वाले अस्पताल में छोड़ने का उद्देश्य उसका इलाज कराना था, न कि उसे त्यागना।
अदालत ने कहा, ''इस अपराध का मूल तत्व बच्चे को पूरी तरह त्यागने की मंशा से उसे छोड़ना या लावारिस हालत में रखना है।''