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पाक करता रमजान में मुसलमानों का कत्ल

प्रकाशित: 18-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
पाक करता रमजान में मुसलमानों का कत्ल
विवेक शुक्ला
पाकिस्तान खुद को दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामिक देश बताता है। इसका झंडा हिलाल (चांद का टुकड़ा) और तारा से सजा है, जो इस्लामिक परंपरा और मूल्यों के प्रतीक हैं। इसके नाम में इस्लामिक रिपब्लिक जुड़ा है, और ये हर मौके पर इस्लाम का हवाला देता है। लेकिन हकीकत में यह देश मुसलमानों के खिलाफ ही सबसे ज्यादा हिंसा और जुल्म का इतिहास रखता है। यह पाखंड की एक लंबी कहानी है, जहां इस्लाम का नाम सिर्फ सत्ता और नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि अमल उसके ठीक उलट है।
इसका सबसे ताजा और दिल दहला देने वाला उदाहरण बीते सोमवार (16 मार्च 2026) को काबुल में मिलता है। पाकिस्तानी एयर स्ट्राइक ने अफगानिस्तान की राजधानी में ओमिद एडिक्शन ट्रीटमेंट हॉस्पिटल (एक ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटर) को निशाना बनाया।
तालिबान सरकार के अनुसार, इस हमले में 400 से ज्यादा लोग मारे गए और 250 से अधिक घायल हुए। हमला रमजान के पवित्र महीने में हुआ, जब लोग रोजा रखकर इबादत में मग्न थे। अस्पताल में ज्यादातर गरीब अफगान मुसलमान थे, जो नशे की लत से मुक्ति पाने आए थे।
पाकिस्तान का दावा है कि उसने सिर्फ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, लेकिन तालिबान और अफगान मीडिया इसे साफ-साफ सिविलियन अस्पताल पर हमला बता रह है। सवाल वही है-रमजान में मुसलमानों के अस्पताल को उड़ाना क्या इस्लाम की कोई शिक्षा है? मारे गए तो आम मुसलमान ही थे।
यह कोई नई बात नहीं। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट के तहत लाखों बंगाली मुसलमानों का कत्लेआम किया। बंगालियों ने आजादी की मांग की, तो उन्हें काफिर, गद्दार और हिंदू एजेंट कहकर मार डाला गया।
अनुमान के मुताबिक, 3 लाख से ज्यादा लोग मारे गए, 2 से 4 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। स्कूल, कॉलेज, गांव सब तबाह कर दिए गए। पाकिस्तानी जनरल टिक्का खान को बचर ऑफ बंगाल कहा गया। पाकिस्तान आज भी इसे सिविल वॉर कहकर सच छुपाता है, लेकिन बांग्लादेश हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाता है। एक इस्लामिक देश ने अपने ही मुसलमानों पर ऐसा जुल्म ढाया- यह पाखंड नहीं तो क्या है?
पाकिस्तान के अंदर भी मुसलमान सुरक्षित नहीं। अहमदिया समुदाय को 1974 के संविधान संशोधन और ऑर्डिनेंस एक्सएक्स के जरिए नॉन-मुस्लिम घोषित कर दिया गया। उन्हें मस्जिद कहने, अजान देने, सलाम कहने या कुरान छूने तक की मनाही है।
अगर कोई अहमदिया खुद को मुसलमान कहे, तो ब्लास्फेमी का केस बन जाता है। हाल के वर्षों में कई अहमदिया डॉक्टर, दंत चिकित्सक और आम नागरिक गोली मारे गए। खुशाब में 90 अहमदिया कब्रें तोड़ी गईं। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्ट्स और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं बताती हैं कि पुलिस भी अहमदिया घरों पर हमलों में शामिल होती है। शिया मुसलमान भी निशाने पर हैं, खासकर हजारा शिया। इन पर बलूचिस्तान और कुर्रम एजेंसी में बार-बार हमले होते हैं। 2024 में 40 से ज्यादा शिया मारे गए, 2013 के क्वेटा हमले में 90 से अधिक। सेना और कानून इन पर कार्रवाई नहीं करती, बल्कि चुप रहती है।
एक देश जो खुद को इस्लाम का गढ़ कहता है, वहां शिया और अहमदिया को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।
जनवरी 2024 में पाकिस्तान ने ईरान पर ऑपरेशन मार्ग बार सरमाचार के तहत मिसाइल हमले किए। दोनों देश मुस्लिम हैं-ईरान शिया बहुल, पाकिस्तान सुन्नी-लेकिन हमला फिर मुसलमानों पर ही हुआ।
तो पाकिस्तान मुसलमानों को क्यों मारता है? मुख्य कारण सेना की सर्वोच्चता है। आर्मी इस्लाम के नाम पर सत्ता संभालती है, लेकिन उसकी नीतियां सेक्टेरियन हैं।
सुन्नी बहुल सेना शिया, अहमदिया और अन्य समुदायों को कमजोर रखना चाहती है। दूसरा, राजनीतिक खेल-तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद जैसे गुटों को पाला जाता है, लेकिन अब टीटीपी पाक फौज पर हमला कर रही है, तो बदले में अफगानिस्तान पर हमला। मुसलमान ही मुसलमान का शिकार बन रहा है। तीसरा, इस्लाम का दुरुपयोग-सिस्टम इस्लाम के नाम पर चलता है, लेकिन असल में पावर और नियंत्रण का खेल है। अहमदिया को काफिर, बंगालियों को हिंदू एजेंट कहकर मार डाला जाता है। कुरान में साफ है: मुसलमान एक-दूसरे के भाई हैं। लेकिन पाकिस्तान की फौज, सरकार और कानून इसके उलट चल रहे हैं। रमजान में 400 मुसलमान मारे गए, 1971 में लाखों, शिया-अहमदिया रोज मर रहे, ईरान पर माह्न-श्् सब एक ही सिलसिला है। पाकिस्तान मुसलमानों का दुश्मन बन चुका है, जबकि खुद को इस्लाम का रक्षक बताता है।
दुनिया को यह सच देखना चाहिए। पाकिस्तान अभी भी इस्लाम का सिपाही होने का दावा करता है, लेकिन हकीकत में वह मुसलमानों का कातिल है। अगर सच में इस्लामिक देश बनना है, तो पहले अपने मुसलमानों की हिफाजत करे-अहमदिया और शिया को बराबरी दे, अफगानिस्तान से बातचीत करे, 1971 के नरसंहार की माफी मांगे। लेकिन सेना की ताकत और सेक्टेरियन नीतियां जारी रहेंगी, ऐसा लगता है।
पाकिस्तान का इस्लामिक चेहरा नाम का है। असल में यह मुसलमान-विरोधी नीतियों का देश बन चुका है। रमजान में अस्पताल उड़ाना, लाखों मुसलमान मारना, शिया-अहमदिया पर जुल्म-ये सब इस्लाम के खिलाफ हैं। दुनिया के मुसलमानों को समझना चाहिए कि पाकिस्तान का चेहरा दोहरा है-एक तरफ मक्का-मदीना का नाम, दूसरी तरफ मुसलमानों का खून। यह पाखंड कब तक चलेगा?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)