'जेनजी' नहीं, सजग युवा वर्ग कहें
प्रकाशित: 05-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. बलराम मिश्र
“जेनजी'' एक अजनबी शब्द लगता है, जिस की व्याख्या करते समय यह भाव मन में आता है कि शायद यह अपने सजग युवा वर्ग की ओर संकेत करता जो शेष समाज से कुछ हट कर है। सच्चाई तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन मे शिशु, बाल्यकाल, युवा अवस्था, और वृद्धावस्था ाढमश विकास के कारण परस्पर जुड़े हैं।
युवावस्था कहीं बाहर से या कर देश मे प्रवेश नहीं करती। समाज और राष्ट्र जीवंत इकाई होते हैं। यह भी सत्य है कि वर्तमान युग जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक एवं वांछित आँकड़ें तुरंत उपलब्ध हो जाने के कारण सजग युवा वर्ग की आकांक्षाओं, अभिलाषाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को अभूतपूर्व हनक एवं धार मिली है। यह भी सही है कि अपने परंपरावादी देश में जीवन के वर्षों को अधिक महत्व मिलता है।
बड़ों-बूढ़ों के अनुभव को प्राथमिकता देना तथा नई पीढ़ी के जल्दबाज निष्कर्षों को संयोजित करने की आवश्यकता को कम महत्व देने से सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है, जिस का लाभ लेने के लिए राष्ट्र विरोधी तत्व लपकने लगते हैं। जब जेनजी के पैरोकार यह कहते हैं कि “राजनीतिक फैसलों के केंद्र में जेनजी को अपेक्षित स्थान नहीं मिलता'', और वह स्थान पाने के लिए “संसद का नहीं, सड़क का सहारा लेना होगा'', तो वे अराजकता और भीड़तंत्र की पीठ थपथपाते है। संपर्क, समझ, समरसता एवं समन्वय के के स्थान पर वे संघर्ष की स्थिति बना कर राष्ट्र की अस्मिता को ध्वस्त करने का प्रयास करते लगते हैं।
सौभाग्य से अपने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के कारण जेनजी सहित हर वर्ग के लोगों को अपनी बात कहने की आजादी है। दिक्कत तब आती है जब कोई वर्ग अपनी योग्यता, क्षमता एवं लोक प्रियता बना- बढ़ा कर अपना स्थान बनाने के बजाय उन स्थापित लोगों या दलों की कुर्सी छीन कर उस पर बैठने के लिए ाढांति करने की बात करते हैं। उन के उपद्रवोंका शमन करने के लिए जब जनशक्ति, पुलिस, या सक्षत्र बल मोर्चा सम्हालते हैं तो राष्ट्र विरोधी तत्व देश-विदेश मे चिल्लाते हैं कि भारत के लोक तंत्र मे विरोध का स्थान नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि जेन जी के पैरोकार देश के युवाओं को मछली पकड़ने की कला सिखाने के पक्ष मे खड़े होते नहीं लगते, वे मछली छीनने की आवश्यकता पर बल देते है। यह चाल नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका जैसे देशों मे तो कुछ हद तक फलदायी हो सकती है, किन्तु आदिकाल से ही हिमालय के उत्तर और समुद्र के दक्षिण मे सनातन जीवन पद्धति मे विकसित-विलसित जनसमूह अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्राचीन परंपरा का पोषक यह देवनिर्मित कहा जाने वाला भारत उसे कभी स्वीकार नहीं करने वाला, विशेष रूप से आज, जब सम्पूर्ण मानवता एकात्म मानवदर्शन तथा भारत के “वसुधैव कुटुंबकम'' के सिद्धांत की प्रशंसा करती है।
