पंजाब चुनाव एक सटीक परिचर्चा
प्रकाशित: 02-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. प्रवेश कुमार
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पिछले दिनो भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री का यह कहना कि ‘बीजेपी 117 विधानसभा सीटो पर चुनाव लड़ेगी'। यह पंजाब की राजनीति में बीजेपी के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा करती है। वही हम देखें तो पंजाब में बीजेपी अकालियों के साथ मिलकर चुनाव और सरकार में आई है। हम यह भी जानते हैं कि पंजाब देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित एक राज्य है। कभी पंजाब पेप्सू राज्य के भीतर आता था। वही यह राज्य देश के कृषि उत्पादन में अपनी क़ाफी बड़ी हिस्सेदारी का निर्वहन करता है। हम जानते हैं कि पंजाब की कुल आबादी में लगभग 32 -37ज्ञ् तक अनुसूचित जाति शामिल है। जिसे आज राजनीतिक भाषा में दलित कहा जाता है। यह दलित पहचान देश भर के दलितों को एक सामूहिक पहचान के रूप में प्रदर्शित करता है। पंजाब के इस चुनाव में सभी दल अपनी ताकत लगा रखे हैं। वही भारतीय जनता पार्टी अपने काम के आधार पर पंजाब से बड़ी उम्मीदें लगा रखी है। केंद्र में भाजपा की सरकार के द्वारा पंजाब को क़ाफी लाभ पहुचाने कि प्रयास हुआ है।
एक मोटा-मोटा आंकड़ा निकाला जाए तो पंजाब में जनधन बैंक खाते ही शहरी क्षेत्र में लगभग ग्रामीण और अर्थशहरी में 63,66742 तथा शहरी क्षेत्र में 37,88061 बैंक अकाउंट खोले गए है। इन खातो के माध्यम से सीधे पैसे भेजने की योजनाओं का लाभ पंजाब के लोग ले पा रहे है। किसान सम्मान निधि के तहत 12 लाख परिवारों को लाभ पहुंचा है। इसी प्रकार से वर्ष 2024-25 में ही केंद्र सरकार द्वारा 36792 आवासो को स्वीकृति प्रदान की गई है। पिछले वर्षों के आधार पर लाखो की संख्या में आवास का लाभ पंजाब के आम जान को हुआ है। इसी प्रकार से केंद्र सरकार की मुद्रा योजना में किशोर वर्ग में 4.88 लाख लोगों ने लाभ लिया तो शिशु वर्ग में 4.9 लाख वही तरुण में 80,054 लोगों ने लाभ लिया है। पंजाब की चुनावी राजनीति में निश्चित ही इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को होगा। परंतु राजनीति में विकास के साथ-साथ अन्य मुद्दे भी क़ाफी हद तक हावी रहते ही है। इसमें एक बड़ा विषय है दलित वोट बैंक है। पंजाब की सियासत में जिसका लाभ पिछली बार आम आदमी पार्टी को मिला जबकि बहुजन समाज पार्टी और अकाली दल का समझौता था। लेकिन दलितों का आम आदमी पार्टी के प्रति आकर्षण जिसने उसे पहली ही बार में पंजाब की सत्ता बैठा दिया।
पंजाब भारत का वह राज्य है जहाँ अनुसूचित जातियों जिसे राजनीतिक रूप से दलित कहा जाता है इस वर्ग की कुल जनसंख्या लगभग 32ज्ञ् से अधिक है, जो देश में सर्वाधिक है। यह केवल सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि राज्य की चुनावी राजनीति का निर्णायक आधार भी है। दोआबा क्षेत्र में तो अनेक ऐसी विधानसभा सीटे है, जिसके चुनाव परिणाम को प्रत्यक्ष रूप से दलित मतदाताओं के द्वारा प्रभावित होती है। पंजाब के अनुसूचित जाति पर एक बार नजर डाली जाए तो वहाँ रविदासिया, आदधर्मी, वाल्मीकि, मजहबी सिख, रामदासिया,धोबी तथा अन्य दलित जातियाँ है। इन जातियों का विभिन्न क्षेत्रों में बने डेरो के प्रति भी क़ाफी श्रद्धा है। यह डेरे भी पंजाब की राजनीति में महती भूमिका का निर्वहन करते है। डेरे से अभिप्राय गुरु का स्थान दलितों को समाज की तथाकथित उच्च जातीयों द्वारा तिरस्कृत होने पर वह मुख्य मंदिर गुरुद्वारे में ना जा कर डेरो की तऱफ जाने लगे। पंजाब वही क्षेत्र है जहाँ बाबू मंगूराम जी द्वारा आदि धर्म जैसे एक मजहबी उपसाना पद्धति को प्रारम्भ किया था। जिसने अपने प्रभाव को सम्पूर्ण देश में विस्तारित किया था।
