यूपी में दलित एवं अति पिछड़ा कार्ड तुरुप का पत्ता
प्रकाशित: 28-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां अचानक तेज हो गई हैं। अभी चुनाव में समय है, लेकिन जिस तरह से सभी राजनीतिक दल सामाजिक समीकरणों को साधने में जुट गए हैं, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि आगामी चुनाव जातीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर केंद्रित हो सकता है। दलित, अति पिछड़ा और पाल समाज के इर्द-गिर्द राजनीति तेजी से घूमती दिखाई दे रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि कांग्रेस द्वारा दिल्ली के पूर्व मंत्री और दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना कितना कारगर साबित होगा। कांग्रेस लंबे समय से उत्तर प्रदेश में अपना खोया जनाधार वापस पाने की कोशिश कर रही है। कभी प्रदेश की सबसे प्रभावशाली पार्टी रही कांग्रेस पिछले तीन दशकों से लगातार कमजोर हुई है। ऐसे में पार्टी को यह एहसास है कि उत्तर प्रदेश में वापसी के लिए उसे नया सामाजिक समीकरण तैयार करना होगा। इसी रणनीति के तहत राजेंद्र पाल गौतम जैसे दलित चेहरे को बड़ी जिम्मेदारी देकर कांग्रेस ने स्पष्ट संदेश दिया है कि उसकी नजर प्रदेश के दलित वोट बैंक पर है प्रदेश में दलित मतदाताओं की संख्या लगभग 21 प्रतिशत मानी जाती है और किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह वर्ग चुनावी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बसपा अभी से उम्मीदवारों के चयन और घोषणा की प्रािढया में अन्य दलों से आगे निकलती दिखाई दे रही है। पार्टी अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने और नए सामाजिक गठबंधन बनाने की दिशा में काम कर रही है। बसपा ने पाल समाज के नेता विश्वनाथ पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह संकेत दिया है कि वह केवल दलित राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पिछड़े वर्गों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।भारतीय जनता पार्टी भी सामाजिक समीकरणों को लेकर बेहद सािढय दिखाई दे रही है। भाजपा ने बसपा की पूर्व विधायक पूजा पाल को उत्तर प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष नियुक्त कर अति पिछड़े और पाल समाज को साधने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।यह भी चर्चा है कि आने वाले दिनों में यदि केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है, तो उत्तर प्रदेश के दलित नेतृत्व को प्रमुखता दी जा सकती है। ऐसा कदम भाजपा की सामाजिक संतुलन की राजनीति को और मजबूती देने वाला हो सकता है। समाजवादी पार्टी ने भी संगठन में बदलाव करते हुए श्याम सिंह पाल को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। इसे भी पाल समाज और अन्य पिछड़े वर्गों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सपा जानती है कि केवल यादव और मुस्लिम समीकरण के भरोसे 2027 का चुनाव जीतना आसान नहीं होगा, इसलिए वह अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल बड़े दलों तक सीमित नहीं है। छोटे दल और क्षेत्रीय संगठन भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में जुटे हुए हैं।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।