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प्रेमचंद प्रखर राष्ट्रवादी रचनाकार थे : प्रो. हरीश अरोड़ा

प्रकाशित: 07-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
वीर अर्जुन संवाददाता
नई दिल्ली। प्रेमचंद को किसी एक विचारधारा या दृष्टिकोण में सीमित किया जाता रहा है। उनके साहित्य का सही विश्लेषण किया जाए तो प्रेमचंद सही मायनों में एक प्रखर राष्ट्रवादी रचनाकार थे। ये विचार दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज (सांध्य) के प्रोफेसर हरीश अरोड़ा द्वारा लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर विमेन में आयोजित व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रेमचंद की राष्ट्रीय चेतना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी बल्कि सांस्कृतिक स्वाधीनता, सामाजिक जागरण, नैतिक पुनर्जागरण और भारतीय अस्मिता की रक्षा से भी गहराई से जुड़ी हुई थी। उन्होंने सोज़-ए-वतन, रंगभूमि, कर्मभूमि तथा अन्य रचनाओं के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज में आत्मगौरव, स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना का सशक्त संवाहक है। प्रो. अरोड़ा ने कहा कि प्रेमचंद को केवल वर्ग-संघर्ष या किसी एक विचारधारा के लेखक के रूप में सीमित करना उनके व्यापक रचनात्मक व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं है। उनके अनुसार प्रेमचंद का साहित्य भारतीय राष्ट्रजीवन, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का समन्वित आख्यान प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज, मानवीय संवेदना और नैतिक मूल्यों का व्यापक दस्तावेज़ है। लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर विमेन की वत्तृत्व : हिंदी वाद-विवाद समिति द्वारा हिंदी साहित्य के अमर कथाकार प्रेमचंद की स्मृति में प्रेमचंद का रचनात्मक अवदान एवं युगीन संदर्भ विषय पर एक विचारोत्तेजक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्पाम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद् प्रो. हरीश अरोड़ा ने प्रेमचंद के साहित्य, उनके वैचारिक व्यक्तित्व तथा समकालीन संदर्भों पर विस्तार से अपने विचार रखे। कार्पाम का शुभारंभ स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ। अपने व्याख्यान में प्रो. अरोड़ा ने उस धारणा का तर्कपूर्ण खंडन किया कि प्रेमचंद को केवल किसी एक विचारधारा या वैचारिक खांचे में रखकर देखा जाना चाहिए।
उन्होंने प्रेमचंद की विभिन्न कहानियों और उपन्यासों के उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि उनका साहित्य किसी एकांगी व्याख्या का विषय नहीं, बल्कि भारतीय समाज, मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों और सामाजिक यथार्थ का बहुआयामी दस्तावेज़ है। उन्होंने प्रेमचंद से संबंधित अनेक प्रचलित धारणाओं और एकांगी व्याख्याओं की समीक्षा करते हुए उनके साहित्य के मूल आशय को संदर्भों सहित स्पष्ट किया। उनका कहना था कि प्रेमचंद को समझने के लिए उनकी संपूर्ण रचनात्मक यात्रा, सामाजिक परिवेश और वैचारिक विकास को समग्रता में देखना आवश्यक है। व्याख्यान का एक महत्वपूर्ण पक्ष आत्मसम्मान और स्वाभिमान पर केंद्रित रहा। प्रो. अरोड़ा ने कहा कि व्यक्ति को जीवन की किसी भी परिस्थिति में अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करना चाहिए। उन्होंने प्रेमचंद की रचनाओं के अनेक पात्रों का उल्लेख करते हुए बताया कि वे केवल सामाजिक संघर्षों के प्रतीक नहीं हैं बल्कि मानवीय गरिमा, नैतिक साहस और स्वाभिमान के भी सशक्त प्रतिनिधि हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से साहित्य को पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर पढ़ने और उसके मानवीय पक्ष को समझने का आग्रह किया। इस अवसर पर हिंदी वाद-विवाद समिति की शिक्षक सलाहकार डॉ. सुनीता गुरुंग, हिंदी विभाग की डॉ. कंचन वर्मा एवं सुश्री नेहा कुमारी तथा दर्शन विभाग के श्री अवधेश पटेल उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने कार्पाम में सहभागिता करते हुए विषय पर सार्थक संवाद किया और वक्ता से प्रश्नोत्तर के माध्यम से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। कार्पाम के अंत में समिति की ओर से प्रो. हरीश अरोड़ा का आभार व्यक्त किया गया। यह व्याख्यान विद्यार्थियों के लिए प्रेमचंद के साहित्य को नए दृष्टिकोण से समझने के साथ-साथ आत्मसम्मान, मानवीय मूल्यों और साहित्य की बहुआयामी व्याख्या के महत्व को आत्मसात करने का प्रेरक अवसर सिद्ध हुआ।