कहां गए वे कचनार के खिले हुए गुलाबी फूल?
प्रकाशित: 28-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रो. हरीश अरोड़ा
सुबह की धनकती हुई गुनगुनी धूप, शब्दों से परे अव्यक्त ओस की कनिकाओं से सिंचित मिट्टी की सोंधी - सोंधी महक, चिड़ियों के गूँजते भैरव राग, हिमगिरि के उत्तुंग शिखरों पर श्वेत चुनरी के घूँघट की आड़ में लजाती उषा-सुन्दरी और कचनार के गुलाबी फूलों की पंखुरियों की तरह दमकता धरती का चेहरा...! प्रकृति के इस अपार वैभव और सौन्दर्य को देखकर कभी ऐसा लगता था मानो पृथ्वी स्वयं एक जीवंत उत्सव हो। ऋतुओं का अपना संगीत था, वृक्षों की अपनी भाषा थी, नदियों की अपनी स्मृतियाँ थीं और पक्षियों की अपनी दुनिया थी। कचनार के गुलाबी फूल केवल वृक्षों पर खिलने वाले पुष्प नहीं थे; वे ऋतु-परिवर्तन के दूत थे, प्रकृति के उल्लास का प्रतीक थे और मनुष्य तथा पर्यावरण के आत्मीय संबंधों के साक्षी थे। किंतु समय के साथ यह दृश्य बदलता गया। विकास के नाम पर बढ़ते शहरीकरण, अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, सिकुड़ते जंगलों, प्रदूषित होती नदियों और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने प्रकृति के उस सहज सौन्दर्य को धीरे-धीरे निगल लिया। आज ठंडी हवाओं के झोंकों-सी शीतल बयार दुर्लभ होती जा रही है, पक्षियों का कलरव महानगरों के शोर में खो रहा है और ऋतुओं की स्वाभाविक लय भी असंतुलित होती दिखाई देती है। ऐसे में जब स्मृतियों की खिड़की खुलती है तो मन अनायास ही पूछ उठता है- आखिर कहाँ गए वे कचनार के खिले हुए गुलाबी फूल, जो कभी हमारी धरती की मुस्कान हुआ करते थे? यह प्रश्न केवल एक वृक्ष या एक फूल के लुप्त होने का नहीं, बल्कि उस पर्यावरणीय संतुलन के विघटन का है, जिसके बिना मनुष्य का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता। दरअसल, कचनार का फूल यहाँ एक प्रतीक है। वह उन असंख्य वृक्षों, पक्षियों, तितलियों, झरनों और प्राकृतिक धरोहरों का प्रतिनिधि है जो हमारी आँखों के सामने धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं।
एक समय था जब गाँवों के रास्ते नीम, पीपल, बरगद और कचनार की छाया से ढँके रहते थे। घरों के आँगन में तुलसी के साथ कोई न कोई वृक्ष अवश्य खड़ा होता था। सुबह पक्षियों की चहचहाहट से खुलती थी और संध्या को लौटते पंछियों के कलरव से दिन का समापन होता था।
आज वही गाँव कंक्रीट की सड़कों और बहुमंज़िला निर्माणों के बीच अपनी प्राकृतिक पहचान खोते जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि प्रकृति के साथ मनुष्य का असंतुलित व्यवहार अंतत उसके अपने अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न करेगा। किंतु विकास की अंधी दौड़ में हमने इन चेतावनियों को अक्सर अनसुना कर दिया। जंगलों को काटकर उद्योग स्थापित किए गए, नदियों को प्रदूषण का बोझ सौंप दिया गया और पर्वतों को विस्फोटकों से छलनी कर दिया गया। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन आज एक वैश्विक संकट बन चुका है। असमय वर्षा, भीषण गर्मी, अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़ और बढ़ता प्रदूषण प्रकृति के उसी असंतुलन की अभिव्यक्तियाँ हैं जिसे मनुष्य ने स्वयं जन्म दिया है। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि प्रकृति का यह संकट अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा। इसका प्रभाव सीधे मनुष्य के जीवन पर पड़ रहा है। शहरों में शुद्ध वायु दुर्लभ होती जा रही है।
