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अंग्रेजी अनुवादों ने अर्थ का अनर्थ किया

प्रकाशित: 18-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
अंग्रेजी अनुवादों ने अर्थ का अनर्थ किया
डॉ. प्रवेश कुमार
भारत में आज ये उपयुक्त समय है जब हम भारत के इतिहास और उसकी बौद्धिक सम्पदा को पुन निहारे अथवा ‘रीविज़िट दा हिस्ट्री एंड इंटिलेक्ट'। अगर मैं ऐसा कह रहा हूँ तो इसके पीछे का कारण है पिछले एक दशक से ज़्यादा वर्षों में भारत के पटल में उभरी हिन्दू अस्मिता, जो कोई बाहर से आयी चीज़ नही है बल्कि ये हमारी अपनी है, देशज है। जिस भारत के ज्ञान- विज्ञान की ख्याति विश्व में रही उसी भारत को अंग्रेज़ी बौद्धिक जमात ने ‘सँपेरों का देश' कहा या फिर अंग्रेज़ी बौद्धिक जमात ने एक थ्योरी दि ‘वाइट मेन बर्डन' जिसमें ये माना की अंग्रेजो का भारत में शासन भारत के जाहिल लोगों को सभ्य बनाने हेतु हुआ है। इसमें एक मज़े बात ये भी है की हमारे भारत में मैकाले के मानस पुत्रों ने तो भारत में अंग्रेज़ी शासन को भगवान की कृपा भी माना लिया। अभी माह पहले संसद की भाषा से संबंधित संसदीय समिति में देश के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा की अंग्रेज़ी का स्थान्तरण हिंदी एवं स्थानीय भाषाओं से करे। वही देश के प्रधानमंत्री का हिंदी के प्रति आग्रह इसने भारत के ज़न मानस में एक आत्मविश्वास ज़रूर जागृत किया है।
हमारे देश में तमाम समस्याओं का समाधान भी अंग्रेज़ी के हटने और हिन्दी एवं स्थानीय भाषाओं के प्रचलन एवं दैशिक चिंतन से होने वाला है। हमें हमारी भाषा को अपने ज्ञान का माध्यम बना आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है निज भाषा के दम ही तो दुनिया के देश आज तरक़्क़ी कर रहे है, चीन, जापान, इज़राइल सभी देश अपनी भाषा से ही इतना आगे है। भारत ही दुनिया में ऐसा देश है जो की अपनी भाषाओं की उपेक्षा कर अंग्रेज़ी को ही अपनी मुक्तिदात्ता मान बैठा है। इस अंग्रेज़ी भाषा की मकड़जाल ने हमें हमारे देशज शब्दों तक के अर्थ से मुक्त कर दिया है, हम हमारे दैशिक ज्ञान से मुक्त होते जा रहे है। जिस दैशिक चिंतन को बद्री शाह टूलधारिया ने ‘देश की रक्षा' करने वाला माना है हम उसे विस्मृत कर चुके है। ऐसा क्या था? की गाँधी जी अपने तमाम भाषणो में हिन्दी को लेकर आग्रह किया था। 1916, 29 दिसम्बर को प्रताप अख़बार में छपा जिसमें गाँधी कहते है की ‘थोड़ी अंग्रेज़ी बोलने में भी मुझे ऐसा मालूम पड़ता है मानो मैंने कोई पाप किया हो'।
