प्रो. सी. आर. राव-सांख्यिकी के उस महान वैज्ञानिक की कहानी, जिनके नियमों पर टिकी है आज की Aघ् तकनीक
प्रकाशित: 10-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
डॉ. एम. विष्णु वर्धन राव
10 सितंबर 1920 को कर्नाटक के बेल्लारी जिले के हडगली गांव में एक तेलुगु परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। तब किसी ने नहीं सोचा था कि कल्याणपुडी राधाकृष्ण राव (सी. आर. राव) नाम का यह बच्चा आगे चलकर नंबरों का जादूगर कहलाएगा और सांख्यिकी (स्टैटिस्टिक्स) की दुनिया को बदल कर रख देगा। कर्नाटक के एक छोटे से कस्बे से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में शामिल होने का उनका यह सफर काबिलियत, कड़ी मेहनत और पढ़ाई के प्रति उनके गहरे लगाव की एक शानदार मिसाल है।
राव की शुरुआती पढ़ाई आंध्र प्रदेश के गुंटूर, नुज्विडु और नंदीगामा में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे आंध्र यूनिवर्सिटी (विशाखापत्तनम) गए, जहाँ 1940 में उन्होंने गणित (मैथ्स) में बीए और एमए की डिग्री पूरी यूनिवर्सिटी में पहला स्थान पाकर हासिल की। आंध्र यूनिवर्सिटी से उनका यह रिश्ता जिंदगी भर रहा। आज भी यूनिवर्सिटी कैंपस में स्टैटिस्टिक्स डिपार्टमेंट के पास वाली सड़क का नाम सी. आर. राव मार्ग रखा गया है, जो इस महान छात्र के प्रति यूनिवर्सिटी के सम्मान को दिखाता है।
एमए पूरा करने के बाद 1940 के दशक की शुरुआत में युवा राव नौकरी की तलाश में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (घ्एघ्), कोलकाता पहुंचे। किस्मत का यह मोड़ आगे चलकर सांख्यिकी के इतिहास को बदलने वाला साबित हुआ। मैथ्स में उनकी बेहतरीन समझ और तेजी को देखकर आईएसआई के संस्थापक और भारत में आधुनिक स्टैटिस्टिक्स के जनक प्रो. पी. सी. महालनोबिस ने तुरंत उन्हें अपने साथ जोड़ लिया।
राव के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मानवशास्त्र विभाग ने उन्हें सूडान के जेबेल मोया इलाके से मिली पुरानी हड्डियों और कंकालों पर रिसर्च करने का काम सौंपा। इस प्रोजेक्ट पर उनके काम की वजह से एंशिएंट इनहैबिटेंट्स ऑफ जेबेल मोया नाम की मशहूर किताब छपी। इसी दौरान उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई जारी रखी और 1948 में पीएचडी पूरी की।
कैम्ब्रिज में ही राव की मुलाकात आधुनिक स्टैटिस्टिक्स के बड़े नाम सर रोनाल्ड ए. फिशर से हुई। कैम्ब्रिज के माहौल और आईएसआई के शुरुआती अनुभवों ने मिलकर उनके भीतर वह समझ पैदा की जिसने आगे चलकर स्टैटिस्टिक्स के नियमों और उनके इस्तेमाल को नए आयाम दिए।
1948 में भारत लौटने पर राव ने आईएसआई में फिर से काम शुरू किया और रिसर्च व ट्रेनिंग स्कूल के हेड बने। 1963 में वे इसके डायरेक्टर बने और 1972 में प्रो. पी. सी. महालनोबिस के निधन के बाद 1976 तक उन्होंने आईएसआई के डायरेक्टर और सेक्रेटरी के रूप में संस्थान को आगे बढ़ाया।
1979 में उनके जीवन का एक नया सफर शुरू हुआ जब उन्हें पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी (अमेरिका) में भाषण देने के लिए बुलाया गया। इसके बाद वे वहीं पढ़ाने लगे और स्टैटिस्टिक्स की पढ़ाई व रिसर्च को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में वे पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े, जहाँ उन्होंने सालों तक पढ़ाना और रिसर्च जारी रखा। आखिरकार 2001 में 81 साल की उम्र में वे वहां से रिटायर हुए।
अपने इस लंबे सफर में उनकी पढ़ाई-लिखाई की उपलब्धियां हैरान करने वाली रहीं। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी और एससी.डी. के अलावा, उन्हें दुनिया के 16 देशों की यूनिवर्सिटीज से 27 मानद डॉक्टरेट (प्दहदब् अुrााs) मिलीं। उन्होंने करीब 500 साइंटिफिक पेपर लिखे, कई अहम किताबें लिखीं और लगभग 40 छात्रों को पीएचडी कराई। लेकिन सिर्फ आंकड़े सी. आर. राव के योगदान को पूरी तरह नहीं बता सकते।
प्रो. सी. आर. राव का नाम आधुनिक स्टैटिस्टिक्स के सबसे जरूरी नियमों के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया है। उदाहरण के लिए, क्रेमर-राव इनइक्वलिटी यह बताती है कि हमारे पास मौजूद जानकारी या डेटा के आधार पर किसी अज्ञात चीज का कितना सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है। यह नियम आज डेटा से सही अंदाजा लगाने का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।
इसी तरह राव-ब्लैकवेल थ्योरम वैज्ञानिकों को उपलब्ध जानकारी से और भी बेहतर व सटीक नतीजे निकालने में मदद करती है। इन दोनों नियमों ने मिलकर वैज्ञानिकों को डेटा से सही जानकारी निकालने का एक मजबूत जरिया दिया। उनका काम यहीं नहीं रुका; उन्होंने डेटा एनालिसिस, एक्सपेरिमेंट डिजाइन, इन्फॉर्मेशन थ्योरी और ज्योमेट्री में भी कई नए तरीके दिए, जिसने इकोनॉमिक्स, इंजीनियरिंग, मेडिकल साइंस और सोशल साइंस जैसे विषयों को बहुत फायदा पहुंचाया।
राव के काम की सबसे खास बात यह है कि दशकों पहले किया गया उनका काम आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Aघ्) और डेटा साइंस के दौर में भी उतना ही काम आ रहा है। कैम्ब्रिज में अपनी पीएचडी के दौरान उन्होंने डिस्क्रिमिनेंट एनालिसिस पर काम किया था, जो कई खूबियों के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच फर्क करने का तरीका है। जिस तरीके को कभी सिर्फ स्टैटिस्टिक्स का एक जरिया माना जाता था, वही आज मशीन लर्निंग के सुपरवाइज्ड लर्निंग का मुख्य आधार है।
आज जब हर सेकंड भारी मात्रा में डेटा बन रहा है, तब डेटा में पैटर्न पहचानना, समूहों को अलग करना और सही जानकारी निकालना ही एआई का सबसे बड़ा काम है। इन आधुनिक तकनीकों के पीछे छिपे कई नियम उन्हीं विचारों पर टिके हैं जिन्हें सी. आर. राव जैसे महान वैज्ञानिकों ने सालों पहले बनाया था। संस्थानों को खड़ा करने में भी राव ने बड़ा योगदान दिया। हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैंपस में बना सी. आर. राव एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिक्स, स्टैटिस्टिक्स एंड कंप्यूटर साइंस (Aघ्श्एण्ए) उनकी इसी सोच का नतीजा है। इस महान वैज्ञानिक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि यह संस्थान आगे भी देश में बेहतरीन गणितज्ञ, डेटा वैज्ञानिक और एआई एक्सपर्ट तैयार करता रहे।
सी. आर. राव के इस महान योगदान के लिए उन्हें दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक सम्मान मिले। भारत में उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण दिया गया, वहीं 2002 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हें अमेरिका के सर्वोच्च वैज्ञानिक सम्मान नेशनल मेडल ऑफ साइंस से नवाजा।
इसके बाद, 102 साल की उम्र में उन्होंने एक बार फिर दुनिया में इतिहास रचा। 2023 में उन्हें सांख्यिकी के क्षेत्र का इंटरनेशनल प्राइज (घ्हीहूग्दहत् झ्rग्zा ग्ह एtatग्stग्म्s) दिया गया, जिसे स्टैटिस्टिक्स की दुनिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। यह सम्मान केवल उनके शोध के लिए नहीं था, बल्कि दुनिया भर की साइंस और तकनीक पर पड़े उनके असर की पहचान थी।
भारत के इतिहास में एक भावुक कर देने वाला संयोग भी जुड़ा है। 23 अगस्त 2023 को जब भारत ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचकर इतिहास रचा था, ठीक उसी दिन देश ने अपने इस सबसे चमकते सितारे को खो दिया।
भारत के महान गणितज्ञ और सांख्यिकीविद कल्याणपुडी राधाकृष्ण राव का 23 अगस्त 2023 की सुबह अमेरिका में निधन हो गया-अपने 103वें जन्मदिन से सिर्फ दो हफ्ते पहले।
कर्नाटक के छोटे से गांव से शुरू होकर दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक मंचों तक पहुंची सी. आर. राव की कहानी समझ, मेहनत और दूर की सोच की कहानी है। उनका जीवन सिखाता है कि जब गणितीय सोच के साथ सीखने की इच्छा और अनुशासन मिलता है, तो वह सीमाओं को तोड़कर आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता है।
नंबरों का जादूगर भले ही आज हमारे बीच न हो, लेकिन उनके दिए नियम और विचार आज भी विज्ञान की दुनिया को रास्ता दिखा रहे हैं और युवा सोच को प्रेरित कर रहे हैं।
(लेखक कुलपति, झ्प्इघ् घ्झ्प्ए डीम्ड यूनिवर्सिटी एवं आईसीएमआर चेयर - मेडिकल स्टैटिस्टिक्स हैं।)
10 सितंबर 1920 को कर्नाटक के बेल्लारी जिले के हडगली गांव में एक तेलुगु परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। तब किसी ने नहीं सोचा था कि कल्याणपुडी राधाकृष्ण राव (सी. आर. राव) नाम का यह बच्चा आगे चलकर नंबरों का जादूगर कहलाएगा और सांख्यिकी (स्टैटिस्टिक्स) की दुनिया को बदल कर रख देगा। कर्नाटक के एक छोटे से कस्बे से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में शामिल होने का उनका यह सफर काबिलियत, कड़ी मेहनत और पढ़ाई के प्रति उनके गहरे लगाव की एक शानदार मिसाल है।
राव की शुरुआती पढ़ाई आंध्र प्रदेश के गुंटूर, नुज्विडु और नंदीगामा में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे आंध्र यूनिवर्सिटी (विशाखापत्तनम) गए, जहाँ 1940 में उन्होंने गणित (मैथ्स) में बीए और एमए की डिग्री पूरी यूनिवर्सिटी में पहला स्थान पाकर हासिल की। आंध्र यूनिवर्सिटी से उनका यह रिश्ता जिंदगी भर रहा। आज भी यूनिवर्सिटी कैंपस में स्टैटिस्टिक्स डिपार्टमेंट के पास वाली सड़क का नाम सी. आर. राव मार्ग रखा गया है, जो इस महान छात्र के प्रति यूनिवर्सिटी के सम्मान को दिखाता है।
एमए पूरा करने के बाद 1940 के दशक की शुरुआत में युवा राव नौकरी की तलाश में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (घ्एघ्), कोलकाता पहुंचे। किस्मत का यह मोड़ आगे चलकर सांख्यिकी के इतिहास को बदलने वाला साबित हुआ। मैथ्स में उनकी बेहतरीन समझ और तेजी को देखकर आईएसआई के संस्थापक और भारत में आधुनिक स्टैटिस्टिक्स के जनक प्रो. पी. सी. महालनोबिस ने तुरंत उन्हें अपने साथ जोड़ लिया।