पंजाब की राजनीति में अनिसूचित जातियों का प्रभाव यह है कि कांग्रेस जैसी पार्टी को चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा वहीं बूटा सिंह कांग्रेस की राजनीति में सदैव प्रासंगिक रहे। किसी भी दल को यदि पंजाब में राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करना है तो उसे पंजाब के सामाजिक समीकरणों को समझना ही होगा। हम देखे की पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं, जिनमें 34 सीटें अनुसूचित जाति (एण्) के लिए आरक्षित हैं। यह देश में किसी भी राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की सबसे बड़ी संख्या में से एक है। पंजाब की राजनीति को समझने के लिए राज्य को तीन प्रमुख क्षेत्रों में देखना आवश्यक है। दोआबा क्षेत्र जिसमे जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और शाहिद भगत सिंह नगर आदि आते है, इस क्षेत्र को पंजाब की दलित राजनीति का केंद्र के रूप में देखा जाता है। इस क्षेत्र में कई विधानसभाएँ ऐसी है जहाँ पर दलित जनसंख्या 35-45ज्ञ् या उससे अधिक है। दलितों में यहां एक तऱफ विदेशों में रहने वाला दलित तो वही खेती किसानी करने वाला तो क़ाफी संख्या में आर्थिक रूप से कमजोर दलित भी है। यह वही क्षेत्र है जहाँ आदि धर्म का भी प्रभाव रहा, वही रविदासिया समाज का यहाँ अच्छा दबदबा है।
इस क्षेत्र में उसी पार्टी को सफलता मिल सकती है, जिसे 20-25ज्ञ् दलित वोट मिले। इस क्षेत्र में बिना दलित वोट प्राप्त किए कोई भी दल अपने प्रत्याशी को जितवा नहीं सकता। इसी प्रकार से मालवा क्षेत्र आता है जहाँ से साठ विधानसभा आती है।
इस क्षेत्र का पंजाब की राजनीति में क़ाफी प्रभाव है या यह कहा जाए कि पंजाब की सरकार बनने में इस क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। इस क्षेत्र का भी सामाजिक विश्लेषण करे तो यह पर भी अनुसूचित जातियों की क़ाफी बड़ी जनसंख्या है। इस क्षेत्र में दलित जातियाँ भूमिहीन और कृषि मजदूर हैं, कुछ लोग सरकारी सेक्टर में भी है, इस लिए सरकारी कर्मचारियों को दिए जाने वाला लाभ कुछ हद तक यह कि राजनीति को प्रभावित करेगा। इस क्षेत्र में किसी भी पार्टी के लिए इन मुद्दों से दो हाथ ज़रूर करना पड़ेगा।
इस क्षेत्र में किसानों की भी क़ाफी राजनीति है, किसान आंदोलन में यहाँ का क़ाफी प्रभाव रहा है। यहाँ बेरोजगारी, नशा, शिक्षा और मजदूरों के अधिकारों को लेकर कई मुद्दे हैं। यहाँ किसी भी पार्टी को अपना आधार बढ़ाने के लिए दलित, ग्रामीण और शहरी मजदूर एवं जट्ट जमीदार किसान और शहरी आबादी के बीच अपने काम को बनाना ही पड़ेगा। इन दो क्षेत्रों के बाद माझा जिसमे का क्षेत्र भी क़ाफी प्रभावी है, अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन वाले क्षेत्र जो अपनी धार्मिक पहचान के लिए विख्यात है तो वही सीमा सुरक्षा भी यहाँ एक मुद्दा ज़रूर है। यह क्षेत्र हिंदू और सिख दोनों पक्षों से भरा है, वहीं अनुसूचित जाति की संख्या भी कम नहीं है। इन परिस्थितियों