उत्तर प्रदेश के काशी प्रवास में वे कहते है ‘ हिंदी भाषा में जब तक सार्वजनिक सारा कार्य नही होता तब तक देश की उन्नति नही हो सकती। राष्ट्रीय सभा में जब तक राष्ट्रभाषा द्वारा ही सब काम नही तब तक स्वराज्य नही मिल सकता'। गाँधी आगे ये भी कहते है की ‘प्रांतो में प्रांतीय भाषा पर और राष्ट्रीय प्रश्नो पर राष्ट्रभाषा हिंदी में काम हो'। गाँधी, अम्बेडकर, विनोबा, राम मनोहर लोहिया, दीनदयाल आदि सभी निज भाषा में ज्ञान प्राप्त करना क्यू अपरिहार्य मान रहे थे, भाषा महत्व को देखते हुए गाँधी ने हिंदी को स्वराज्य प्राप्ति के साथ जोड़ दिया। ये इस लिए था क्यूँकि निज भाषा में प्राप्त किया ज्ञान व्यक्ति के भाव से जुड़ता है वो जल्दी आत्मसात भी हो जाता है। भारत जिसकी पहचान को लेकर ऋषि कहता है-
हिमालयं समारभ्य यावत् इंदु सरावरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्षते।।
यानि की भारत वो भूमि है जिसे देवता के द्वारा निर्मित किया गया, ये कोई साधारण भूमि नही है। आपके मन में भी कभी तो ये प्रश्न अनायास ही आ ही जाता होगा की दुनिया का कोई भी देश भारत जैसा क्यू नही है?। जहाँ तमाम तरह की ऋतुए है, अनेको प्रकार के खाद्य पदार्थ है, भौगोलिक स्थिति भी कितने ही प्रकार की है। नाना प्रकार की भाषाऐ बोलने वाले लोग एवं तमाम पूजा पद्धति का अनुसरण करने वाले लोग है लेकिन इसमें सबसे ध्यान देने वाली बात ये है की दुनिया की तरह भारत का इतिहास किसी बहुत बड़े संघर्ष का नही रहा है। अन्यथा हम सब भलिभाँति जानते है की एक भाषा, एक मत के आधार पर दुनिया में ‘नेशन' का जन्म हुआ लेकिन क्या भारत राष्ट्र भी इसी आधार पर बना है।
अब मैं यही से अपनी बात को शुरू करता हूँ जब मैंने कहा कि दुनिया में भाषा, मत के आधार पर एक नेशन बना करते है तो वही ये भी हमें जानने की आवश्यकता है की भारत क्या नेशन है? अगर नेशन की परिभाषा में जाए जो ]िफलोडोलि]िफया की सन्धि जिसने नेशन को परिभाषित किया एक समान संस्कृति, भाषा, एथनिसिटी, रिलिजन, पूर्वज आदि के आधार पर एक नेशन बनता है। इस परिभाषा के आधार पर तो हम कभी भी नेशन नही हो सकते है क्यूँकि हमारे यहाँ तो ना एक समान भाषा है, ना एक ही रिलिजन ही हाँ हम संस्कृतिक रूप ज़रूर एक है। इसलिए हमारे अंग्रेज़ी ज्ञान ने बड़े- बड़े विश्वविद्यालयों में आज भी अंग्रेज़ी नेशन को भारत के राष्ट्र के रूप में ही समझाया बल्कि अगर इन दोनो के अर्थों को देखा जाए तो दोनो के बीच क़ाफी अंतर है। नेशन जहाँ दुनिया में नेशनलिज़्म में परिवर्तित हो गया जो दुनिया में हिंसा एवं आधिपत्य का पर्याय बना, वही हमारा राष्ट्र तो दुनिया में विश्व कुटुम्ब का संदेश ही देता है। पश्चिम का राष्ट्र एक भौतिक संकल्पना है वही भारत का राष्ट्र आध्यात्मिक एवं संस्कृतिक है, हम सीमा में नही बंधे और ना ही एक रंगी ही है भाषा, मत-सम्प्रदाय, खान पान की भिन्नता के बावजूद देश भर में हमारे हिन्दू संस्कृति के प्रतीक हमें एक राष्ट्र होने का अहसास कर ही देते है। दुनिया में एक रिलिजन के होने के बावजूद राष्ट्रीयता को आधार बना कर भी संघर्ष हुए है, हम जाने की हमारा दैशिक चिंतन कितना श्रेष्ठ है। वही भारत का समाज कोई अंग्रेज़ी सोसायटी नही हो