पाक को पानी नहीं भीख का कटोरा देगी सिंधू जल संधि
प्रकाशित: 26-07-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
कहते हैं कि जब बुरा समय आता है तो चारों ओर से आता है। एक तरफ जहां ब्लूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वां के लड़ाकों और पाक अधिकृत कश्मीर (पीओजेके) के प्रदर्शनकारियों ने पाक सरकार और सेना की नींद हराम कर रखी है तो दूसरी तरफ भारत ने पाकिस्तान के साथ पिछले लगभग सात दशक से लागू सिंधू जल संधि को यह कहते हुए स्थगित कर दिया है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। भारत पाकिस्तान से पिछले तीन दशक से भी ज्यादा समय से कहता आ रहा है कि वह आतंकवाद को एक टूल के रूप में इस्तेमाल करना बंद करे और वहां रहकर भारत में आतंकवाद फैलाने वाले आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। दरअसल पाकिस्तान की सरकार और सेना का सोचना था कि भारत की सरकार अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएगी। चूंकि वह भी एक परमाणु शक्ति है जिसके चलते भारत उस पर सैन्य कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं करेगा। पाक सरकार और सेना का यह सारा आंकलन उस समय धरा का धरा रह गया जब भारत ने अंतर्राष्ट्रीय अदालत को धता बताते हुए वहां पेश होने से यह कहते हुए मना कर दिया कि वह पाकिस्तान की कार्रवाई को मान्यता नहीं देता। भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अदालत की कार्रवाई के बहिष्कार से पाकिस्तान मुश्किल में फंस गया है। उसने कभी नहीं सोचा था कि भारत अंतर्राष्ट्रीय अदालत की कार्रवाई का बहिष्कार जैसा कदम भी उठा सकता है। इस मामले में आई एक रिपोर्ट ने पाकिस्तान की आवाम को और भी परेशान कर दिया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अदालत की कार्रवाई के बहिष्कार के बावजूद भी सुनवाई चलती रहे इसके लिए उसे न सिर्फ अपनी बल्कि भारत की फीस भी भरनी पड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक यह रकम 6 लाख डालर से ज्यादा हो चुकी है। पाकिस्तानी करेंसी में यह 165 करोड़ रुपए से ज्यादा है। इस तरह पाकिस्तान पर दोतरफा मार पड़ रही है। सिंधू जल संधि को लेकर उसे पानी तो मिल नहीं रहा, भारत के हिस्से की अदालती फीस भी चुकानी पड़ रही है। पाकिस्तान ने दशकों से पानी जमा करने के लिए कोई बड़ा स्टोरेज नहीं बनाया जिसकी कीमत उसे अब चुकानी पड़ रही है। अब वह अपने आपको पीड़ित दिखाकर भारत पर सिंधू जल संधि को बहाल कराने में दूसरे देशों की मदद लेना चाहता है। इसके लिए उसने अपने देश की यात्रा पर आई कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद से गुहार लगाई। हालांकि इस मामले में न तो अनीता आनंद और न ही कनाडा सरकार ने कोई प्रतिािढया दी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी दूत पी. हरीश ने भारत का रूख स्पष्ट करते हुए कहा कि सिंधू जल संधि पर हमारा रुख साफ और एक जैसा है। जब सीमा पार आतंकवाद का इस्तेमाल लगातार सरकारी नीति के एक हथियार के तौर पर किया जा रहा हो तो आपसी भरोसे और सद्भावना के आधार पर सहयोग की उम्मीद नहीं की जा सकती। पाकिस्तान सिंधू जल संधि को लेकर दुनिया के सामने झूठ बोल रहा है। इस संधि की प्रस्तावना के अनुसार पाकिस्तान ने न तो अच्छी नीयत दिखाई है और न ही दोस्ती। वह लागातार भारत के खिलाफ आंतकवाद को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते भारत को किसी ऐसी संधि में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो उसके हित में न हो। जिस दिन भारत इस संधि से बाहर निकल आया और उसने पाकिस्तान का पानी रोक दिया उसी दिन पाकिस्तान के खेतों की जमीन बंजर होनी शुरू हो जाएगी और उसे इतना नुकसान होगा कि उसके हाथ में भीख का कटोरा आ जाएगा। बेहतर होगा कि पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद करे और दाउद जैसे भारत के अपराधियों को वापस भेजे ताकि स्थिति को और बिगड़ने से बचाया जा सके।