बच्चों को खुले मैदानों और पेड़ों की छाया से अधिक मोबाइल पीन उपलब्ध हैं। अनेक पक्षी और तितलियाँ, जो कभी हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थीं, अब केवल पुस्तकों और चित्रों में दिखाई देती हैं। आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह कल्पना भी न कर सकें कि कचनार के फूलों से लदे वृक्ष किस प्रकार पूरे वातावरण को गुलाबी आभा से भर देते थे। भारतीय जीवन-दृष्टि ने सदैव प्रकृति को पूज्य माना है। नदियों को माता, वृक्षों को देवतुल्य और पृथ्वी को जननी कहने वाली संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक संस्कार था। पीपल, वट, तुलसी, आँवला और कदम्ब जैसे वृक्षों के साथ जुड़ी सांस्कृतिक मान्यताओं का मूल उद्देश्य भी प्रकृति के संरक्षण को सामाजिक आस्था से जोड़ना था।
दुर्भाग्य से आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हमने इन परंपराओं के पीछे छिपे पर्यावरणीय ज्ञान को भुला दिया। आज आवश्यकता केवल वृक्षारोपण अभियानों की नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने की है। जब तक मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानता रहेगा, तब तक संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे। हमें पुन यह स्वीकार करना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसके सहयात्री हैं। पृथ्वी का स्वास्थ्य ही मानव सभ्यता का स्वास्थ्य है।
कचनार के फूलों की खोज दरअसल अपने खोए हुए पर्यावरण की खोज है। यह उस हरियाली की तलाश है जो हमारे गाँवों, नगरों और स्मृतियों से धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। यदि हम सचमुच चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी कचनार के गुलाबी फूलों से सजी धरती को देख सकें, तो हमें आज ही प्रकृति के साथ अपने संबंधों को पुनर्जीवित करना होगा।
अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब कचनार, कोयल, गौरैया और स्वच्छ नदियाँ केवल इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएँगी। तब शायद कोई बच्चा अपने दादा से पूछेगा-क्या सचमुच धरती कभी इतनी सुंदर हुआ करती थी? और उस प्रश्न में हमारी पूरी सभ्यता की विफलता छिपी होगी।
(लेखक : प्रोफेसर (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय हैं।)
सुबह की धनकती हुई गुनगुनी धूप, शब्दों से परे अव्यक्त ओस की कनिकाओं से सिंचित मिट्टी की सोंधी - सोंधी महक, चिड़ियों के गूँजते भैरव राग, हिमगिरि के उत्तुंग शिखरों पर श्वेत चुनरी के घूँघट की आड़ में लजाती उषा-सुन्दरी और कचनार के गुलाबी फूलों की पंखुरियों की तरह दमकता धरती का चेहरा...! प्रकृति के इस अपार वैभव और सौन्दर्य को देखकर कभी ऐसा लगता था मानो पृथ्वी स्वयं एक जीवंत उत्सव हो। ऋतुओं का अपना संगीत था, वृक्षों की अपनी भाषा थी, नदियों की अपनी स्मृतियाँ थीं और पक्षियों की अपनी दुनिया थी। कचनार के गुलाबी फूल केवल वृक्षों पर खिलने वाले पुष्प नहीं थे; वे ऋतु-परिवर्तन के दूत थे, प्रकृति के उल्लास का प्रतीक थे और मनुष्य तथा पर्यावरण के आत्मीय संबंधों के साक्षी थे। किंतु समय के साथ यह दृश्य बदलता गया। विकास के नाम पर बढ़ते शहरीकरण, अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, सिकुड़ते जंगलों, प्रदूषित होती नदियों और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने प्रकृति के उस सहज सौन्दर्य को धीरे-धीरे निगल लिया। आज ठंडी हवाओं के झोंकों-सी शीतल बयार दुर्लभ होती जा रही है, पक्षियों का कलरव महानगरों के शोर में खो रहा है और ऋतुओं की स्वाभाविक लय भी असंतुलित होती दिखाई देती है। ऐसे में जब स्मृतियों की खिड़की खुलती है तो मन अनायास ही पूछ उठता है- आखिर कहाँ गए वे कचनार के खिले हुए गुलाबी फूल, जो कभी हमारी धरती की मुस्कान हुआ करते थे? यह प्रश्न केवल एक वृक्ष या एक फूल के लुप्त होने का नहीं, बल्कि उस पर्यावरणीय संतुलन के विघटन का है, जिसके बिना मनुष्य का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता। दरअसल, कचनार का फूल यहाँ एक प्रतीक है। वह उन असंख्य वृक्षों, पक्षियों, तितलियों, झरनों और प्राकृतिक धरोहरों का प्रतिनिधि है जो हमारी आँखों के सामने धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं।