सकता अंग्रेज़ी भाषा की सोसायटी कुछ लोगों का समूह है ज़रूरी नही की उनमें आपस में कोई एकत्व का भाव हो लेकिन भारत के समाज की संकल्पना ही एकत्व भाव पर टिकी है ‘हम एक ही है' ये ही तो हमारे समाज का आधार है। जिस समाज को प्रभु राम बताते है की समाज व्यक्ति - व्यक्ति में मध्य भ्रातृत्व भाव के आधार पर ही बनता है। उसी बन्धु भाव की बात तो बाबा साहब अम्बेडकर भी करते है उसी समाज की संकल्पना तो हमारा आधार है। हमने अपने दैशिक चिंतन की उपेक्षा की इसी का परिणाम है की ‘ज्ञाति' को हम जाति मान तमाम तरह के सामाजिक बंधनो को जकड़ने लगे समाज में सबसे अधिक काम करने वाले वर्ग को हम अस्पृश्य मान उसकी उपेक्षा करने लगे, उसकी प्रताड़ना करने लगे जिस शूद्र कुल ने वेद, उपनिषद, रामायण आदि ग्रंथ दिए जिस चांडाल मतंग ऋषि की संतान पराशर और उनके शूद्र पुत्र व्यास ने वेदों की ऋचाओं को संकलित किया।
वही महभारत के पात्र कौरवों और पंडाओ के वो पिता थे, प्रभु राम को दुनिया से परिचित कराने वाले वाल्मीकि ऋषि ये सभी कौन थे। आज भी हम इनहि की संतानो को अस्पृश्य मान हम इन्हें प्रताड़ित कर रहे है। इन सबका कारण हमारा हमारी अपनी ज्ञान परम्परा से विमुख होना ही है। वही भारत के धर्म को रिलिजन मान कितने ही संघर्षो को हमने जन्म दे दिया है। हिन्दू भारत की पहचान है इसे नकारा नही जा सकता है और ये ही हमारा धर्म भी है। कोई इस्लाम को मानने वाल कितना भी अपने को अलग माने लेकिन उसकी रंगों में बह रह रक्त इस भारत का है वो सब भी हिन्दू ही है। हिन्दू धर्म को आप रिलिजन बिल्कुल भी नही कह सकते लेकिन वर्षों-वर्षों गिट- पिट अंग्रेज़ी बोलने वाले हमारे ही देश के लोगों ने हमारे धर्म को रिलिजन बना कर ही पेश किया। इसी का परिणाम है की समाज में विभाजन हुआ भारत में से पाकिस्तान बन गया। जबकि धर्म और रिलिजन में बहुत मूलभूत अंतर है, रिलिजन जहाँ एक किताब, एक भगवान,एक पूजा विधि से जुड़ा है वही धर्म पूर्णत: व्यक्ति के सामाजिक दायित्व का बौद्ध कराता है। रिलिजन अपने अर्थ में एक्सक्लूसिव है वो अपने ही तरह के आचरण करने वालों का समूह है वही धर्म अपनी प्रकृति में ही इंक्लूसिव है सभी को समाहित करने वाला है मानवता, दायित्व से ये जुड़ा है। इसलिए हमें अंग्रेज़ी अनुवाद के स्थान पर अपने दैशिक भाषा के शब्दों को लेने की आवश्यकता है, हिंदी या हमारी स्थानीय भाषा के शब्द अर्थ पूर्ण भावों के साथ जुड़े हैं वहीं अंग्रेज़ी बिना भाव की भाषा है अंग्रेज़ी में आंटी और अंकल सभी एक ही हैं परन्तु हमारे यहां चाची, बुआ, मामी, ताई, वहीं चाचा, मामा सब अलग हैं, ये सब भाव के साथ भी जुड़े हैं। अंग्रेज़ी जहां मृत भाषा है वहीं हिंदी एवं स्थानीय भाषा जीवंत है।
(लेखक सहायक प्रोफेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केन्द्र, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली।)