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ईरान को भारत में ब्रिक्स सम्मेलन से बड़ी उम्मीद, पुतिन भाग लेंगे

प्रकाशित: 10-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अशोक उपाध्याय
भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और एक जनवरी 2026 को इसने चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण की। वर्ष 2026 एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है क्योंकि ब्रिक्स ने इस साल अपनी स्थापना के बीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। अब भारत इस सप्ताहांत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
भारत मंडपम में 12-13 सितंबर 2026 को होने वाले इस उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स सदस्य और भागीदार देशों के नेताओं के साथ-साथ आमंत्रित अतिथियों को भी एक मंच पर लाया जाएगा। वे पारस्परिक महत्व के वैश्विक और क्षेत्रीय मामलों पर दृष्टिकोण साझा करेंगे।
भारत की अध्यक्षता में इस वर्ष ब्रिक्स की रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए देश के 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्च स्तरीय वार्ता आयोजित की जा चुकी हैं।ब्रिक्स विश्व के ग्यारह प्रमुख उभरते बाजारों और विकासशील देशों को एक मंच देता है और ये देश ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात हैं। यह वैश्विक और क्षेत्रीय महत्व के समकालीन मुद्दों पर परामर्श और सहयोग के लिए एक उपयोगी मंच के रूप में कार्य कर रहा है।
भारत के लिए इस बार संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी क्योंकि विस्तारित ब्रिक्स समझौते में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों शामिल हैं जिनके बीच संघर्ष जारी है। साथ ही भारत के अमरीका और खाड़ी देशों के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध भी हैं। ऐसे में उसके लिये हर पक्ष के साथ संतुलन बनाये रखने की बडी चुनौती है।
जयपुर में हाल ही में आयोजित ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में सदस्यों ने वैश्विक बाजारों तक लघु एवं मध्यम उद्यमों की पहुंच को मजबूत करने और व्यापार-वित्तीय असंतुलन को कम करने के सिद्धांतों का समर्थन किया।बैठक में भारत ने लचीली और स्पर्धातमकमूल्य व्यवस्था अपनाने पर भी जोरदिया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के आर्थिक हितपश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं के बाहर के बाजारों से जुड़े हुए हैं। वह किसी गुट की रहनुमाई का पक्षधर नहीं है और समानता के आधार पर अपने द्विपक्षीय संबंधो का विस्तार करते रहना चाहता है।
अमेरिका-ईरान युद्ध ने ऊर्जा सुरक्षा, जहाजरानी और वैश्विक तेल बाजारों को प्रभावित किया है जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य एक प्रमुख असुरक्षा का केंद्र बन गया है। अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति में जारी बाधाओं के कारण 2026 में तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहेंगी जो चिंता का बड़ा कारण है।
भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम एशिया उसकी ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी हितों के लिए बड़ा महत्व रखता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की दीर्घकालिक बाधा से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, मुद्रास्फीति पर दबाव पड़ सकता है और आर्थिक विकास में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।
ईरान ने ब्रिक्स सम्मेलन का उपयोग अमरीकी सैन्य कार्रवाई के विरोध को एकजुट करने के लिए किया है और उसने अध्यक्ष के रूप में भारत से एक साझा रुख बनाने में मदद करने का आग्रह किया है। 31 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान से मुलाकात की। इस साल की शुरुआत में तेहरान पर अमरीकी और इजरायली हमलों के बाद अमेरिका-ईरान युद्ध छिड़ने के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली मुलाकात थी।पेज़ेश्कियन ने मोदी से आग्रह किया है कि वह विभिन्न पक्षों के साथ भारत के व्यापक संपर्कों का उपयोग करके उन्हें युद्ध और रक्तपात के मार्ग से दूर ले जाने और संवाद और समझौते के मार्ग पर लौटने में मदद करें।
दरअसल प्रधानमंत्री मोदी विश्व के बड़े और प्रभावशाली नेताओं में शुमार किये जाने लगे हैं और पूरब एवं पश्चिम की लड़ाई से प्रभावित देश अल्प और दीर्घकालिक समस्याओं से निजात पाने के लिए उन्हें बड़ी आशा भरी नजरों से देखने लगे हैं।
चीन ने कहा है कि वह ब्रिक्स सहयोग को बहुत महत्व देता है और इस साल नई दिल्ली में होने वाली नेताओं के शिखर सम्मेलन की सफल मेजबानी में भारत का समर्थन करता है। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग से जब पूछा गया कि 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन की ओर से कौन शामिल होगा और बीजिंग की क्या उम्मीदें हैं, माओ निंग ने कहा, आपके खास सवाल के बारे में मेरे पास अभी साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ब्रिक्स की शिखर बैठक में भाग लेने के लिये दिल्ली आ रहे हैं। भारत और रूस के लिये पुतिन का भारत आना महत्वपूर्ण है और प्रधानमंत्री मोदी इस अवसर को भारत के हितों को और सुरक्षित बनाने के लिये कोई कोर कसर नहीं छोडना चाहते हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन का ये दौरा बेहद खास होने वाला है क्योंकि इस बार उनके एजेंडे में रूस का फाइटर जेट एसयू-57 भी है। भारत इसकी तकनीक चाहता है और रूस काफी हद तक भारत के रुख से सहमत है।
पुतिन के प्रवक्ता ने कहा है कि हम मिलकर ब्रह्मोस मिसाइलें भी बना रहे हैं। अब समय आ गया है कि उन मिसाइलों को बेहतर बनाने और उनमें कुछ अतिरिक्त खूबियां जोड़ने के बारे में सोचा जाए ताकि वे दुनिया में और अधिक असरदार और प्रतिस्पर्धी बन सकें। उसने कहा कि एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी भी दोनो देश के एजेंडे में शामिल है।
प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में भारत और रूस के आपसी संबंधों ने नई उंचाईयों छुआ है। निश्चित तौर पर इस बार भी ब्रिक्स सम्मेलन से भारत और रूस की एकजुटता को मजबूती एवं आपसी रिश्तों को गर्माहट मिलेगी। अमेरिका ईरान युद्ध से तनाव व्याप्त है। निश्चित तौर पर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता भारत के लिये चुनौतपूर्ण होने के साथ विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ने का बड़ा अवसर भी होगा।
(लेखक पूर्व संपादक, यूनीवार्ता हैं।)