आखिर अधिक बच्चे क्यों नहीं चाहता आज का भारत?
प्रकाशित: 09-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है। रोटी के लिए रोजगार चाहिए, रोजगार के लिए शिक्षा चाहिए और शिक्षा के लिए धन चाहिए। कपड़े सस्ते भी पहने जा सकते हैं, लेकिन मकान सस्ता नहीं मिलता। यही वह कठोर यथार्थ है जिसके बीच आज का भारतीय परिवार अपने भविष्य का गणित बैठा रहा है। इसलिए भारत में जनसंख्या का प्रश्न अब केवल जन्मदर का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न बन चुका है।
भारत की जनसँख्या विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 17.7 प्रतिशत है, जबकि पृथ्वी के कुल भूभाग का मात्र 2.4 प्रतिशत हिस्सा ही भारत के पास है। यह असंतुलन अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। भूमि सीमित है, जल सीमित है, संसाधन सीमित हैं, किंतु उन पर निर्भर लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आज भले ही कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुँच चुकी हो और जनसंख्या वृद्धि की गति मंद पड़ रही हो, किंतु वास्तविक जनसंख्या अभी भी बढ़ रही है। अर्थात् प्रतिशत घट रहा है, पर संख्या बढ़ रही है। यही भारत की जनसांख्यिकीय विडम्बना है।
संसाधनों पर बढ़ता दबाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देता है। महानगरों में लाखों लोग एक कमरे के मकानों में जीवन बिताने को विवश हैं। जमीन के दाम सामान्य नागरिक की पहुँच से बाहर हो चुके हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन की आधी से अधिक कमाई केवल एक छोटे से घर के लिए खर्च कर देता है। घर खरीदना आज आवश्यकता से अधिक एक संघर्ष बन चुका है। युवा नौकरी मिलने के बाद विवाह की नहीं, पहले मकान की चिंता करता है। उसके बाद बच्चों की शिक्षा का प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है।
आज शिक्षा भी एक महँगा निवेश बन चुकी है। अभिभावक जानते हैं कि केवल बच्चे को जन्म देना पर्याप्त नहीं है। उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देनी होगी, प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी करानी होगी, तकनीकी कौशल उपलब्ध कराना होगा और फिर रोजगार की अनिश्चित दुनिया में उसे स्थापित करना होगा। ऐसे में समझदार और शिक्षित परिवार बच्चों की संख्या नहीं, उनकी गुणवत्ता पर ध्यान दे रहे हैं। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि आर्थिक विवशता का परिणाम है।
रोजगार की स्थिति भी जनसंख्या विमर्श को प्रभावित कर रही है। स्थायी नौकरियों का स्थान संविदा आधारित नियुक्तियों ने ले लिया है। लाखों युवा आधे वेतन में दोगुना काम कर रहे हैं। उनके सिर पर हर वर्ष अनुबंध नवीनीकरण की तलवार लटकती रहती है। भविष्य अनिश्चित है, पेंशन का भरोसा नहीं है और सामाजिक सुरक्षा का ढाँचा कमजोर है। जो व्यक्ति स्वयं अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है, वह कई बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी उठाने का साहस कैसे करेगा?
यह स्थिति केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। भारत तेजी से वृद्ध समाज की ओर भी बढ़ रहा है। वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, किंतु उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थाएँ विकसित नहीं हो पा रही हैं। मेट्रो में बैठने की कुछ आरक्षित सीटें उनकी बढ़ती संख्या के सामने अपर्याप्त हैं। रेलों में आकस्मिक यात्रा करने वाले बुजुर्गों को आरामदायक बर्थ मिलना कठिन होता जा रहा है। कोविड काल के बाद रेलवे किराये में मिलने वाली रियायतें भी समाप्त हो गईं। स्वास्थ्य सुविधाएँ महँगी होती जा रही हैं और वृद्धावस्था की चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं।
प्रश्न यह भी है कि आने वाले वर्षों में इन बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा? वह युवा, जो स्वयं अस्थायी रोजगार, महँगी शिक्षा, बढ़ते किराये और सीमित आय के बीच संघर्ष कर रहा है? संयुक्त परिवारों का विघटन हो चुका है। सामाजिक सुरक्षा का भार परिवारों पर है और परिवार स्वयं आर्थिक दबावों से जूझ रहे हैं। ऐसे में वृद्धावस्था की समस्या भविष्य की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक बन सकती है।
जनसंख्या वृद्धि को लेकर समय-समय पर चिंता व्यक्त की जाती है। दूसरी ओर, जन्मदर में कमी को लेकर भी आशंकाएँ प्रकट की जाती हैं। परंतु यह समझना आवश्यक है कि जनसंख्या केवल सांख्यिकीय विषय नहीं है। यह जीवन की परिस्थितियों से संचालित होती है। जब रोजगार सुरक्षित होगा, आवास सुलभ होगा, शिक्षा सस्ती होगी, स्वास्थ्य सेवाएँ भरोसेमंद होंगी और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी, तब परिवार स्वाभाविक रूप से अपने भविष्य के बारे में सकारात्मक निर्णय लेंगे। केवल नैतिक उपदेशों या भावनात्मक अपीलों से जन्मदर नहीं बढ़ती।
