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‘एआई मंथन 2.0': ‘एआई फॉर एग्रीकल्चर' सत्र में कृषि क्षेत्र में एआई, ड्रोन और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर विशेषज्ञों का मंथन

प्रकाशित: 14-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
लखनऊ,(वीअ)। राज्यपाल एवं राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल की अध्यक्षता में जन भवन, उत्तर प्रदेश एवं छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘एआई मंथन 2.0' के दूसरे दिन ‘एआई फॉर एग्रीकल्चर' विषय पर आयोजित समानांतर सत्र में कृषि क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, ड्रोन, सैटेलाइट, सेंसर एवं मोबाइल तकनीक के उपयोग तथा किसानों को समय पर सटीक एवं डेटा आधारित परामर्श उपलब्ध कराने पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। इस अवसर पर छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक सहित विभिन्न विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
श्रीराम हिमालय विश्वविद्यालय, देहरादून के प्रो. (डॉ.) नील मणि ने कृषि क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जल संकट, जलवायु परिवर्तन एवं बदलते मौसम के बीच खाद्य उत्पादन बढ़ाना बड़ी चुनौती है। इसके लिए मिट्टी की जांच, सही बीज का चयन, उर्वरक एवं सिंचाई प्रबंधन, खरपतवार एवं कीट नियंत्रण तथा जलवायु प्रभावों के आकलन में एआई की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। उन्होंने कहा कि एआई की मदद से कीट एवं फसल रोगों की पहचान, फसल की स्थिति तथा उत्पादन का पूर्वानुमान किया जा सकता है। स्थानीय भाषा में वॉयस आधारित अनुप्रयोगों के माध्यम से किसान अपनी समस्या बताकर उसी भाषा में सलाह प्राप्त कर सकते हैं। प्रो. नील मणि ने कहा कि मिट्टी, मौसम, सैटेलाइट एवं ड्रोन से प्राप्त आंकड़ों को एकीकृत कर किसानों को समय पर और कम लागत वाली सलाह उपलब्ध कराई जा सकती है। ड्रोन एवं सैटेलाइट के माध्यम से फसल स्वास्थ्य, मिट्टी की स्थिति, सिंचाई, उर्वरक की आवश्यकता एवं कीटों की पहचान संभव है। मोबाइल कैमरे से फसलों की स्थिति एवं गुणवत्ता का आकलन तथा फसल उत्पादन का पूर्वानुमान भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक समस्या के लिए जटिल एवं महंगे एआई मॉडल आवश्यक नहीं हैं, बल्कि छोटे, सरल एवं कम लागत वाले मॉडल भी किसानों के लिए प्रभावी समाधान दे सकते हैं। उन्होंने सेंसर आधारित मछली पालन, वर्टिकल फार्मिंग, किचन गार्डनिंग, कनेक्टेड ट्रैक्टर एवं पशुधन प्रबंधन में भी आधुनिक तकनीक के उपयोग की संभावनाएं बताईं।
आईसीएआर, नई दिल्ली के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. कृष्ण कुमार चतुर्वेदी ने ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन ट्रांसफॉर्मिंग ट्रेडिशनल फार्मिंग टू डेटा-ड्रिवन प्रिसिजन एग्रीकल्चर' विषय पर कृषि को डेटा आधारित सटीक कृषि में बदलने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कृषि अब पारंपरिक अनुभव आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर इंटरनेट ऑफ थिंग्स, बिग डेटा, एआई एवं क्लाउड कंप्यूटिंग के उपयोग की ओर बढ़ रही है। सेंसर, ड्रोन, मोबाइल एवं रिमोट सेंसिंग के माध्यम से फसल स्वास्थ्य, मौसम, मिट्टी की नमी, पोषक तत्वों एवं जल उपलब्धता से संबंधित स्थान-विशिष्ट आंकड़े एकत्र कर बेहतर कृषि निर्णय लिए जा सकते हैं।