से किसी भी पार्टी दो-चार करना ही पड़ेगा ऐसे में पंजाब में बीजेपी को यदि सत्ता में आना है तो जहाँ एक और विकास तो वही गुरुओं के त्याग बलिदान और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर बात करनी होगी। क्युकि इस बार भाजपा के सामने चुनौती केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक सामाजिक गठबंधन निर्मित करने की है। वैसे यदि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर गैर-प्रभुत्वशाली पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों के बीच जिस प्रकार अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाई, उसी मॉडल को पंजाब में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।
बीजेपी को डॉ. भीमराव आंबेडकर, गुरु रविदास, भगवान वाल्मीकि जी के साथ-साथ पंजाब के समाज सुधारक बाबू मंगूराम, नाथू धोबी एवं ऊधम सिंह जी, लाला लाजपत राय तो शहीद भगत सिंह का भी स्मरण करना होगा। इसके अतिरिक्त, पंजाब में बेरोजगारी, प्रवासन, नशाखोरी, कृषि संकट, औद्योगिक ठहराव, शिक्षा, शहरी गरीबी और सामाजिक असमानता जैसे प्रश्न दलित राजनीति से गहराई से जुड़े हुए हैं। केवल प्रतीकों, स्मारकों या सम्मान समारोहों के माध्यम से दलित मतदाताओं का विश्वास स्थायी रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि भाजपा को पंजाब में दीर्घकालिक राजनीतिक आधार बनाना है, तो उसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ आर्थिक अवसर, शिक्षा, भूमि अधिकार, रोजगार और स्थानीय नेतृत्व निर्माण जैसे मुद्दों पर भी विश्वसनीय नीतियाँ प्रस्तुत करनी होंगी।
(लेखक तुलनात्मक अध्ययन एवं राजनीतिक सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली हैं।)
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पिछले दिनो भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री का यह कहना कि ‘बीजेपी 117 विधानसभा सीटो पर चुनाव लड़ेगी'। यह पंजाब की राजनीति में बीजेपी के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा करती है। वही हम देखें तो पंजाब में बीजेपी अकालियों के साथ मिलकर चुनाव और सरकार में आई है। हम यह भी जानते हैं कि पंजाब देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित एक राज्य है। कभी पंजाब पेप्सू राज्य के भीतर आता था। वही यह राज्य देश के कृषि उत्पादन में अपनी क़ाफी बड़ी हिस्सेदारी का निर्वहन करता है। हम जानते हैं कि पंजाब की कुल आबादी में लगभग 32 -37ज्ञ् तक अनुसूचित जाति शामिल है। जिसे आज राजनीतिक भाषा में दलित कहा जाता है। यह दलित पहचान देश भर के दलितों को एक सामूहिक पहचान के रूप में प्रदर्शित करता है। पंजाब के इस चुनाव में सभी दल अपनी ताकत लगा रखे हैं। वही भारतीय जनता पार्टी अपने काम के आधार पर पंजाब से बड़ी उम्मीदें लगा रखी है। केंद्र में भाजपा की सरकार के द्वारा पंजाब को क़ाफी लाभ पहुचाने कि प्रयास हुआ है।
