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रणनीतिक हठ

प्रकाशित: 18-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
रणनीतिक हठ
युद्ध प्रभावित होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकलकर भारतीय ध्वज वाला दूसरा जहाज मंगलवार को सुबह गुजरात के कांडला पोर्ट पर पहुंच गया किन्तु वास्तविकता तो यह है कि संघर्ष क्षेत्र में अभी भी 22 जहाज फंसे पड़े हैं। पोर्ट शिपिंग एवं जल मार्ग के विशेष सचिव के मुताबिक दोनों जहाजों से आए 92,712 एलपीजी देश के मात्र एक दिन की खपत के बराबर है। इसका मतलब यह है कि राहत की बात तो की जा सकती है किन्तु जब तक 24 जहाज भारत जल्दी से जल्दी नहीं आ जाते तब तक देश में एलपीजी संकट टलने की कोई उम्मीद नहीं है।
दरअसल युद्ध शुरू होने के समय कुल 28 भारतीय ध्वज वाले जहाज इस क्षेत्र में थे, 24 जलडमरूमध्य के पश्चिमी क्षेत्र में और 4 पूर्वी हिस्से में। अभी पश्चिमी तरफ 22 और पूर्वी तरफ 2 जहाज बचे हैं। भारत बहुत बड़ा देश है, जितनी एलपीजी की जरूरत है जब तक उसकी आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक अनिश्चितता का माहौल इसी तरह बने रहने की उम्मीद है।
सच तो यह है कि जिन लोगों के पास पाइप वाली गैस घर में लगी है, वे भी गैस सिलेंडर भरवाने के लिए लाइन में खड़े हैं। ऐसे लोगों को इतना तो पता है कि देश में गैस की मुसीबत मुंह बाए खड़ी है किन्तु ऐसे स्वार्थी तत्व को मुश्किलों को और अधिक जटिल बनाने में विशेष खुशी मिलती है।
असल में ईरान पर अमेरिका और इजरायल का हमला अप्रत्याशित नहीं था किन्तु यह जरूर अनुमान से परे था कि तेहरान होर्मुज स्ट्रेट जलडमरूमध्य को इस तरह दुनिया को झुकाने के लिए बाधित करेगा। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने के बाद ही ईरान ने यह अतिवादी कदम उठाया है। यदि कोई मरने मारने पर उतारू हो जाए तो भला उससे उम्मीद ही क्या की जा सकती है! यह सच है कि यदि ईरान पर मात्र हमला होता और वहां राजनीतिक, सैन्य एवं परमाणु वैज्ञानिक इतनी संख्या में मारे न गए होते तो ईरान ऐसा कड़ा फैसला न लेता।
बहरहाल ईरान भारत को और भारत ईरान को चाहे जितना घनिष्ठ मित्र बताए तथा एक दूसरे की मदद की बात करे किन्तु वास्तविकता तो यह भी है कि ईरान ने जिस तरह दबाव बनाने के उद्देश्य से यह कठोर कदम उठाया है, उससे इतना तो स्पष्ट हो गया कि ईरान को सारे जहाज दुश्मन के ही नजर आएंगे। इससे ज्यादा हैरानी की बात हो ही नहीं सकती कि अभी दो जहाज भारत को छुड़ाने में एक सप्ताह से ज्यादा लग गए तो अभी 24 जहाजों को छुड़ाने में कितने दिन लगेंगे। सच यही है कि भारत सहित दुनिया के किसी देश को इस बात की उम्मीद ही नहीं थी कि ईरान ऐसा भी करेगा। यद्यापि अब अमेरिका ने ईरान पर आरोप लगाना शुरू किया है कि उसने दुनिया को परेशान करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट जलजमरूमध्य को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है किन्तु सच तो यह है कि इस तरह के दबावी हथकंडे ज्यादा तर देश अपनाते हैं। भारत ने भी आपरेशन सिंदूर के पहले ही नदी जल समझौते को निलंबित कर दिया। लेकिन भारत और ईरान द्वारा उठाए गए दबाव बनाने की कार्रवाई बिल्कुल भिन्न है। कारण कि भारत ने तो मात्र अपने शत्रु राष्ट्र को इस बात का एहसास कराने के लिए नदियों के जल संबंधी समझौते को स्थगित किया था जबकि ईरान ने उन देशों को भी परेशान किया जिन्हें वह अपना मित्र मानता है। इसी को कहते हैं हठधर्मिता। ईरान ने सोचा होगा कि जैसे ही वह कुछ देशों के जहाज रोकेगा तो सभी एकजुट होकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को गालियां देना शुरू कर देंगे। यही नहीं ईरान को यह भी लगा कि प्रभावित देश खुद ही अमेरिका और इजरायल पर दबाव डालकर युद्ध विराम कराएंगे। किन्तु लगता है कि सभी प्रभावित देश अपने परिवहन जहाजों को जलडमरूमध्य से निकालने की कूटनीतिक जुगाड़ में ही लगे हैं। लब्बोलुआब यह है कि अभी तक ईरान को यह एहसास नहीं कराया जा सका है कि वह दुनिया को झुकाने की जो हठ कर रहा है, उससे उसके प्रति ही लोगों में सहानुभूति की कमी हो रही है।