आज का युवा अपने बच्चों को वही जीवन नहीं देना चाहता जो उसने स्वयं संघर्ष करके पाया है। वह चाहता है कि उसका बच्चा बेहतर विद्यालय में पढ़े, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ पाए और सम्मानजनक रोजगार हासिल करे। इसलिए वह बच्चों की संख्या सीमित रखता है। इसे सामाजिक पतन नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की भावना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। आखिर बच्चे पैदा करना बड़ा कार्य नहीं है; उनका पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और भविष्य सुरक्षित करना बड़ा कार्य है।
भारत इस समय जनसांख्यिकीय लाभांश के दौर में है। विशाल युवा आबादी देश की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। लेकिन यदि रोजगार, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियों का समाधान नहीं हुआ, तो यही लाभांश बोझ में परिवर्तित हो सकता है। दूसरी ओर, वृद्ध होती आबादी की चुनौतियाँ भी धीरे-धीरे सामने आएँगी। इसलिए आवश्यकता जनसंख्या बढ़ाने या घटाने की बहस से आगे बढ़कर जीवन की गुणवत्ता सुधारने की है।
देश को ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो युवाओं को स्थायी रोजगार दें, परिवारों को सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ, आवास को आम नागरिक की पहुँच में लाएँ तथा बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करें। जब नागरिक भविष्य के प्रति आश्वस्त होगा, तभी वह परिवार और समाज के भविष्य को लेकर भी सकारात्मक निर्णय ले सकेगा।
जनसंख्या का प्रश्न अंतत जन्म लेने वालों की संख्या का नहीं, उनके जीवन की संभावनाओं का प्रश्न है। कोई भी समाज केवल अधिक बच्चों के जन्म से शक्तिशाली नहीं बनता, बल्कि तब बनता है जब वह अपने नागरिकों को सम्मानजनक जीवन, सुरक्षित भविष्य और अवसरों की समान उपलब्धता दे सके। आज भारत के सामने चुनौती जनसंख्या बढ़ाने या घटाने की नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था निर्मित करने की है जिसमें नागरिक आने वाले कल से भयभीत न हो। क्योंकि जहाँ भविष्य पर विश्वास होता है, वहाँ बच्चे बोझ नहीं, आशा बनकर जन्म लेते हैं; और जहाँ भविष्य ही असुरक्षित हो, वहाँ घटती जन्मदर आँकड़ा नहीं, व्यवस्था पर लिखा हुआ एक मौन अभियोग बन जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है। रोटी के लिए रोजगार चाहिए, रोजगार के लिए शिक्षा चाहिए और शिक्षा के लिए धन चाहिए। कपड़े सस्ते भी पहने जा सकते हैं, लेकिन मकान सस्ता नहीं मिलता। यही वह कठोर यथार्थ है जिसके बीच आज का भारतीय परिवार अपने भविष्य का गणित बैठा रहा है। इसलिए भारत में जनसंख्या का प्रश्न अब केवल जन्मदर का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न बन चुका है।
भारत की जनसँख्या विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 17.7 प्रतिशत है, जबकि पृथ्वी के कुल भूभाग का मात्र 2.4 प्रतिशत हिस्सा ही भारत के पास है। यह असंतुलन अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। भूमि सीमित है, जल सीमित है, संसाधन सीमित हैं, किंतु उन पर निर्भर लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आज भले ही कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुँच चुकी हो और जनसंख्या वृद्धि की गति मंद पड़ रही हो, किंतु वास्तविक जनसंख्या अभी भी बढ़ रही है। अर्थात् प्रतिशत घट रहा है, पर संख्या बढ़ रही है। यही भारत की जनसांख्यिकीय विडम्बना है।
संसाधनों पर बढ़ता दबाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देता है। महानगरों में लाखों लोग एक कमरे के मकानों में जीवन बिताने को विवश हैं। जमीन के दाम सामान्य नागरिक की पहुँच से बाहर हो चुके हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन की आधी से अधिक कमाई केवल एक छोटे से घर के लिए खर्च कर देता है। घर खरीदना आज आवश्यकता से अधिक एक संघर्ष बन चुका है। युवा नौकरी मिलने के बाद विवाह की नहीं, पहले मकान की चिंता करता है। उसके बाद बच्चों की शिक्षा का प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है।
आज शिक्षा भी एक महँगा निवेश बन चुकी है। अभिभावक जानते हैं कि केवल बच्चे को जन्म देना पर्याप्त नहीं है। उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देनी होगी, प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी करानी होगी, तकनीकी कौशल उपलब्ध कराना होगा और फिर रोजगार की अनिश्चित दुनिया में उसे स्थापित करना होगा। ऐसे में समझदार और शिक्षित परिवार बच्चों की संख्या नहीं, उनकी गुणवत्ता पर ध्यान दे रहे हैं। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि आर्थिक विवशता का परिणाम है।
रोजगार की स्थिति भी जनसंख्या विमर्श को प्रभावित कर रही है। स्थायी नौकरियों का स्थान संविदा आधारित नियुक्तियों ने ले लिया है। लाखों युवा आधे वेतन में दोगुना काम कर रहे हैं। उनके सिर पर हर वर्ष अनुबंध नवीनीकरण की तलवार लटकती रहती है। भविष्य अनिश्चित है, पेंशन का भरोसा नहीं है और सामाजिक सुरक्षा का ढाँचा कमजोर है। जो व्यक्ति स्वयं अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है, वह कई बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी उठाने का साहस कैसे करेगा?
