जापान में शाही परिवार में पुरुष उत्तराधिकार को मजबूत करने वाला संशोधित कानून पारित
प्रकाशित: 18-07-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
तोक्यो, (एपी)। जापान की संसद ने शुक्रवार को 19वीं सदी के शाही परिवार कानून में एक ऐतिहासिक संशोधन पारित किया। इस संशोधन में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल पुरुष उत्तराधिकार ही सम्राट बन सकते हैं। इन बदलावों में भविष्य के उत्तराधिकारी पैदा करने के लिए दूर के पुरुष रिश्तेदारों को गोद लेना और राजकुमारियों को आम लोगों से शादी करने के बाद भी अपना शाही दर्जा बनाए रखने की इजाजत देना शामिल है।
शाही मामलों पर नजर रखने वालों और विशेषज्ञों को आशंका है कि नए नियमों से।,500 साल पुरानी वंशानुगत संस्था खत्म हो सकती है क्योंकि इनमें जोर दिया गया है कि सिर्फ पुरुष उत्तराधिकारी ही सम्राट बन सकते हैंअ इससे तेजी से सिकुड़ते शाही परिवार और उसके बूढ़े होते सदस्यों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
सम्राट नारुहितो की 24 साल की बेटी राजकुमारी आइको बहुत लोकप्रिय हैं और कई जापानी चाहते हैं कि वही उनकी उत्तराधिकारी बनें। महिला होने के कारण राजकुमारी आइको इसके लिए पात्र नहीं हैं।
जापान में उत्तराधिकार के लिए सिर्फ पुरुषों को ही चुने जाने के नियम का मतलब है कि सम्राट के छोटे भाई और उनके 19 वर्षीय भतीजे प्रिंस हिसाहितो उत्तराधिकार की कतार में होंगे जो संभवत: अगले उत्तराधिकारी बनेंगे। उनके बाद इस क्रम में सम्राट के 90 साल के चाचा आते हैं। शाही परिवार में लड़कों को बहुत अहमियत दी जाती है और हिसाहितो पिछले चार दशकों में पैदा होने वाले पहले ऐसे लड़के हैं। शाही परिवार के 16 वयस्क सदस्यों में से सिर्फ पांच पुरुष हैं और परिवार में कोई बच्चा नहीं है। यह बात इसलिए अहम है क्योंकि प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और दूसरे कंजरवेटिव नेताओं का कहना है कि पुरुष वंशावली ही सम्राट के अधिकार और वैधता का एकमात्र स्रोत है और यही आने वाले फैसलों का आधार बनेगी। शाही परिवार के कानून के मुताबिक भले ही सम्राट की मां आम नागरिक हो सकती है लेकिन गद्दी का वारिस सिर्फ शाही परिवार का बालक ही बन सकता। मौजूदा सम्राट की पत्नी एक आम नागरिक हैं।
पुराने कानून में शुक्रवार को किए गए बदलाव का मकसद उस अहम वंश-परंपरा को मजबूत करना हैअ इसके तहत शाही परिवार के दूर के पुरुष रिश्तेदारों को गोद लेने की इजाजत होगी, ताकि वे भविष्य के वारिस पैदा कर सकें।
नए नियमों के तहत राजकुमारियों को भी अपना शाही दर्जा बनाए रखने की अनुमति होगी, भले ही वे किसी आम नागरिक से विवाह करें।
नागोया विश्वविद्यालय में राजशाही के जानकार हिदेया कावानिशी ने कहा, यह महिला शासकों को रोकने... और हर हाल में पुरुष वंश को बनाए रखने का एक ऐलान है। वे इसे पुरुषों का वर्चस्व नहीं कह सकते, इसलिए इसे परंपरा का नाम देते हैं।
जापान में अब तक आ" महिला शासक रही हैं। आखिरी महिला शासक महारानी गोसाकुरामाची थीं, जिन्होंने 1762 से 1770 तक शासन किया।
पुरुष उत्तराधिकार का नियम पहली बार 1890 के शाही परिवार कानून में तय किया गया था, जब जापान पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बढ़ावा दे रहा था। उस कानून को काफी हद तक 1947 के मौजूदा कानून में भी शामिल किया गया।
आइको के जन्म के बाद उनकी मां महारानी मसाको को तनाव के कारण मानसिक समस्या हो गई थी। ऐसा माना जाता है कि यह समस्या उन्हें बेटे को जन्म नहीं दे पाने की वजह से हुई आलोचनाओं के कारण हुई थी। मसाको हार्वर्ड से पढ़ी-लिखी पूर्व राजनयिक और आम नागरिक हैं।
शाही परिवार के मामलों को देखने वाली एजेंसी के पूर्व प्रमुख शिंगो हाकेटा ने हाल में क्योदो न्यूज को बताया कि शाही परिवार में उत्तराधिकार के लिए सिर्फ पुरुषों को ही चुने जाने के नियमों और आम नागरिकों से शादी करने वाली राजकुमारियों को शाही परिवार से बाहर किए जाने के कारण हिसाहितो के बाद राजशाही का भविष्य बेहद अस्थिर हो गया।
