केंद्रीय मंत्री आठवले ने गरबा कार्पामों में मुसलमानों पर रोक लगाने की विहिप की मांग का विरोध किया
प्रकाशित: 10-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
रायपुर, (भाषा)। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने नवरात्र के दौरान गरबा कार्पामों में मुसलमानों के शामिल होने पर रोक लगाने के विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के आह्वान का बुधवार को विरोध किया।
उन्होंने कहा कि भारत संविधान से चलता है, जो सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार देता है। छत्तीसगढ़ के एक दिन के दौरे पर यहां स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डा पहुंचे आठवले ने पत्रकारों से कहा कि ऐसा रुख सही नहीं है क्योंकि अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होने का अधिकार है। महाराष्ट्र में विहिप के नेताओं द्वारा यह कहे जाने पर कि जो लोग मूर्ति पूजा नहीं करते, उन्हें ऐसे धार्मिक कार्पामों से दूर रहना चाहिए, आठवले ने कहा, मुझे लगता है कि यह रुख सही नहीं है। उन्होंने कहा, बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संविधान सभी धर्मों के लिए न्याय सुनिश्चित करता है। भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, लिंगायत, पारसी और कई अन्य धर्मों के लोग रहते हैं, तथा संविधान सभी धर्मों की रक्षा करता है। उन्होंने कहा, यह कहना ठीक नहीं है कि मुसलमानों को गरबा में शामिल नहीं होना चाहिए। हिंदू और मुस्लिम समुदायों को एक साथ आकर देश के लिए काम करने की ज़रूरत है। आठवले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने राजस्थान में अजमेर शरीफ दरगाह का उदाहरण दिया और कहा कि बड़ी संख्या में हिंदू वहां जाते हैं। आठवले ने कहा, हमारा देश ऐसा है जहां सभी धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होना चाहिए। हम ऐसे रुख का विरोध करते हैं। ऐसा रुख संविधान के खिलाफ है। आरक्षण के मुद्दे पर आठवले ने कहा कि यह नीति कमजोर वर्गों को अवसर देकर देश को मजबूत करने के लिए शुरू की गई थी। उन्होंने कहा, जब जातिवाद खत्म हो जाएगा, तो हम आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण तब दिया गया था जब 1950 में संविधान लागू हुआ था, जबकि अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण 1990-91 में वीपी सिंह सरकार के दौरान शुरू किया गया था। उन्होंने कहा कि बाद में नरेन्द्र मोदी सरकार ने एससी, एसटी या ओबीसी श्रेणी में न आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण शुरू किया। आठवले ने कहा, आरक्षण जाति पर आधारित है। हालांकि संविधान ने अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत को खत्म कर दिया है, फिर भी दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार होते हैं। जब तक जातिवाद खत्म नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत संविधान से चलता है, जो सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार देता है। छत्तीसगढ़ के एक दिन के दौरे पर यहां स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डा पहुंचे आठवले ने पत्रकारों से कहा कि ऐसा रुख सही नहीं है क्योंकि अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होने का अधिकार है। महाराष्ट्र में विहिप के नेताओं द्वारा यह कहे जाने पर कि जो लोग मूर्ति पूजा नहीं करते, उन्हें ऐसे धार्मिक कार्पामों से दूर रहना चाहिए, आठवले ने कहा, मुझे लगता है कि यह रुख सही नहीं है। उन्होंने कहा, बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संविधान सभी धर्मों के लिए न्याय सुनिश्चित करता है। भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, लिंगायत, पारसी और कई अन्य धर्मों के लोग रहते हैं, तथा संविधान सभी धर्मों की रक्षा करता है। उन्होंने कहा, यह कहना ठीक नहीं है कि मुसलमानों को गरबा में शामिल नहीं होना चाहिए। हिंदू और मुस्लिम समुदायों को एक साथ आकर देश के लिए काम करने की ज़रूरत है। आठवले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने राजस्थान में अजमेर शरीफ दरगाह का उदाहरण दिया और कहा कि बड़ी संख्या में हिंदू वहां जाते हैं। आठवले ने कहा, हमारा देश ऐसा है जहां सभी धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होना चाहिए। हम ऐसे रुख का विरोध करते हैं। ऐसा रुख संविधान के खिलाफ है। आरक्षण के मुद्दे पर आठवले ने कहा कि यह नीति कमजोर वर्गों को अवसर देकर देश को मजबूत करने के लिए शुरू की गई थी। उन्होंने कहा, जब जातिवाद खत्म हो जाएगा, तो हम आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण तब दिया गया था जब 1950 में संविधान लागू हुआ था, जबकि अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण 1990-91 में वीपी सिंह सरकार के दौरान शुरू किया गया था। उन्होंने कहा कि बाद में नरेन्द्र मोदी सरकार ने एससी, एसटी या ओबीसी श्रेणी में न आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण शुरू किया। आठवले ने कहा, आरक्षण जाति पर आधारित है। हालांकि संविधान ने अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत को खत्म कर दिया है, फिर भी दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार होते हैं। जब तक जातिवाद खत्म नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए।