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उत्तर प्रदेश में रंग ला रहे बाल विवाह और बाल मजदूरी के खिलाफ प्रयास

प्रकाशित: 03-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
शंकर दयाल
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के मुताबिक देश में 20-24 वर्ष की 23.3 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी। उत्तर प्रदेश का औसत 15.8 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। लेकिन पूरे राज्य में तस्वीर एक जैसी नहीं है। जैसे श्रावस्ती में बाल विवाह की दर 51.9 प्रतिशत, ललितपुर में 42, बहराइच में 37.5, बलरामपुर में 35 प्रतिशत और सिद्धार्थनगर में 33.9 प्रतिशत है। यानी राज्य का औसत कई जिलों में छिपी गंभीर समस्या को ढक देता है।
बाल विवाह एक ऐसा अपराध है जिसकी जड़ें परिवार, गरीबी, सामाजिक दबाव, लड़कियों की सुरक्षा को लेकर डर और लैंगिक असमानता में फैली हुई हैं। कई परिवार बेटी की शादी को उसकी सुरक्षा का रास्ता मानते हैं। कुछ को डर रहता है कि पढ़ाई या बाहर आने-जाने से लड़की किसी प्रेम संबंध में पड़ सकती है। गरीब परिवारों में विवाह को आर्थिक बोझ कम करने का साधन भी समझा जाता है। यही वजह है कि सिर्फ कानून बना देना काफी नहीं है। इन धारणाओं को बदले बिना कानून अकेला बहुत दूर नहीं जा सकता।
बाल विवाह पूरी तरह तभी रुकेगा जब समाज इसे रिवाज के बजाय अपराध और बच्चों की सेहत, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए खतरा मानना शुरू करेगा। यह लक्ष्य जागरूकता उपायों से ही हासिल किया जा सकता है और जागरूकता की कमी एक समस्या रही है।
केंद्र सरकार का बाल विवाह मुक्त भारत अभियान इसी की भरपाई की एक कोशिश है। इसकी खास बात यह है कि अभियान में सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि नागरिक समाज संगठन, पंचायतें, स्कूल जैसे समाज के सभी हिस्से शामिल हैं।
बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम कर रहे 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे नेटवर्क जस्ट जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 25 सहयोगी संगठन राज्य के सभी 75 जिलों में सरकार व प्रशासन के साथ मिलकर बाल विवाह के खिलाफ जमीनी अभियान चला रहे हैं। इस मुहिम में खास तौर से सभी धर्मों के धर्मगुरुओं को जोड़ा गया है क्योंकि धर्मगुरु अगर बाल विवाह संपन्न कराने से इनकार करते हैं तो समाज में एक बड़ा संदेश जाता है।
बाल विवाह मुक्त भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए चले 100 दिन के विशेष अभियान के दौरान बाल विवाह के खिलाफ 22.43 लाख से अधिक प्रतिज्ञाएं और 2.29 लाख से अधिक जागरूकता गतिविधियां दर्ज की गईं। इसमें प्रशासन, पुलिस, स्कूलों, आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं तथा सामाजिक संगठनों की भूमिका रही। गांव-गांव में चलाए गए जागरूकता अभियानों का नतीजा है कि अप्रैल 2023 से फरवरी 2026 के बीच उत्तर प्रदेश में 39,500 से ज्यादा लड़कियों ने बाल विवाह से इनकार किया। यह आंकड़ा सिर्फ रोके गए विवाहों की संख्या नहीं है। यह उस सामाजिक बदलाव का संकेत है जिसमें बच्चियां अपने भविष्य के बारे में बोलना शुरू कर रही हैं।
लेकिन बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई को बाल श्रम के खिलाफ चल रही मुहिम से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2027 तक प्रदेश को बाल श्रम मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है। जून 2026 तक 15 जिलों के 141 हॉटस्पॉट क्षेत्रों को बाल श्रम मुक्त घोषित किया गया। झांसी की सभी 496 ग्राम पंचायतों को बाल श्रम मुक्त बनाने की दिशा में काम चल रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त कराना ही लक्ष्य नहीं बनाया गया, बल्कि उन्हें स्कूल में दाखिला, पुनर्वास और सरकारी योजनाओं से जोड़ने पर भी जोर दिया गया।
यहीं से एक बड़ा सबक निकलता है। बच्चे को बचाना पहला कदम है, उसे उसी जोखिम में वापस जाने से रोकना असली चुनौती। बाल श्रम से मुक्त कराया गया बच्चा अगर स्कूल में नहीं टिक पाता तो उसके दोबारा मजदूरी में जाने का खतरा बना रहता है। इसी तरह बाल विवाह रुकने के बाद लड़की की पढ़ाई, सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित नहीं हुई तो परिवार फिर से शादी का दबाव बना सकता है। इसलिए स्कूलों में बच्चों की नियमित उपस्थिति पर नजर रखना बेहद जरूरी है। लगातार एक-दो हफ्ते स्कूल से गायब रहने वाला बच्चा संभावित बाल मजदूरी, बाल विवाह या किसी दूसरे शोषण का संकेत हो सकता है। स्कूलों की उपस्थिति व्यवस्था को ऑनलाइन कर ऐसी सूचना समय पर मिलने की व्यवस्था इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है।
सरकारी आंकड़ों और दावों की जांच जरूरी है। लेकिन उपलब्धियों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि आंकड़े सरकारी हैं। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या बच्चे स्कूल में टिक रहे हैं, क्या रोके गए बाल विवाह दोबारा तो नहीं हो रहे, क्या परिवार सरकारी योजनाओं से जुड़ रहे हैं और क्या बच्चियां अपने फैसले खुद लेने की स्थिति में आ रही हैं।
आखिरकार बाल विवाह खत्म करने की जंग कानून से ज्यादा सामाजिक चेतना की लड़ाई है। इसका सबसे बड़ा संकेत तब मिलेगा जब किसी पंचायत में शादी की तैयारी देख कर कोई बच्चा खुद कहे-‘नहीं, यह शादी नहीं होगी।' यह इनकार ही बदलाव की पहली सीढ़ी है क्योंकि सशक्तीकरण की शुरुआत अक्सर अपने जीवन के बारे में पहली बार खुद फैसला लेने से होती है। उत्तर प्रदेश के सामने अब चुनौती यही है कि जागरूकता से आए इनकार का यह साहस किसी लड़की की अकेली आवाज नहीं रह जाए, बल्कि उसे परिवार, स्कूल, पंचायत, प्रशासन और समाज की साझा ताकत बनाया जाए। उसी स्थिति में बाल विवाह के खिलाफ अभियान वास्तविक सामाजिक परिवर्तन बन सकेगा।
(लेखक नागरिक समाज संगठन जन कल्याण शिक्षण प्रसार समिति के सचिव हैं।)