इतिहासकारों का कहना है कि पुरुषों को ही उत्तराधिकारी बनाने वाली यह व्यवस्था आज के समय में व्यावहारिक नहीं है क्योंकि जापान तेजी से बूढ़ी होती और घटती आबादी की समस्या का सामना कर रहा है।
शाही मामलों पर नजर रखने वालों और विशेषज्ञों को आशंका है कि नए नियमों से।,500 साल पुरानी वंशानुगत संस्था खत्म हो सकती है क्योंकि इनमें जोर दिया गया है कि सिर्फ पुरुष उत्तराधिकारी ही सम्राट बन सकते हैंअ इससे तेजी से सिकुड़ते शाही परिवार और उसके बूढ़े होते सदस्यों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
सम्राट नारुहितो की 24 साल की बेटी राजकुमारी आइको बहुत लोकप्रिय हैं और कई जापानी चाहते हैं कि वही उनकी उत्तराधिकारी बनें। महिला होने के कारण राजकुमारी आइको इसके लिए पात्र नहीं हैं।
जापान में उत्तराधिकार के लिए सिर्फ पुरुषों को ही चुने जाने के नियम का मतलब है कि सम्राट के छोटे भाई और उनके 19 वर्षीय भतीजे प्रिंस हिसाहितो उत्तराधिकार की कतार में होंगे जो संभवत: अगले उत्तराधिकारी बनेंगे। उनके बाद इस क्रम में सम्राट के 90 साल के चाचा आते हैं। शाही परिवार में लड़कों को बहुत अहमियत दी जाती है और हिसाहितो पिछले चार दशकों में पैदा होने वाले पहले ऐसे लड़के हैं। शाही परिवार के 16 वयस्क सदस्यों में से सिर्फ पांच पुरुष हैं और परिवार में कोई बच्चा नहीं है। यह बात इसलिए अहम है क्योंकि प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और दूसरे कंजरवेटिव नेताओं का कहना है कि पुरुष वंशावली ही सम्राट के अधिकार और वैधता का एकमात्र स्रोत है और यही आने वाले फैसलों का आधार बनेगी। शाही परिवार के कानून के मुताबिक भले ही सम्राट की मां आम नागरिक हो सकती है लेकिन गद्दी का वारिस सिर्फ शाही परिवार का बालक ही बन सकता। मौजूदा सम्राट की पत्नी एक आम नागरिक हैं।
पुराने कानून में शुक्रवार को किए गए बदलाव का मकसद उस अहम वंश-परंपरा को मजबूत करना हैअ इसके तहत शाही परिवार के दूर के पुरुष रिश्तेदारों को गोद लेने की इजाजत होगी, ताकि वे भविष्य के वारिस पैदा कर सकें।
नए नियमों के तहत राजकुमारियों को भी अपना शाही दर्जा बनाए रखने की अनुमति होगी, भले ही वे किसी आम नागरिक से विवाह करें।
नागोया विश्वविद्यालय में राजशाही के जानकार हिदेया कावानिशी ने कहा, यह महिला शासकों को रोकने... और हर हाल में पुरुष वंश को बनाए रखने का एक ऐलान है। वे इसे पुरुषों का वर्चस्व नहीं कह सकते, इसलिए इसे परंपरा का नाम देते हैं।
जापान में अब तक आ" महिला शासक रही हैं। आखिरी महिला शासक महारानी गोसाकुरामाची थीं, जिन्होंने 1762 से 1770 तक शासन किया।
पुरुष उत्तराधिकार का नियम पहली बार 1890 के शाही परिवार कानून में तय किया गया था, जब जापान पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बढ़ावा दे रहा था। उस कानून को काफी हद तक 1947 के मौजूदा कानून में भी शामिल किया गया।
आइको के जन्म के बाद उनकी मां महारानी मसाको को तनाव के कारण मानसिक समस्या हो गई थी। ऐसा माना जाता है कि यह समस्या उन्हें बेटे को जन्म नहीं दे पाने की वजह से हुई आलोचनाओं के कारण हुई थी। मसाको हार्वर्ड से पढ़ी-लिखी पूर्व राजनयिक और आम नागरिक हैं।
शाही परिवार के मामलों को देखने वाली एजेंसी के पूर्व प्रमुख शिंगो हाकेटा ने हाल में क्योदो न्यूज को बताया कि शाही परिवार में उत्तराधिकार के लिए सिर्फ पुरुषों को ही चुने जाने के नियमों और आम नागरिकों से शादी करने वाली राजकुमारियों को शाही परिवार से बाहर किए जाने के कारण हिसाहितो के बाद राजशाही का भविष्य बेहद अस्थिर हो गया।
इतिहासकारों का कहना है कि पुरुषों को ही उत्तराधिकारी बनाने वाली यह व्यवस्था आज के समय में व्यावहारिक नहीं है क्योंकि जापान तेजी से बूढ़ी होती और घटती आबादी की समस्या का सामना कर रहा है।