TMC का अंतिम पतन? विद्रोही MLAs के साथ MPs का गठबंधन, ममता-अभिषेक की तानाशाही का भयानक अंत!
प्रकाशित: 09-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी 28 वर्षीय यात्रा में सबसे गंभीर संकट का सामना कर रही है। अप्रैल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा की भारी जीत (लगभग 207 सीटें) के बाद TMC की हार ने पार्टी में विद्रोह की आग भड़का दी। अब यह आग विधानसभा से संसद तक फैल गई है। लगभग 58-61 विद्रोही MLAs के साथ 23 लोकसभा सांसदों के संपर्क में होने की खबरें पार्टी के विभाजन की ओर इशारा कर रही हैं।
सबसे ताजा घटनाक्रम में, TMC के निष्कासित MLA ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता (LoP) नियुक्त किया गया है। स्पीकर रथींद्र बोस को 58 MLAs के हस्ताक्षर वाले पत्र के आधार पर यह फैसला लिया गया। चार विद्रोही MLAs—जावेद खान, सबीना यासमीन, संदीपन साहा और शैली साहा—उपनेता बने। विद्रोही गुट का दावा है कि उनकी संख्या 61 तक पहुंच गई है और बढ़ रही है। इससे TMC की 80 MLAs वाली ताकत लगभग खत्म हो गई है। यह विद्रोह केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। सूत्रों के अनुसार, TMC की 28 लोकसभा MPs में से कम से कम 23 विद्रोही MLAs के कैंप से संपर्क में हैं। कई MPs अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व से नाखुश हैं और ममता बनर्जी-अभिषेक गुट की कथित तानाशाही, फर्जी हस्ताक्षरों के आरोपों तथा पार्टी में लोकतंत्र की कमी का मुद्दा उठा रहे हैं। TMC राजसभा MP सुखेंद्र शेखर रॉय ने पार्टी और सदन से इस्तीफा दे दिया, भ्रष्टाचार, महिलाओं पर अत्याचार और विभिन्न क्षेत्रों में विफलताओं का आरोप लगाते हुए। यह TMC की राजसभा ताकत को 12 तक घटा देता है। विद्रोह की जड़ें गहरी हैं। चुनाव हार के बाद TMC में असंतोष बढ़ा। अभिषेक बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को LoP बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन फर्जी सिग्नेचर के आरोपों ने विवाद खड़ा कर दिया। विद्रोही गुट ने ममता को मुख्य सलाहकार बनाए रखने की अपील की, लेकिन पार्टी संगठन पर पूर्ण नियंत्रण की मांग की। ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में सिर्फ 8 MLAs और 6 MPs पहुंचे, जो पार्टी की टूटती एकता का प्रमाण है। TMC ने सभी कमेटियों को भंग कर संगठनात्मक बदलाव की घोषणा की, लेकिन यह प्रयास अपर्याप्त साबित हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे शिवसेना-शिवसेना जैसा विभाजन बता रहे हैं। विद्रोही दावा करते हैं कि वे एंटी-डिफेक्शन कानून से बचने के लिए पर्याप्त संख्या में हैं। संसद में भी विद्रोही MPs लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर अभिषेक बनर्जी को संसदीय दल नेता न मानने की योजना बना रहे हैं और अलग समूह का दर्जा मांग सकते हैं। कुछ MPs भाजपा से संपर्क में बताए जा रहे हैं।
TMC के लिए यह संकट अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। ममता बनर्जी, जो पार्टी की एकमात्र चेहरा मानी जाती हैं, अब अभिषेक पर बढ़ते असंतोष को संभालने में जूझ रही हैं। दिल्ली पहुंचकर विद्रोही MPs को मनाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन सफलता संदिग्ध है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि वे अदालत जाएंगे, लेकिन मैदान में विद्रोह जारी है। यह रिफ्ट पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। BJP पहले ही मजबूत विपक्ष बन चुकी है। यदि MPs भी विद्रोह में शामिल हुए तो TMC का संसदीय अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, “संख्या बढ़ रही है।” यह बयान ममता गुट के लिए चेतावनी है। TMC के संस्थापक काल से चली आ रही ‘ममता ब्रांड’ अब टूटने के कगार पर है। आंतरिक लोकतंत्र, भाई-भतीजावाद के आरोप और चुनावी हार ने पार्टी को कमजोर किया। आने वाले दिनों में अदालती लड़ाई, और संभावित दलबदल TMC को और विभाजित कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की जनता अब देख रही है कि क्या ममता इस संकट से उबर पाती हैं या TMC का विभाजन अपरिहार्य हो गया है। राजनीतिक इतिहास में यह एक और उदाहरण बनेगा जहां व्यक्तिकेंद्रित पार्टी बिना लोकतंत्र के टिक नहीं पाती।
कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी 28 वर्षीय यात्रा में सबसे गंभीर संकट का सामना कर रही है। अप्रैल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा की भारी जीत (लगभग 207 सीटें) के बाद TMC की हार ने पार्टी में विद्रोह की आग भड़का दी। अब यह आग विधानसभा से संसद तक फैल गई है। लगभग 58-61 विद्रोही MLAs के साथ 23 लोकसभा सांसदों के संपर्क में होने की खबरें पार्टी के विभाजन की ओर इशारा कर रही हैं।
सबसे ताजा घटनाक्रम में, TMC के निष्कासित MLA ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता (LoP) नियुक्त किया गया है। स्पीकर रथींद्र बोस को 58 MLAs के हस्ताक्षर वाले पत्र के आधार पर यह फैसला लिया गया। चार विद्रोही MLAs—जावेद खान, सबीना यासमीन, संदीपन साहा और शैली साहा—उपनेता बने। विद्रोही गुट का दावा है कि उनकी संख्या 61 तक पहुंच गई है और बढ़ रही है। इससे TMC की 80 MLAs वाली ताकत लगभग खत्म हो गई है। यह विद्रोह केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। सूत्रों के अनुसार, TMC की 28 लोकसभा MPs में से कम से कम 23 विद्रोही MLAs के कैंप से संपर्क में हैं। कई MPs अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व से नाखुश हैं और ममता बनर्जी-अभिषेक गुट की कथित तानाशाही, फर्जी हस्ताक्षरों के आरोपों तथा पार्टी में लोकतंत्र की कमी का मुद्दा उठा रहे हैं। TMC राजसभा MP सुखेंद्र शेखर रॉय ने पार्टी और सदन से इस्तीफा दे दिया, भ्रष्टाचार, महिलाओं पर अत्याचार और विभिन्न क्षेत्रों में विफलताओं का आरोप लगाते हुए। यह TMC की राजसभा ताकत को 12 तक घटा देता है। विद्रोह की जड़ें गहरी हैं। चुनाव हार के बाद TMC में असंतोष बढ़ा। अभिषेक बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को LoP बनाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन फर्जी सिग्नेचर के आरोपों ने विवाद खड़ा कर दिया। विद्रोही गुट ने ममता को मुख्य सलाहकार बनाए रखने की अपील की, लेकिन पार्टी संगठन पर पूर्ण नियंत्रण की मांग की। ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में सिर्फ 8 MLAs और 6 MPs पहुंचे, जो पार्टी की टूटती एकता का प्रमाण है। TMC ने सभी कमेटियों को भंग कर संगठनात्मक बदलाव की घोषणा की, लेकिन यह प्रयास अपर्याप्त साबित हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे शिवसेना-शिवसेना जैसा विभाजन बता रहे हैं। विद्रोही दावा करते हैं कि वे एंटी-डिफेक्शन कानून से बचने के लिए पर्याप्त संख्या में हैं। संसद में भी विद्रोही MPs लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर अभिषेक बनर्जी को संसदीय दल नेता न मानने की योजना बना रहे हैं और अलग समूह का दर्जा मांग सकते हैं। कुछ MPs भाजपा से संपर्क में बताए जा रहे हैं।
TMC के लिए यह संकट अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। ममता बनर्जी, जो पार्टी की एकमात्र चेहरा मानी जाती हैं, अब अभिषेक पर बढ़ते असंतोष को संभालने में जूझ रही हैं। दिल्ली पहुंचकर विद्रोही MPs को मनाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन सफलता संदिग्ध है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि वे अदालत जाएंगे, लेकिन मैदान में विद्रोह जारी है। यह रिफ्ट पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। BJP पहले ही मजबूत विपक्ष बन चुकी है। यदि MPs भी विद्रोह में शामिल हुए तो TMC का संसदीय अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, “संख्या बढ़ रही है।” यह बयान ममता गुट के लिए चेतावनी है। TMC के संस्थापक काल से चली आ रही ‘ममता ब्रांड’ अब टूटने के कगार पर है। आंतरिक लोकतंत्र, भाई-भतीजावाद के आरोप और चुनावी हार ने पार्टी को कमजोर किया। आने वाले दिनों में अदालती लड़ाई, और संभावित दलबदल TMC को और विभाजित कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की जनता अब देख रही है कि क्या ममता इस संकट से उबर पाती हैं या TMC का विभाजन अपरिहार्य हो गया है। राजनीतिक इतिहास में यह एक और उदाहरण बनेगा जहां व्यक्तिकेंद्रित पार्टी बिना लोकतंत्र के टिक नहीं पाती।