राव के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मानवशास्त्र विभाग ने उन्हें सूडान के जेबेल मोया इलाके से मिली पुरानी हड्डियों और कंकालों पर रिसर्च करने का काम सौंपा। इस प्रोजेक्ट पर उनके काम की वजह से एंशिएंट इनहैबिटेंट्स ऑफ जेबेल मोया नाम की मशहूर किताब छपी। इसी दौरान उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई जारी रखी और 1948 में पीएचडी पूरी की।
कैम्ब्रिज में ही राव की मुलाकात आधुनिक स्टैटिस्टिक्स के बड़े नाम सर रोनाल्ड ए. फिशर से हुई। कैम्ब्रिज के माहौल और आईएसआई के शुरुआती अनुभवों ने मिलकर उनके भीतर वह समझ पैदा की जिसने आगे चलकर स्टैटिस्टिक्स के नियमों और उनके इस्तेमाल को नए आयाम दिए।
1948 में भारत लौटने पर राव ने आईएसआई में फिर से काम शुरू किया और रिसर्च व ट्रेनिंग स्कूल के हेड बने। 1963 में वे इसके डायरेक्टर बने और 1972 में प्रो. पी. सी. महालनोबिस के निधन के बाद 1976 तक उन्होंने आईएसआई के डायरेक्टर और सेक्रेटरी के रूप में संस्थान को आगे बढ़ाया।
1979 में उनके जीवन का एक नया सफर शुरू हुआ जब उन्हें पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी (अमेरिका) में भाषण देने के लिए बुलाया गया। इसके बाद वे वहीं पढ़ाने लगे और स्टैटिस्टिक्स की पढ़ाई व रिसर्च को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में वे पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े, जहाँ उन्होंने सालों तक पढ़ाना और रिसर्च जारी रखा। आखिरकार 2001 में 81 साल की उम्र में वे वहां से रिटायर हुए।
अपने इस लंबे सफर में उनकी पढ़ाई-लिखाई की उपलब्धियां हैरान करने वाली रहीं। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी और एससी.डी. के अलावा, उन्हें दुनिया के 16 देशों की यूनिवर्सिटीज से 27 मानद डॉक्टरेट (प्दहदब् अुrााs) मिलीं। उन्होंने करीब 500 साइंटिफिक पेपर लिखे, कई अहम किताबें लिखीं और लगभग 40 छात्रों को पीएचडी कराई। लेकिन सिर्फ आंकड़े सी. आर. राव के योगदान को पूरी तरह नहीं बता सकते।
प्रो. सी. आर. राव का नाम आधुनिक स्टैटिस्टिक्स के सबसे जरूरी नियमों के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया है। उदाहरण के लिए, क्रेमर-राव इनइक्वलिटी यह बताती है कि हमारे पास मौजूद जानकारी या डेटा के आधार पर किसी अज्ञात चीज का कितना सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है। यह नियम आज डेटा से सही अंदाजा लगाने का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।
इसी तरह राव-ब्लैकवेल थ्योरम वैज्ञानिकों को उपलब्ध जानकारी से और भी बेहतर व सटीक नतीजे निकालने में मदद करती है। इन दोनों नियमों ने मिलकर वैज्ञानिकों को डेटा से सही जानकारी निकालने का एक मजबूत जरिया दिया। उनका काम यहीं नहीं रुका; उन्होंने डेटा एनालिसिस, एक्सपेरिमेंट डिजाइन, इन्फॉर्मेशन थ्योरी और ज्योमेट्री में भी कई नए तरीके दिए, जिसने इकोनॉमिक्स, इंजीनियरिंग, मेडिकल साइंस और सोशल साइंस जैसे विषयों को बहुत फायदा पहुंचाया।