जेनजी के पैरोकार युवाओं की बेरोजगारी की बातें करते हैं जो शत प्रतिशत सत्य नहीं है, यद्यपि युवा वर्ग को भड़काने के लिए इस समस्या में मिर्च मसाला डाल कर परोसा जा रहा है। वर्तमान सरकार के द्वारा प्रदत्त सैकड़ों योजनाओं की ओर उन का ध्यान जाने नहीं दिया जाता। वे “पढ़ाई और नौकरी'' के बीच अनिवार्य संबंध की विदेशी परिकल्पना से ग्रस्त लगते हैं। मकाले और मैक्समूलर को टूल बना कर अंग्रेजी सत्ता ने भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति पर मट्ठा डाल कर और शिक्षा-क्षेत्र मे अपना वर्चस्व स्थापित कर के अपने इस निश्चय को बल दिया था कि भारतीय युवा वर्ग को पढ़ा लिखा और नौकरी दे कर गुलाम भारतीय जनता और अंग्रेजी सत्ता के बीच एक पुल के रूप मे इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
शिक्षा और नौकरी के मध्य वही पुराना संबंध बना कर रखने की मानसिकता गुलामी व्यवस्था का ही अंग है। सनातन व्यवस्था के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए सर्वांगीण मुक्ति, न कि बंधन: “सा विद्या या विमुक्तये''। सरकारी या अ-सरकारी नौकरी पाने के अनेकों क्षेत्र हैं किन्तु, प्राय, उन्हे योग्य, सक्षम एवम् श्रमशील युवक नहीं मिलते। एक उद्योगपति का यह कथन समीचीन है : “sंप्ग्त taत्क्ग्हु aंदल्t ल्ह-ास्ज्त्दब्सहू wा ग्gहदा tप sब्ह्दस द ास्ज्त्दब्aंग्त्ग्tब्'', अर्थात, जब हम बेकारी की बात करते हैं तो हम युवकों में योग्यता, कर्मठता एवं अध्यवसाय जैसे आवश्यक गुणों की आवश्यकता को भूल जाते हैं। वर्षों पूर्व मैँ एक युवक को भारतीय प्रशासनिक सेवाओं मे जाने के निश्चय को निरस्त करने का कारण जान कर चकित हो गया था।
परास्नातक की उपाधि प्राप्त उस ने सिविल सेवाओं के लिए भरने वाले फोर्म मे अपने नाम को गलत लिखा, गलती ठीक करने के लिए ओवर राइटिंग किया, फिर उसे मिटाने के प्रयास रबर से रगड़ा, और कागज फट गया। दूसरा फोर्म भरने के लिए पर्याप्त समय न था, इस लिए उस ने सिविल सेवाओं मे जाने के बजाय राज नीति मे जाने का निश्चय किया। जेनजी के पैरोकारों जैसे लोगों का समर्थन मिला, और वह जनता में भ्रम फैलाने वाला बन गया।
क्या संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मात्र नौकरी के अनुकूल बना कर कोईस्वतंत्र राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है? सामान्य जन तो युवकों से यह अपेक्षा रखता है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करे जिस मे बड़े बड़े प्रोफेसर और वॉइस चांसलर पेपर लीक जैसे जघन्य अपराधों मे लिप्त न हों। यह अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य है कि वर्तमान काल मे नेतृत्व के एक बड़े भाग में घोषित सेवा भाव के स्थान पर नवाबी भाव का नशा चढ़ा लगता है जो कोई शुभ लक्षण नहीं है। धनानंदों के पराभव एवं चन्द्रगुप्त मौर्यों जैसा नेतृत्व देने के लिए चाणक्यों को खोजना और उन्हे महत्व देना हो गा।
सुप्रसिद्ध विचारक संत तुलसी दास जी ने राष्ट्र की तुलना मानव देह से करने का संकेत देते हुए लिखा, “ मुखिया मुख सों चाहिए, खानपान में एक, पालहि पोसहि सकल अंग तुलसी सहित विवेक''। अर्थात समाज या राष्ट्र के मुखिया को मुख की भाँति काम करना चाहिए। मुख मे आये भोजन के पोषक तत्व मुंह केवल अपने लिए ही नहीं रख लेता, देह के सभी अंगों को विवेक पूर्ण ढंग से दे कर सभी अंगों अर्थात सम्पूर्ण देह का पालन पोषण करता है।
पोषक तत्व देह के सभी अंगों को समान नहीं मिलते। जितना पोषण हृदय जैसे अवयवों को मिलता है उतना अन्य अंगों को, समान रूप से, नहीं मिलता। आवश्यकतानुसार हर अंग का पोषण होता है।क्या कोई अंग यह मांग कर सकता है कि उसे अलग से विशेष पोषण मिलना चाहिए?
