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क्या अमेरिका फंस गया है ईरान के जाल में

प्रकाशित: 18-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच चुका है जहां अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि रणनीति और वैश्विक प्रभाव का भी बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरुआत में जिस तेजी से जीत का दावा किया था वह अब उतना स्पष्ट नहीं दिख रहा है। अब उनका फोकस ईरान को कमजोर करने से हटकर दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने पर आ गया है। यही बदलाव इस पूरे संघर्ष की दिशा और गंभीरता को दर्शाता है। इस संघर्ष के पहले चरण में अमेरिका ने यह मान लिया था कि शुरुआती हमलों के बाद ईरान जल्दी झुक जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान ने लगातार जवाबी हमले किए और वह भी कई देशों तक फैलाकर। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ईरान केवल बचाव नहीं कर रहा बल्कि सािढय रणनीति के तहत क्षेत्रीय दबाव बना रहा है। अमेरिकी ठिकानों पर हमले और संचार तंत्र को नुकसान पहुंचाना इस बात का संकेत है कि ईरान तकनीकी और सैन्य स्तर पर तैयार था। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान का परमाणु कार्पाम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार ईरान के पास अभी भी पर्याप्त संवर्धित यूरेनियम मौजूद है जिससे यह संकेत मिलता है कि वह दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका के शुरुआती हमले निर्णायक नहीं रहे। इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम केंद्र होर्मुज स्ट्रेट बन गया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की रीढ़ माना जाता है। यहां से रोजाना करोड़ों बैरल तेल और गैस गुजरती है। जब ईरान ने इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित किया तो वैश्विक बाजार में तुरंत असर दिखाई दिया। तेल की कीमतों में तेजी आई और कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा। यही वह कारण है कि ट्रम्प को अब अकेले लड़ना मुश्किल लग रहा है और उन्होंने नाटो के साथ साथ चीन और जापान जैसे देशों से मदद की अपील की है। यह कदम इस बात का संकेत है कि अमेरिका इस संकट को केवल अपनी सैन्य ताकत से हल नहीं कर पा रहा है। चीन और जापान से मदद मांगना एक रणनीतिक मजबूरी भी है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी अर्थव्यवस्था इस मार्ग पर निर्भर है। जापान भी ऊर्जा के लिए इस रास्ते पर निर्भर करता है। इसलिए अमेरिका चाहता है कि ये देश भी इस मिशन में शामिल हों ताकि एक वैश्विक दबाव बनाया जा सके।
हालांकि इन देशों की प्रतिािढया बहुत सतर्क रही है। कोई भी देश सीधे सैन्य हस्तक्षेप के लिए तैयार नहीं दिख रहा। इसका मुख्य कारण जोखिम है। होर्मुज स्ट्रेट बेहद संकरा मार्ग है और यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का मतलब सीधा खतरा है। ईरान ने यहां समुद्री माइन्स बिछाने की रणनीति अपनाई है जो किसी भी जहाज के लिए जानलेवा हो सकती है। समुद्री माइन्स को हटाना आसान काम नहीं है। आधुनिक माइन्स को पहचानना मुश्किल होता है और उन्हें निपिय करना जोखिम भरा होता है। इसके अलावा ईरान के पास मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी है जिससे वह किसी भी ऑपरेशन को बाधित कर सकता है। इस कारण कोई भी देश अपनी नौसेना को सीधे खतरे में डालने से बच रहा है। एक और बड़ी चुनौती है कई देशों की सेनाओं का एक साथ संचालन। अलग अलग देशों की तकनीक कम्युनिकेशन और रणनीति अलग होती है। ऐसे में संयुक्त ऑपरेशन करना बेहद जटिल हो जाता है। यही वजह है कि अब तक कोई ठोस सैन्य गठबंधन सामने नहीं आया है। इस संकट का एक और पहलू है इसका वैश्विक असर। दुनिया की लगभग बीस प्रतिशत तेल सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ेगी और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से पूरा करता है। अगर सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर पेट्रोल डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा। इससे आम लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। भारत ने इस पूरे मामले में संतुलित रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं ताकि भारतीय जहाज सुरक्षित रह सकें और सप्लाई बनी रहे। भारत न तो सीधे इस संघर्ष में शामिल होना चाहता है और न ही अपने हितों को नुकसान होने देना चाहता है। इस पूरे घटपाम से यह स्पष्ट होता है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते बल्कि आर्थिक और रणनीतिक नियंत्रण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करके अमेरिका को एक ऐसी स्थिति में ला दिया है जहां उसे वैश्विक समर्थन की जरूरत पड़ रही है।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।