एक मोटा-मोटा आंकड़ा निकाला जाए तो पंजाब में जनधन बैंक खाते ही शहरी क्षेत्र में लगभग ग्रामीण और अर्थशहरी में 63,66742 तथा शहरी क्षेत्र में 37,88061 बैंक अकाउंट खोले गए है। इन खातो के माध्यम से सीधे पैसे भेजने की योजनाओं का लाभ पंजाब के लोग ले पा रहे है। किसान सम्मान निधि के तहत 12 लाख परिवारों को लाभ पहुंचा है। इसी प्रकार से वर्ष 2024-25 में ही केंद्र सरकार द्वारा 36792 आवासो को स्वीकृति प्रदान की गई है। पिछले वर्षों के आधार पर लाखो की संख्या में आवास का लाभ पंजाब के आम जान को हुआ है। इसी प्रकार से केंद्र सरकार की मुद्रा योजना में किशोर वर्ग में 4.88 लाख लोगों ने लाभ लिया तो शिशु वर्ग में 4.9 लाख वही तरुण में 80,054 लोगों ने लाभ लिया है। पंजाब की चुनावी राजनीति में निश्चित ही इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को होगा। परंतु राजनीति में विकास के साथ-साथ अन्य मुद्दे भी क़ाफी हद तक हावी रहते ही है। इसमें एक बड़ा विषय है दलित वोट बैंक है। पंजाब की सियासत में जिसका लाभ पिछली बार आम आदमी पार्टी को मिला जबकि बहुजन समाज पार्टी और अकाली दल का समझौता था। लेकिन दलितों का आम आदमी पार्टी के प्रति आकर्षण जिसने उसे पहली ही बार में पंजाब की सत्ता बैठा दिया।
पंजाब भारत का वह राज्य है जहाँ अनुसूचित जातियों जिसे राजनीतिक रूप से दलित कहा जाता है इस वर्ग की कुल जनसंख्या लगभग 32ज्ञ् से अधिक है, जो देश में सर्वाधिक है। यह केवल सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि राज्य की चुनावी राजनीति का निर्णायक आधार भी है। दोआबा क्षेत्र में तो अनेक ऐसी विधानसभा सीटे है, जिसके चुनाव परिणाम को प्रत्यक्ष रूप से दलित मतदाताओं के द्वारा प्रभावित होती है। पंजाब के अनुसूचित जाति पर एक बार नजर डाली जाए तो वहाँ रविदासिया, आदधर्मी, वाल्मीकि, मजहबी सिख, रामदासिया,धोबी तथा अन्य दलित जातियाँ है। इन जातियों का विभिन्न क्षेत्रों में बने डेरो के प्रति भी क़ाफी श्रद्धा है। यह डेरे भी पंजाब की राजनीति में महती भूमिका का निर्वहन करते है। डेरे से अभिप्राय गुरु का स्थान दलितों को समाज की तथाकथित उच्च जातीयों द्वारा तिरस्कृत होने पर वह मुख्य मंदिर गुरुद्वारे में ना जा कर डेरो की तऱफ जाने लगे। पंजाब वही क्षेत्र है जहाँ बाबू मंगूराम जी द्वारा आदि धर्म जैसे एक मजहबी उपसाना पद्धति को प्रारम्भ किया था। जिसने अपने प्रभाव को सम्पूर्ण देश में विस्तारित किया था।
पंजाब की राजनीति में अनिसूचित जातियों का प्रभाव यह है कि कांग्रेस जैसी पार्टी को चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा वहीं बूटा सिंह कांग्रेस की राजनीति में सदैव प्रासंगिक रहे। किसी भी दल को यदि पंजाब में राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करना है तो उसे पंजाब के सामाजिक समीकरणों को समझना ही होगा। हम देखे की पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं, जिनमें 34 सीटें अनुसूचित जाति (एण्) के लिए आरक्षित हैं। यह देश में किसी भी राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की सबसे बड़ी संख्या में से एक है। पंजाब की राजनीति को समझने के लिए राज्य को तीन प्रमुख क्षेत्रों में देखना आवश्यक है। दोआबा क्षेत्र जिसमे जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और शाहिद भगत सिंह नगर आदि आते है, इस क्षेत्र को पंजाब की दलित राजनीति का केंद्र के रूप में देखा जाता है। इस क्षेत्र में कई विधानसभाएँ ऐसी है जहाँ पर दलित जनसंख्या 35-45ज्ञ् या उससे अधिक है। दलितों में यहां एक तऱफ विदेशों में रहने वाला दलित तो वही खेती किसानी करने वाला तो क़ाफी संख्या में आर्थिक रूप से कमजोर दलित भी है। यह वही क्षेत्र है जहाँ आदि धर्म का भी प्रभाव रहा, वही रविदासिया समाज का यहाँ अच्छा दबदबा है।