यह स्थिति केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। भारत तेजी से वृद्ध समाज की ओर भी बढ़ रहा है। वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, किंतु उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थाएँ विकसित नहीं हो पा रही हैं। मेट्रो में बैठने की कुछ आरक्षित सीटें उनकी बढ़ती संख्या के सामने अपर्याप्त हैं। रेलों में आकस्मिक यात्रा करने वाले बुजुर्गों को आरामदायक बर्थ मिलना कठिन होता जा रहा है। कोविड काल के बाद रेलवे किराये में मिलने वाली रियायतें भी समाप्त हो गईं। स्वास्थ्य सुविधाएँ महँगी होती जा रही हैं और वृद्धावस्था की चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं।
प्रश्न यह भी है कि आने वाले वर्षों में इन बुजुर्गों की देखभाल कौन करेगा? वह युवा, जो स्वयं अस्थायी रोजगार, महँगी शिक्षा, बढ़ते किराये और सीमित आय के बीच संघर्ष कर रहा है? संयुक्त परिवारों का विघटन हो चुका है। सामाजिक सुरक्षा का भार परिवारों पर है और परिवार स्वयं आर्थिक दबावों से जूझ रहे हैं। ऐसे में वृद्धावस्था की समस्या भविष्य की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक बन सकती है।
जनसंख्या वृद्धि को लेकर समय-समय पर चिंता व्यक्त की जाती है। दूसरी ओर, जन्मदर में कमी को लेकर भी आशंकाएँ प्रकट की जाती हैं। परंतु यह समझना आवश्यक है कि जनसंख्या केवल सांख्यिकीय विषय नहीं है। यह जीवन की परिस्थितियों से संचालित होती है। जब रोजगार सुरक्षित होगा, आवास सुलभ होगा, शिक्षा सस्ती होगी, स्वास्थ्य सेवाएँ भरोसेमंद होंगी और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी, तब परिवार स्वाभाविक रूप से अपने भविष्य के बारे में सकारात्मक निर्णय लेंगे। केवल नैतिक उपदेशों या भावनात्मक अपीलों से जन्मदर नहीं बढ़ती।
आज का युवा अपने बच्चों को वही जीवन नहीं देना चाहता जो उसने स्वयं संघर्ष करके पाया है। वह चाहता है कि उसका बच्चा बेहतर विद्यालय में पढ़े, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ पाए और सम्मानजनक रोजगार हासिल करे। इसलिए वह बच्चों की संख्या सीमित रखता है। इसे सामाजिक पतन नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की भावना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। आखिर बच्चे पैदा करना बड़ा कार्य नहीं है; उनका पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और भविष्य सुरक्षित करना बड़ा कार्य है।
भारत इस समय जनसांख्यिकीय लाभांश के दौर में है। विशाल युवा आबादी देश की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। लेकिन यदि रोजगार, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियों का समाधान नहीं हुआ, तो यही लाभांश बोझ में परिवर्तित हो सकता है। दूसरी ओर, वृद्ध होती आबादी की चुनौतियाँ भी धीरे-धीरे सामने आएँगी। इसलिए आवश्यकता जनसंख्या बढ़ाने या घटाने की बहस से आगे बढ़कर जीवन की गुणवत्ता सुधारने की है।
देश को ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो युवाओं को स्थायी रोजगार दें, परिवारों को सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ, आवास को आम नागरिक की पहुँच में लाएँ तथा बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करें। जब नागरिक भविष्य के प्रति आश्वस्त होगा, तभी वह परिवार और समाज के भविष्य को लेकर भी सकारात्मक निर्णय ले सकेगा।
जनसंख्या का प्रश्न अंतत जन्म लेने वालों की संख्या का नहीं, उनके जीवन की संभावनाओं का प्रश्न है। कोई भी समाज केवल अधिक बच्चों के जन्म से शक्तिशाली नहीं बनता, बल्कि तब बनता है जब वह अपने नागरिकों को सम्मानजनक जीवन, सुरक्षित भविष्य और अवसरों की समान उपलब्धता दे सके। आज भारत के सामने चुनौती जनसंख्या बढ़ाने या घटाने की नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था निर्मित करने की है जिसमें नागरिक आने वाले कल से भयभीत न हो। क्योंकि जहाँ भविष्य पर विश्वास होता है, वहाँ बच्चे बोझ नहीं, आशा बनकर जन्म लेते हैं; और जहाँ भविष्य ही असुरक्षित हो, वहाँ घटती जन्मदर आँकड़ा नहीं, व्यवस्था पर लिखा हुआ एक मौन अभियोग बन जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)