पहचान के आधार पर हिंसी, खतरनाक प्रवृत्ति
प्रकाशित: 10-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
दिल्ली की सनलाइट कॉलोनी में पूर्वोत्तर भारत से जुड़े एक सिंगर की कथित तौर पर मारपीट के बाद हुई मौत ने राजधानी की संवेदनशीलता और कानून-व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि कुछ युवकों ने क्षेत्रीय पहचान, शक, विवाद या पूर्वोत्तर से होने के कारण उसके साथ हिंसा की, तो यह घटना महज एक हत्या नहीं होगी, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का आईना होगी जिसमें किसी इंसान को उसकी पहचान के आधार पर दूसरे दर्जे का समझने की बीमारी अब भी मौजूद है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसी विवाद का जवाब लाठी, घूंसे और सामूहिक हिंसा क्यों बन जाता है? कानून मौजूद है, पुलिस मौजूद है और न्यायालय मौजूद हैं। फिर भी कुछ लोग स्वयं ही पुलिस, अदालत और जल्लाद बनने की कोशिश क्यों करते हैं? यह मानसिकता किसी भी सभ्य लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। इस घटना ने एक और कड़वी सच्चाई सामने रखी है.हमारे युवाओं में असहमति सहने और विवाद को बातचीत से सुलझाने की क्षमता कमजोर हो रही है। पूर्वोत्तर भारत के लोग देश के हर हिस्से में शिक्षा, रोजगार, कला, संगीत, खेल और व्यापार के लिए जाते हैं। दिल्ली भी उनके सपनों का शहर है। लेकिन समय-समय पर पूर्वोत्तर के नागरिकों के साथ नस्लीय टिप्पणियों, क्षेत्रीय भेदभाव, अपमान और हिंसा की शिकायतें सामने आती रही हैं। किसी भारतीय को केवल उसके चेहरे, भाषा, नाम या पहनावे के कारण 'बाहरी' समझना हमारी राष्ट्रीय एकता की भावना को कमजोर करता है। किसी भी घटना की वास्तविक प्रकृति पुलिस जांच से तय होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी व्यक्ति की पहचान उसके खिलाफ हिंसा का कारण बनी है, तो इसे सामान्य अपराध मानकर छोड़ देना भी उतना ही खतरनाक होगा। इस घटना ने एक और कड़वी सच्चाई सामने रखी है.हमारे युवाओं में असहमति सहने और विवाद को बातचीत से सुलझाने की क्षमता कमजोर हो रही है। छोटी-सी कहासुनी कब गाली, धक्का-मुक्की और फिर जानलेवा हमले में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। सोशल मीडिया की अफवाहें, भीड़ की मानसिकता, नशा, आक्रामकता और कानून का भय कम होना इस समस्या को और गंभीर बना सकते हैं। सरकार को अब केवल घटना के बाद गिरफ्तारी और मुआवजे की औपचारिकता से आगे बढ़ना होगा। दिल्ली पुलिस को ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जैसे साक्ष्यों को तत्काल सुरक्षित किया जाना चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही दिल्ली में रहने वाले पूर्वोत्तर समुदाय के लिए पुलिस की एक प्रभावी शिकायत एवं सहायता प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए। प्रत्येक जिले में नोडल अधिकारी, स्थानीय पुलिस और समुदाय के प्रतिनिधियों के बीच नियमित संवाद हो। छात्रावासों, पीजी, कॉलेजों और रोजगार स्थलों पर भी शिकायत और सुरक्षा तंत्र प्रभावी बनाया जाए। लेकिन केवल सरकार से सवाल पूछना पर्याप्त नहीं है। समाज को भी अपने भीतर झांकना होगा। माता-पिता को अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि किसी की भाषा, त्वचा, चेहरे, पहनावे या क्षेत्रीय पहचान का मजाक उड़ाना आधुनिकता नहीं, बल्कि संकीर्ण मानसिकता है। स्कूल और कॉलेज केवल डिग्री देने के केंद्र नहीं होने चाहिए; उन्हें संविधान, समानता, विविधता और नागरिक जिम्मेदारी की शिक्षा देने के केंद्र भी बनना होगा। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। ऐसी घटनाओं पर राजनीति करने के बजाय सभी दलों को एक स्वर में कहना चाहिए कि हिंसा करने वाला व्यक्ति किसी जाति, क्षेत्र या समुदाय का प्रतिनिधि नहीं है। आंदोलन होना चाहिए तो न्याय और व्यवस्था में सुधार के लिए हो, न कि समाज के दूसरे हिस्से के खिलाफ नफरत पैदा करने के लिए। दिल्ली देश की राजधानी है। यहां देश के हर कोने से लोग अपने सपने लेकर आते हैं। अगर कोई युवा अपने ही देश की राजधानी में यह सोचने को मजबूर हो जाए कि उसकी सुरक्षा उसकी पहचान पर निर्भर करती है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए शर्म और चेतावनी का विषय है। हमें तय करना होगा कि भारत केवल नक्शे पर एक देश रहेगा या वास्तव में ऐसा राष्ट्र बनेगा जहां मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम से आने वाला नागरिक भी उतनी ही सहजता से कह सके-दिल्ली मेरी भी है, भारत मेरा भी है। इस मौत का वास्तविक न्याय केवल दोषियों को सजा दिलाने से पूरा नहीं होगा। वास्तविक न्याय तब होगा जब ऐसी मानसिकता बदलेगी जो किसी इंसान को उसकी पहचान के कारण कमतर समझती है। सरकार कानून से हिंसा रोक सकती है, लेकिन समाज को अपनी सोच बदलनी होगी।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।