शरीर की ही भाँति राष्ट्र को मान कर चलना चाहिए। जिस तरह हर अंग शरीर का महत्वपूर्ण अंग है, उसे प्रकार जेनजी सहित सभी संगठन भारत माता की प्रिय संताने है. इस शाश्वत सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जेनजी नहीं, सजग युवा वर्ग कहें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
“जेनजी'' एक अजनबी शब्द लगता है, जिस की व्याख्या करते समय यह भाव मन में आता है कि शायद यह अपने सजग युवा वर्ग की ओर संकेत करता जो शेष समाज से कुछ हट कर है। सच्चाई तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन मे शिशु, बाल्यकाल, युवा अवस्था, और वृद्धावस्था ाढमश विकास के कारण परस्पर जुड़े हैं।
युवावस्था कहीं बाहर से या कर देश मे प्रवेश नहीं करती। समाज और राष्ट्र जीवंत इकाई होते हैं। यह भी सत्य है कि वर्तमान युग जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक एवं वांछित आँकड़ें तुरंत उपलब्ध हो जाने के कारण सजग युवा वर्ग की आकांक्षाओं, अभिलाषाओं एवं महत्वाकांक्षाओं को अभूतपूर्व हनक एवं धार मिली है। यह भी सही है कि अपने परंपरावादी देश में जीवन के वर्षों को अधिक महत्व मिलता है।
बड़ों-बूढ़ों के अनुभव को प्राथमिकता देना तथा नई पीढ़ी के जल्दबाज निष्कर्षों को संयोजित करने की आवश्यकता को कम महत्व देने से सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है, जिस का लाभ लेने के लिए राष्ट्र विरोधी तत्व लपकने लगते हैं। जब जेनजी के पैरोकार यह कहते हैं कि “राजनीतिक फैसलों के केंद्र में जेनजी को अपेक्षित स्थान नहीं मिलता'', और वह स्थान पाने के लिए “संसद का नहीं, सड़क का सहारा लेना होगा'', तो वे अराजकता और भीड़तंत्र की पीठ थपथपाते है। संपर्क, समझ, समरसता एवं समन्वय के के स्थान पर वे संघर्ष की स्थिति बना कर राष्ट्र की अस्मिता को ध्वस्त करने का प्रयास करते लगते हैं।
सौभाग्य से अपने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के कारण जेनजी सहित हर वर्ग के लोगों को अपनी बात कहने की आजादी है। दिक्कत तब आती है जब कोई वर्ग अपनी योग्यता, क्षमता एवं लोक प्रियता बना- बढ़ा कर अपना स्थान बनाने के बजाय उन स्थापित लोगों या दलों की कुर्सी छीन कर उस पर बैठने के लिए ाढांति करने की बात करते हैं। उन के उपद्रवोंका शमन करने के लिए जब जनशक्ति, पुलिस, या सक्षत्र बल मोर्चा सम्हालते हैं तो राष्ट्र विरोधी तत्व देश-विदेश मे चिल्लाते हैं कि भारत के लोक तंत्र मे विरोध का स्थान नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि जेन जी के पैरोकार देश के युवाओं को मछली पकड़ने की कला सिखाने के पक्ष मे खड़े होते नहीं लगते, वे मछली छीनने की आवश्यकता पर बल देते है। यह चाल नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका जैसे देशों मे तो कुछ हद तक फलदायी हो सकती है, किन्तु आदिकाल से ही हिमालय के उत्तर और समुद्र के दक्षिण मे सनातन जीवन पद्धति मे विकसित-विलसित जनसमूह अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्राचीन परंपरा का पोषक यह देवनिर्मित कहा जाने वाला भारत उसे कभी स्वीकार नहीं करने वाला, विशेष रूप से आज, जब सम्पूर्ण मानवता एकात्म मानवदर्शन तथा भारत के “वसुधैव कुटुंबकम'' के सिद्धांत की प्रशंसा करती है।
