चंपत राय का इस्तीफा, देर से उठाया गया सही कदम
प्रकाशित: 28-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
पिछले कुछ दशकों में अयोध्या का राम मंदिर हिन्दुओं की आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है। राम मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और चढ़ावा चढ़ाते हैं। देश-विदेश से आने वाले करोड़ों श्रद्धालु सोना-चांदी, हीरा-मोती, रुपए-पैसे सब कुछ दान करते हैं। इसके लिए यहां एक व्यवस्था बनाई गई है। बड़े ही दुख की बात है कि इस व्यवस्था में एक छेद हो गया है जिसके चलते यहां गड़बड़ी की खबरें आई हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सबसे पहले सात जून को इस बारे में एक्स पर एक पोस्ट डाली थी जिसके बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया। इसी बीच 9 जून को पीएमओ के संज्ञान में लेने के बाद अचानक राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा भी अयोध्या पहुंच गए। वहां उन्होंने ट्रस्टियों से विस्तृत जानकारी ली। इसके मात्र तीन दिन के बाद ही 13 जून को राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन कर मामले की जांच के आदेश दे दिए। इस एसआईटी में लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को शामिल किया गया। इस एसआईटी ने 6 दिनों में लगभग डेढ़ सौ कर्मियों के बयान दर्ज करके गत मंगलवार को अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद को प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप दी। जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है उनमें मंदिर व्यवस्था से जुड़े रामशंकर यादव टिन्नू के अलावा ट्रस्ट कमी अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष यादव, करुणेश पाण्डेय, रमाशंकर मिश्रा, अविनाश शुक्ल व सुभाष श्रीवास्तव शामिल हैं। लेकिन इस एफआईआर में ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी चंपत राय, डा. अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे बड़े नाम नहीं हैं, इसकी वजह से सरकार पर इन्हें बचाने का आरोप लगने लगा। मामले को बढ़ता देख कर विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) ने दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। वीएचपी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को जैसे ही एसआईटी की रिपोर्ट में आरोपियों के नाम पता चले उसने मुकदमा दर्ज करने में जरा भी देर नहीं की। मुकदमे में सिर्फ मामूली आरोपियों के नाम होने के आरोपों का जवाब देते हुए वीएचपी अध्यक्ष ने कहा कि पुलिस जांच का दायरा सिर्फ एफआईआर में बताए गए नामों तक सीमित नहीं रहता। जांच के दौरान यदि दूसरों की भूमिका सामने आती है तो पुलिस जांच का दायरा बढ़ाने और उनसे भी पूछताछ के लिए आजाद है। इसके बाद ही चंपत राय के इस्तीफे के कयास लगाए जाने लगे थे। अब एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने के तीन दिन बाद ही चंपत राय और डा. अनिल मिश्रा का इस्तीफा हो गया है। यह देर से उठाया गया सही कदम है। चूंकि ट्रस्ट एक आटोनोमस बॉडी है इसलिए इन इस्तीफों पर ट्रस्ट ही फैसला लेगा। यहां एक बात का जिक्र किया जाना जरूरी है कि चंपत राय अपनी सेवाओं के बदले ट्रस्ट से सैलरी नहीं लेते थे। लेकिन ट्रस्ट की सबसे महत्वपूर्ण हस्ती होने के चलते इस गड़बड़ी की जिम्मेदारी उन पर भी आती है। यदि वह यह मामला सामने आते ही अपना इस्तीफा दे देते तो बेहतर था। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में हिन्दुओं की भावनाओं के ठेस पहुंचाने वाले इस मामले को उसके अंजाम तक पहुंचाना बहुत जरूरी है।
पिछले कुछ दशकों में अयोध्या का राम मंदिर हिन्दुओं की आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है। राम मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं और चढ़ावा चढ़ाते हैं। देश-विदेश से आने वाले करोड़ों श्रद्धालु सोना-चांदी, हीरा-मोती, रुपए-पैसे सब कुछ दान करते हैं। इसके लिए यहां एक व्यवस्था बनाई गई है। बड़े ही दुख की बात है कि इस व्यवस्था में एक छेद हो गया है जिसके चलते यहां गड़बड़ी की खबरें आई हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सबसे पहले सात जून को इस बारे में एक्स पर एक पोस्ट डाली थी जिसके बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया। इसी बीच 9 जून को पीएमओ के संज्ञान में लेने के बाद अचानक राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा भी अयोध्या पहुंच गए। वहां उन्होंने ट्रस्टियों से विस्तृत जानकारी ली। इसके मात्र तीन दिन के बाद ही 13 जून को राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन कर मामले की जांच के आदेश दे दिए। इस एसआईटी में लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को शामिल किया गया। इस एसआईटी ने 6 दिनों में लगभग डेढ़ सौ कर्मियों के बयान दर्ज करके गत मंगलवार को अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद को प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप दी। जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है उनमें मंदिर व्यवस्था से जुड़े रामशंकर यादव टिन्नू के अलावा ट्रस्ट कमी अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष यादव, करुणेश पाण्डेय, रमाशंकर मिश्रा, अविनाश शुक्ल व सुभाष श्रीवास्तव शामिल हैं। लेकिन इस एफआईआर में ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारी चंपत राय, डा. अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे बड़े नाम नहीं हैं, इसकी वजह से सरकार पर इन्हें बचाने का आरोप लगने लगा। मामले को बढ़ता देख कर विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) ने दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया। वीएचपी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को जैसे ही एसआईटी की रिपोर्ट में आरोपियों के नाम पता चले उसने मुकदमा दर्ज करने में जरा भी देर नहीं की। मुकदमे में सिर्फ मामूली आरोपियों के नाम होने के आरोपों का जवाब देते हुए वीएचपी अध्यक्ष ने कहा कि पुलिस जांच का दायरा सिर्फ एफआईआर में बताए गए नामों तक सीमित नहीं रहता। जांच के दौरान यदि दूसरों की भूमिका सामने आती है तो पुलिस जांच का दायरा बढ़ाने और उनसे भी पूछताछ के लिए आजाद है। इसके बाद ही चंपत राय के इस्तीफे के कयास लगाए जाने लगे थे। अब एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंपे जाने के तीन दिन बाद ही चंपत राय और डा. अनिल मिश्रा का इस्तीफा हो गया है। यह देर से उठाया गया सही कदम है। चूंकि ट्रस्ट एक आटोनोमस बॉडी है इसलिए इन इस्तीफों पर ट्रस्ट ही फैसला लेगा। यहां एक बात का जिक्र किया जाना जरूरी है कि चंपत राय अपनी सेवाओं के बदले ट्रस्ट से सैलरी नहीं लेते थे। लेकिन ट्रस्ट की सबसे महत्वपूर्ण हस्ती होने के चलते इस गड़बड़ी की जिम्मेदारी उन पर भी आती है। यदि वह यह मामला सामने आते ही अपना इस्तीफा दे देते तो बेहतर था। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में हिन्दुओं की भावनाओं के ठेस पहुंचाने वाले इस मामले को उसके अंजाम तक पहुंचाना बहुत जरूरी है।