इस क्षेत्र में उसी पार्टी को सफलता मिल सकती है, जिसे 20-25ज्ञ् दलित वोट मिले। इस क्षेत्र में बिना दलित वोट प्राप्त किए कोई भी दल अपने प्रत्याशी को जितवा नहीं सकता। इसी प्रकार से मालवा क्षेत्र आता है जहाँ से साठ विधानसभा आती है।
इस क्षेत्र का पंजाब की राजनीति में क़ाफी प्रभाव है या यह कहा जाए कि पंजाब की सरकार बनने में इस क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। इस क्षेत्र का भी सामाजिक विश्लेषण करे तो यह पर भी अनुसूचित जातियों की क़ाफी बड़ी जनसंख्या है। इस क्षेत्र में दलित जातियाँ भूमिहीन और कृषि मजदूर हैं, कुछ लोग सरकारी सेक्टर में भी है, इस लिए सरकारी कर्मचारियों को दिए जाने वाला लाभ कुछ हद तक यह कि राजनीति को प्रभावित करेगा। इस क्षेत्र में किसी भी पार्टी के लिए इन मुद्दों से दो हाथ ज़रूर करना पड़ेगा।
इस क्षेत्र में किसानों की भी क़ाफी राजनीति है, किसान आंदोलन में यहाँ का क़ाफी प्रभाव रहा है। यहाँ बेरोजगारी, नशा, शिक्षा और मजदूरों के अधिकारों को लेकर कई मुद्दे हैं। यहाँ किसी भी पार्टी को अपना आधार बढ़ाने के लिए दलित, ग्रामीण और शहरी मजदूर एवं जट्ट जमीदार किसान और शहरी आबादी के बीच अपने काम को बनाना ही पड़ेगा। इन दो क्षेत्रों के बाद माझा जिसमे का क्षेत्र भी क़ाफी प्रभावी है, अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन वाले क्षेत्र जो अपनी धार्मिक पहचान के लिए विख्यात है तो वही सीमा सुरक्षा भी यहाँ एक मुद्दा ज़रूर है। यह क्षेत्र हिंदू और सिख दोनों पक्षों से भरा है, वहीं अनुसूचित जाति की संख्या भी कम नहीं है। इन परिस्थितियों से किसी भी पार्टी दो-चार करना ही पड़ेगा ऐसे में पंजाब में बीजेपी को यदि सत्ता में आना है तो जहाँ एक और विकास तो वही गुरुओं के त्याग बलिदान और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर बात करनी होगी। क्युकि इस बार भाजपा के सामने चुनौती केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक सामाजिक गठबंधन निर्मित करने की है। वैसे यदि पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर गैर-प्रभुत्वशाली पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों के बीच जिस प्रकार अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाई, उसी मॉडल को पंजाब में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।
बीजेपी को डॉ. भीमराव आंबेडकर, गुरु रविदास, भगवान वाल्मीकि जी के साथ-साथ पंजाब के समाज सुधारक बाबू मंगूराम, नाथू धोबी एवं ऊधम सिंह जी, लाला लाजपत राय तो शहीद भगत सिंह का भी स्मरण करना होगा। इसके अतिरिक्त, पंजाब में बेरोजगारी, प्रवासन, नशाखोरी, कृषि संकट, औद्योगिक ठहराव, शिक्षा, शहरी गरीबी और सामाजिक असमानता जैसे प्रश्न दलित राजनीति से गहराई से जुड़े हुए हैं। केवल प्रतीकों, स्मारकों या सम्मान समारोहों के माध्यम से दलित मतदाताओं का विश्वास स्थायी रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि भाजपा को पंजाब में दीर्घकालिक राजनीतिक आधार बनाना है, तो उसे सामाजिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ आर्थिक अवसर, शिक्षा, भूमि अधिकार, रोजगार और स्थानीय नेतृत्व निर्माण जैसे मुद्दों पर भी विश्वसनीय नीतियाँ प्रस्तुत करनी होंगी।
(लेखक तुलनात्मक अध्ययन एवं राजनीतिक सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली हैं।)