जेनजी के पैरोकार युवाओं की बेरोजगारी की बातें करते हैं जो शत प्रतिशत सत्य नहीं है, यद्यपि युवा वर्ग को भड़काने के लिए इस समस्या में मिर्च मसाला डाल कर परोसा जा रहा है। वर्तमान सरकार के द्वारा प्रदत्त सैकड़ों योजनाओं की ओर उन का ध्यान जाने नहीं दिया जाता। वे “पढ़ाई और नौकरी'' के बीच अनिवार्य संबंध की विदेशी परिकल्पना से ग्रस्त लगते हैं। मकाले और मैक्समूलर को टूल बना कर अंग्रेजी सत्ता ने भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति पर मट्ठा डाल कर और शिक्षा-क्षेत्र मे अपना वर्चस्व स्थापित कर के अपने इस निश्चय को बल दिया था कि भारतीय युवा वर्ग को पढ़ा लिखा और नौकरी दे कर गुलाम भारतीय जनता और अंग्रेजी सत्ता के बीच एक पुल के रूप मे इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
शिक्षा और नौकरी के मध्य वही पुराना संबंध बना कर रखने की मानसिकता गुलामी व्यवस्था का ही अंग है। सनातन व्यवस्था के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए सर्वांगीण मुक्ति, न कि बंधन: “सा विद्या या विमुक्तये''। सरकारी या अ-सरकारी नौकरी पाने के अनेकों क्षेत्र हैं किन्तु, प्राय, उन्हे योग्य, सक्षम एवम् श्रमशील युवक नहीं मिलते। एक उद्योगपति का यह कथन समीचीन है : “sंप्ग्त taत्क्ग्हु aंदल्t ल्ह-ास्ज्त्दब्सहू wा ग्gहदा tप sब्ह्दस द ास्ज्त्दब्aंग्त्ग्tब्'', अर्थात, जब हम बेकारी की बात करते हैं तो हम युवकों में योग्यता, कर्मठता एवं अध्यवसाय जैसे आवश्यक गुणों की आवश्यकता को भूल जाते हैं। वर्षों पूर्व मैँ एक युवक को भारतीय प्रशासनिक सेवाओं मे जाने के निश्चय को निरस्त करने का कारण जान कर चकित हो गया था।
परास्नातक की उपाधि प्राप्त उस ने सिविल सेवाओं के लिए भरने वाले फोर्म मे अपने नाम को गलत लिखा, गलती ठीक करने के लिए ओवर राइटिंग किया, फिर उसे मिटाने के प्रयास रबर से रगड़ा, और कागज फट गया। दूसरा फोर्म भरने के लिए पर्याप्त समय न था, इस लिए उस ने सिविल सेवाओं मे जाने के बजाय राज नीति मे जाने का निश्चय किया। जेनजी के पैरोकारों जैसे लोगों का समर्थन मिला, और वह जनता में भ्रम फैलाने वाला बन गया।
क्या संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को मात्र नौकरी के अनुकूल बना कर कोईस्वतंत्र राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है? सामान्य जन तो युवकों से यह अपेक्षा रखता है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करे जिस मे बड़े बड़े प्रोफेसर और वॉइस चांसलर पेपर लीक जैसे जघन्य अपराधों मे लिप्त न हों। यह अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य है कि वर्तमान काल मे नेतृत्व के एक बड़े भाग में घोषित सेवा भाव के स्थान पर नवाबी भाव का नशा चढ़ा लगता है जो कोई शुभ लक्षण नहीं है। धनानंदों के पराभव एवं चन्द्रगुप्त मौर्यों जैसा नेतृत्व देने के लिए चाणक्यों को खोजना और उन्हे महत्व देना हो गा।
सुप्रसिद्ध विचारक संत तुलसी दास जी ने राष्ट्र की तुलना मानव देह से करने का संकेत देते हुए लिखा, “ मुखिया मुख सों चाहिए, खानपान में एक, पालहि पोसहि सकल अंग तुलसी सहित विवेक''। अर्थात समाज या राष्ट्र के मुखिया को मुख की भाँति काम करना चाहिए। मुख मे आये भोजन के पोषक तत्व मुंह केवल अपने लिए ही नहीं रख लेता, देह के सभी अंगों को विवेक पूर्ण ढंग से दे कर सभी अंगों अर्थात सम्पूर्ण देह का पालन पोषण करता है।
पोषक तत्व देह के सभी अंगों को समान नहीं मिलते। जितना पोषण हृदय जैसे अवयवों को मिलता है उतना अन्य अंगों को, समान रूप से, नहीं मिलता। आवश्यकतानुसार हर अंग का पोषण होता है।क्या कोई अंग यह मांग कर सकता है कि उसे अलग से विशेष पोषण मिलना चाहिए?
शरीर की ही भाँति राष्ट्र को मान कर चलना चाहिए। जिस तरह हर अंग शरीर का महत्वपूर्ण अंग है, उसे प्रकार जेनजी सहित सभी संगठन भारत माता की प्रिय संताने है. इस शाश्वत सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। जेनजी नहीं, सजग युवा वर्ग कहें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)