राव के काम की सबसे खास बात यह है कि दशकों पहले किया गया उनका काम आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Aघ्) और डेटा साइंस के दौर में भी उतना ही काम आ रहा है। कैम्ब्रिज में अपनी पीएचडी के दौरान उन्होंने डिस्क्रिमिनेंट एनालिसिस पर काम किया था, जो कई खूबियों के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच फर्क करने का तरीका है। जिस तरीके को कभी सिर्फ स्टैटिस्टिक्स का एक जरिया माना जाता था, वही आज मशीन लर्निंग के सुपरवाइज्ड लर्निंग का मुख्य आधार है।
आज जब हर सेकंड भारी मात्रा में डेटा बन रहा है, तब डेटा में पैटर्न पहचानना, समूहों को अलग करना और सही जानकारी निकालना ही एआई का सबसे बड़ा काम है। इन आधुनिक तकनीकों के पीछे छिपे कई नियम उन्हीं विचारों पर टिके हैं जिन्हें सी. आर. राव जैसे महान वैज्ञानिकों ने सालों पहले बनाया था। संस्थानों को खड़ा करने में भी राव ने बड़ा योगदान दिया। हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैंपस में बना सी. आर. राव एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिक्स, स्टैटिस्टिक्स एंड कंप्यूटर साइंस (Aघ्श्एण्ए) उनकी इसी सोच का नतीजा है। इस महान वैज्ञानिक को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि यह संस्थान आगे भी देश में बेहतरीन गणितज्ञ, डेटा वैज्ञानिक और एआई एक्सपर्ट तैयार करता रहे।
सी. आर. राव के इस महान योगदान के लिए उन्हें दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक सम्मान मिले। भारत में उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण दिया गया, वहीं 2002 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हें अमेरिका के सर्वोच्च वैज्ञानिक सम्मान नेशनल मेडल ऑफ साइंस से नवाजा।
इसके बाद, 102 साल की उम्र में उन्होंने एक बार फिर दुनिया में इतिहास रचा। 2023 में उन्हें सांख्यिकी के क्षेत्र का इंटरनेशनल प्राइज (घ्हीहूग्दहत् झ्rग्zा ग्ह एtatग्stग्म्s) दिया गया, जिसे स्टैटिस्टिक्स की दुनिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। यह सम्मान केवल उनके शोध के लिए नहीं था, बल्कि दुनिया भर की साइंस और तकनीक पर पड़े उनके असर की पहचान थी।
भारत के इतिहास में एक भावुक कर देने वाला संयोग भी जुड़ा है। 23 अगस्त 2023 को जब भारत ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचकर इतिहास रचा था, ठीक उसी दिन देश ने अपने इस सबसे चमकते सितारे को खो दिया।
भारत के महान गणितज्ञ और सांख्यिकीविद कल्याणपुडी राधाकृष्ण राव का 23 अगस्त 2023 की सुबह अमेरिका में निधन हो गया-अपने 103वें जन्मदिन से सिर्फ दो हफ्ते पहले।
कर्नाटक के छोटे से गांव से शुरू होकर दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक मंचों तक पहुंची सी. आर. राव की कहानी समझ, मेहनत और दूर की सोच की कहानी है। उनका जीवन सिखाता है कि जब गणितीय सोच के साथ सीखने की इच्छा और अनुशासन मिलता है, तो वह सीमाओं को तोड़कर आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता है।
नंबरों का जादूगर भले ही आज हमारे बीच न हो, लेकिन उनके दिए नियम और विचार आज भी विज्ञान की दुनिया को रास्ता दिखा रहे हैं और युवा सोच को प्रेरित कर रहे हैं।
(लेखक कुलपति, झ्प्इघ् घ्झ्प्ए डीम्ड यूनिवर्सिटी एवं आईसीएमआर चेयर - मेडिकल स्टैटिस्टिक्स हैं।)