कहते हैं कि जब बुरा समय आता है तो चारों ओर से आता है। एक तरफ जहां ब्लूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वां के लड़ाकों और पाक अधिकृत कश्मीर (पीओजेके) के प्रदर्शनकारियों ने पाक सरकार और सेना की नींद हराम कर रखी है तो दूसरी तरफ भारत ने पाकिस्तान के साथ पिछले लगभग सात दशक से लागू सिंधू जल संधि को यह कहते हुए स्थगित कर दिया है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। भारत पाकिस्तान से पिछले तीन दशक से भी ज्यादा समय से कहता आ रहा है कि वह आतंकवाद को एक टूल के रूप में इस्तेमाल करना बंद करे और वहां रहकर भारत में आतंकवाद फैलाने वाले आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करे। लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। दरअसल पाकिस्तान की सरकार और सेना का सोचना था कि भारत की सरकार अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएगी। चूंकि वह भी एक परमाणु शक्ति है जिसके चलते भारत उस पर सैन्य कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं करेगा। पाक सरकार और सेना का यह सारा आंकलन उस समय धरा का धरा रह गया जब भारत ने अंतर्राष्ट्रीय अदालत को धता बताते हुए वहां पेश होने से यह कहते हुए मना कर दिया कि वह पाकिस्तान की कार्रवाई को मान्यता नहीं देता। भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अदालत की कार्रवाई के बहिष्कार से पाकिस्तान मुश्किल में फंस गया है। उसने कभी नहीं सोचा था कि भारत अंतर्राष्ट्रीय अदालत की कार्रवाई का बहिष्कार जैसा कदम भी उठा सकता है। इस मामले में आई एक रिपोर्ट ने पाकिस्तान की आवाम को और भी परेशान कर दिया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अदालत की कार्रवाई के बहिष्कार के बावजूद भी सुनवाई चलती रहे इसके लिए उसे न सिर्फ अपनी बल्कि भारत की फीस भी भरनी पड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक यह रकम 6 लाख डालर से ज्यादा हो चुकी है। पाकिस्तानी करेंसी में यह 165 करोड़ रुपए से ज्यादा है। इस तरह पाकिस्तान पर दोतरफा मार पड़ रही है। सिंधू जल संधि को लेकर उसे पानी तो मिल नहीं रहा, भारत के हिस्से की अदालती फीस भी चुकानी पड़ रही है। पाकिस्तान ने दशकों से पानी जमा करने के लिए कोई बड़ा स्टोरेज नहीं बनाया जिसकी कीमत उसे अब चुकानी पड़ रही है। अब वह अपने आपको पीड़ित दिखाकर भारत पर सिंधू जल संधि को बहाल कराने में दूसरे देशों की मदद लेना चाहता है। इसके लिए उसने अपने देश की यात्रा पर आई कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद से गुहार लगाई। हालांकि इस मामले में न तो अनीता आनंद और न ही कनाडा सरकार ने कोई प्रतिािढया दी है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी दूत पी. हरीश ने भारत का रूख स्पष्ट करते हुए कहा कि सिंधू जल संधि पर हमारा रुख साफ और एक जैसा है। जब सीमा पार आतंकवाद का इस्तेमाल लगातार सरकारी नीति के एक हथियार के तौर पर किया जा रहा हो तो आपसी भरोसे और सद्भावना के आधार पर सहयोग की उम्मीद नहीं की जा सकती। पाकिस्तान सिंधू जल संधि को लेकर दुनिया के सामने झूठ बोल रहा है। इस संधि की प्रस्तावना के अनुसार पाकिस्तान ने न तो अच्छी नीयत दिखाई है और न ही दोस्ती। वह लागातार भारत के खिलाफ आंतकवाद को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते भारत को किसी ऐसी संधि में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो उसके हित में न हो। जिस दिन भारत इस संधि से बाहर निकल आया और उसने पाकिस्तान का पानी रोक दिया उसी दिन पाकिस्तान के खेतों की जमीन बंजर होनी शुरू हो जाएगी और उसे इतना नुकसान होगा कि उसके हाथ में भीख का कटोरा आ जाएगा। बेहतर होगा कि पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद करे और दाउद जैसे भारत के अपराधियों को वापस भेजे ताकि स्थिति को और बिगड़ने से बचाया जा सके।