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हिंसा एवं प्रति हिंसा गंभीर चिंता का विषय

प्रकाशित: 26-07-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
दिल्ली सहित देश के अनेक शहरों में छात्र आंदोलनों के दौरान जिस प्रकार तनाव, हिंसा और प्रतिहिंसा की घटनाएं सामने आई हैं, वे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। किसी भी लोकतंत्र में छात्रों को अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार है, वहीं सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे। जब आंदोलन हिंसक रूप ले लेते हैं तो इसका सबसे अधिक नुकसान छात्रों, आम नागरिकों, व्यापारियों, सार्वजनिक संपत्ति और पूरे समाज को उठाना पड़ता है। दिल्ली में कई मेट्रो स्टेशनों का बंद होना, प्रमुख बाजारों और कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में सुरक्षा कारणों से गतिविधियों का प्रभावित होना इस बात का संकेत है कि ऐसे हालात का प्रभाव केवल आंदोलनकारियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे शहर के आर्थिक और सामाजिक जीवन पर पड़ता है। 20 तारीख को संसद मार्च के दौरान हुई झड़पों के संबंध में विभिन्न माध्यमों से अनेक प्रकार के दावे और आरोप सामने आए हैं। कुछ समाचारों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई छात्र घायल हुए, बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगे, आंसू गैस और लाठीचार्ज का उल्लेख किया गया तथा कुछ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और धक्का-मुक्की के आरोप भी लगाए गए।
दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी भी घायल हुए तथा कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा उन पर हमला किया गया। ऐसे मामलों में विभिन्न पक्षों के आरोपों की सत्यता का निर्धारण केवल निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच से ही संभव है। इसलिए आवश्यक है कि घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच कराई जाए, उपलब्ध वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर तथ्य सामने लाए जाएं और यदि किसी भी पक्ष द्वारा कानून का उल्लंघन किया गया हो तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई की जाए। यदि यह आरोप लगाए गए हैं कि कुछ पुलिसकर्मियों ने पहचान संबंधी नियमों का पालन नहीं किया या कुछ लोग पुलिस की वर्दी के बिना बल प्रयोग करते दिखाई दिए, तो इन आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी प्रदर्शनकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा पुलिस पर हमला किया गया, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया या हिंसा की गई, तो उसके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का शासन तभी प्रभावी माना जाएगा जब किसी भी पक्ष के साथ पक्षपात न हो और दोषी व्यक्ति की पहचान उसके पद, संगठन या विचारधारा से नहीं बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।