एक समय था जब गाँवों के रास्ते नीम, पीपल, बरगद और कचनार की छाया से ढँके रहते थे। घरों के आँगन में तुलसी के साथ कोई न कोई वृक्ष अवश्य खड़ा होता था। सुबह पक्षियों की चहचहाहट से खुलती थी और संध्या को लौटते पंछियों के कलरव से दिन का समापन होता था।
आज वही गाँव कंक्रीट की सड़कों और बहुमंज़िला निर्माणों के बीच अपनी प्राकृतिक पहचान खोते जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि प्रकृति के साथ मनुष्य का असंतुलित व्यवहार अंतत उसके अपने अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न करेगा। किंतु विकास की अंधी दौड़ में हमने इन चेतावनियों को अक्सर अनसुना कर दिया। जंगलों को काटकर उद्योग स्थापित किए गए, नदियों को प्रदूषण का बोझ सौंप दिया गया और पर्वतों को विस्फोटकों से छलनी कर दिया गया। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन आज एक वैश्विक संकट बन चुका है। असमय वर्षा, भीषण गर्मी, अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़ और बढ़ता प्रदूषण प्रकृति के उसी असंतुलन की अभिव्यक्तियाँ हैं जिसे मनुष्य ने स्वयं जन्म दिया है। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि प्रकृति का यह संकट अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा। इसका प्रभाव सीधे मनुष्य के जीवन पर पड़ रहा है। शहरों में शुद्ध वायु दुर्लभ होती जा रही है।
बच्चों को खुले मैदानों और पेड़ों की छाया से अधिक मोबाइल पीन उपलब्ध हैं। अनेक पक्षी और तितलियाँ, जो कभी हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थीं, अब केवल पुस्तकों और चित्रों में दिखाई देती हैं। आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह कल्पना भी न कर सकें कि कचनार के फूलों से लदे वृक्ष किस प्रकार पूरे वातावरण को गुलाबी आभा से भर देते थे। भारतीय जीवन-दृष्टि ने सदैव प्रकृति को पूज्य माना है। नदियों को माता, वृक्षों को देवतुल्य और पृथ्वी को जननी कहने वाली संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक संस्कार था। पीपल, वट, तुलसी, आँवला और कदम्ब जैसे वृक्षों के साथ जुड़ी सांस्कृतिक मान्यताओं का मूल उद्देश्य भी प्रकृति के संरक्षण को सामाजिक आस्था से जोड़ना था।
दुर्भाग्य से आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हमने इन परंपराओं के पीछे छिपे पर्यावरणीय ज्ञान को भुला दिया। आज आवश्यकता केवल वृक्षारोपण अभियानों की नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने की है। जब तक मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानता रहेगा, तब तक संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे। हमें पुन यह स्वीकार करना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसके सहयात्री हैं। पृथ्वी का स्वास्थ्य ही मानव सभ्यता का स्वास्थ्य है।
कचनार के फूलों की खोज दरअसल अपने खोए हुए पर्यावरण की खोज है। यह उस हरियाली की तलाश है जो हमारे गाँवों, नगरों और स्मृतियों से धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। यदि हम सचमुच चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी कचनार के गुलाबी फूलों से सजी धरती को देख सकें, तो हमें आज ही प्रकृति के साथ अपने संबंधों को पुनर्जीवित करना होगा।
अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब कचनार, कोयल, गौरैया और स्वच्छ नदियाँ केवल इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएँगी। तब शायद कोई बच्चा अपने दादा से पूछेगा-क्या सचमुच धरती कभी इतनी सुंदर हुआ करती थी? और उस प्रश्न में हमारी पूरी सभ्यता की विफलता छिपी होगी।
(लेखक : प्रोफेसर (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय हैं।)