हरीश राणा Vs आनंद- 4 Cr. लगा चुके, जमीन-जायदाद बेच दिया, लेकिन उम्मीद बाकी-एक दिन बेटा पुकारेगा- मां,पापा...
प्रकाशित: 18-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
मुंबई:
भारत अभी 'हरीश राणा' के उस दर्दनाक मामले से उभरा भी नहीं था, जिसने दशकों के सन्नाटे के बाद 'गरिमामय मृत्यु' की बहस छेड़ दी थी. लेकिन मुंबई के एक अंधेरे कोने में, 35 साल का आनंद दीक्षित उसी त्रासदी की एक ज़िंदा परछाईं बन चुके हैं. पिछले ढाई सालों से आनंद एक 'वेजिटेटिव स्टेट' में कैद है. एक ऐसा शून्य जहां दिल तो धड़कता है, पर रूह कहीं खो गई है. आनंद के माता-पिता उसे अपना 'चिराग' कहते हैं, और वो इस बुझते चिराग की लौ को थामे रखने के लिए अपनी पूरी दुनिया 'जला' चुके हैं.
एक नई स्कूटी और वो कोहरे वाली रात
इस बुरे सपने की शुरुआत हुई 29 दिसंबर 2023 की उस सर्द रात को. गोरखपुर में आनंद अपनी उसी दिन खरीदी हुई नई स्कूटी पर सवार था. जो गाड़ी उसके सपनों की उड़ान बनने वाली थी, वही उसकी बर्बादी का ज़रिया बन गई. घने कोहरे में हुए उस हादसे ने आनंद को मशीनों और ट्यूब के सहारे ज़िंदा रहने पर मजबूर कर दिया. आनंद के केयरटेकर, अर्जुन प्रजापति, पिछले 18 महीनों से उसकी पलक झपकने या हाथ हिलाने का इंतज़ार कर रहे हैं, पर सन्नाटा टूटने का नाम नहीं ले रहा.
घर बिका, छत छिन गई
आनंद की हर धड़कन को ज़िंदा रखने के लिए दीक्षित परिवार अब तक 4 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च कर चुका है. इलाज के लिए ज़मीन और जीवन भर की जमापूंजी बिक गई. जब परिवार कोकिलाबेन और लोटस जैसे अस्पतालों में बेटे की सांसों के लिए लड़ रहा था, तब मुंबई में बीएमसी (BMC) ने उनके इकलौते घर पर बुलडोजर चला दिया.रही-सही कसर इंश्योरेंस कंपनी ने पूरी कर दी. परिवार का आरोप है कि केयर हेल्थ इंश्योरेंस ने उनके मेडिकल क्लेम को खारिज कर दिया, जिसके चलते उन्हें 50 लाख रुपये का अतिरिक्त कर्ज़ लेना पड़ा.
उम्मीद की कोई भाषा नहीं होती
भारत एक और हरीश राणा का बोझ इसलिए नहीं उठा सकता क्योंकि हमारे पास ऐसी परिवारों को बचाने के लिए एक सिस्टम की ज़रूरत है. जहाँ कानून 'सम्मानजनक विदाई' (Passive Euthanasia) की बात करता है, वहीं एक माँ की उम्मीद के पास ऐसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है. आनंद की मां ने आज भी उसके महंगे कपड़े, घड़ियां और मोबाइल संभाल कर रखे हैं इस आस में कि एक दिन वह जागेगा और उन्हें 'मां-पापा' कहकर पुकारेगा.दीक्षित परिवार का यह मामला एक खौफनाक चेतावनी है जब तक बीमा और चिकित्सा के कानून नहीं बदलते, तब तक 'वेजिटेटिव स्टेट' सिर्फ मरीज़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए एक मौत की सज़ा बना रहेगा.
भारत अभी 'हरीश राणा' के उस दर्दनाक मामले से उभरा भी नहीं था, जिसने दशकों के सन्नाटे के बाद 'गरिमामय मृत्यु' की बहस छेड़ दी थी. लेकिन मुंबई के एक अंधेरे कोने में, 35 साल का आनंद दीक्षित उसी त्रासदी की एक ज़िंदा परछाईं बन चुके हैं. पिछले ढाई सालों से आनंद एक 'वेजिटेटिव स्टेट' में कैद है. एक ऐसा शून्य जहां दिल तो धड़कता है, पर रूह कहीं खो गई है. आनंद के माता-पिता उसे अपना 'चिराग' कहते हैं, और वो इस बुझते चिराग की लौ को थामे रखने के लिए अपनी पूरी दुनिया 'जला' चुके हैं.
एक नई स्कूटी और वो कोहरे वाली रात
इस बुरे सपने की शुरुआत हुई 29 दिसंबर 2023 की उस सर्द रात को. गोरखपुर में आनंद अपनी उसी दिन खरीदी हुई नई स्कूटी पर सवार था. जो गाड़ी उसके सपनों की उड़ान बनने वाली थी, वही उसकी बर्बादी का ज़रिया बन गई. घने कोहरे में हुए उस हादसे ने आनंद को मशीनों और ट्यूब के सहारे ज़िंदा रहने पर मजबूर कर दिया. आनंद के केयरटेकर, अर्जुन प्रजापति, पिछले 18 महीनों से उसकी पलक झपकने या हाथ हिलाने का इंतज़ार कर रहे हैं, पर सन्नाटा टूटने का नाम नहीं ले रहा.
घर बिका, छत छिन गई
आनंद की हर धड़कन को ज़िंदा रखने के लिए दीक्षित परिवार अब तक 4 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च कर चुका है. इलाज के लिए ज़मीन और जीवन भर की जमापूंजी बिक गई. जब परिवार कोकिलाबेन और लोटस जैसे अस्पतालों में बेटे की सांसों के लिए लड़ रहा था, तब मुंबई में बीएमसी (BMC) ने उनके इकलौते घर पर बुलडोजर चला दिया.रही-सही कसर इंश्योरेंस कंपनी ने पूरी कर दी. परिवार का आरोप है कि केयर हेल्थ इंश्योरेंस ने उनके मेडिकल क्लेम को खारिज कर दिया, जिसके चलते उन्हें 50 लाख रुपये का अतिरिक्त कर्ज़ लेना पड़ा.
उम्मीद की कोई भाषा नहीं होती
भारत एक और हरीश राणा का बोझ इसलिए नहीं उठा सकता क्योंकि हमारे पास ऐसी परिवारों को बचाने के लिए एक सिस्टम की ज़रूरत है. जहाँ कानून 'सम्मानजनक विदाई' (Passive Euthanasia) की बात करता है, वहीं एक माँ की उम्मीद के पास ऐसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है. आनंद की मां ने आज भी उसके महंगे कपड़े, घड़ियां और मोबाइल संभाल कर रखे हैं इस आस में कि एक दिन वह जागेगा और उन्हें 'मां-पापा' कहकर पुकारेगा.दीक्षित परिवार का यह मामला एक खौफनाक चेतावनी है जब तक बीमा और चिकित्सा के कानून नहीं बदलते, तब तक 'वेजिटेटिव स्टेट' सिर्फ मरीज़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए एक मौत की सज़ा बना रहेगा.