मनोहर लाल का संकल्प : राजभाषा बने राष्ट्र निर्माण की शक्ति
प्रकाशित: 07-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. विपिन कुमार
हिंदी को केवल सरकारी कामकाज की भाषा मानने का समय अब पीछे छूट चुका है। आज हिंदी को सुशासन, जनभागीदारी, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संवाद की भाषा बनाने की आवश्यकता है। 2 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में विद्युत मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक में केंद्रीय विद्युत तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल की सक्रिय उपस्थिति इसी बदलती सोच का स्पष्ट संकेत है।
भारत की पहचान केवल उसकी आर्थिक शक्ति और तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और ज्ञान परंपरा से भी होती है। हिंदी देश के विभिन्न क्षेत्रों, समाजों और पीढ़ियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए राजभाषा हिंदी का विस्तार केवल सरकारी कार्यालयों का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मविश्वास, सुशासन और राष्ट्रनिर्माण का विषय है।
2 सितंबर की बैठक में केंद्रीय विद्युत तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल, विद्युत राज्य मंत्री श्री श्रीपाद येसो नाईक तथा विद्युत मंत्रालय के सचिव श्री पंकज अग्रवाल सहित मंत्रालय और विद्युत क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। इस सहभागिता का विशेष महत्व इसलिए है कि विद्युत क्षेत्र देश की विकास यात्रा का आधार है और राजभाषा उस विकास को जन-जन तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
विद्युत क्षेत्र के प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों की भागीदारी ने इस पहल को और व्यापक बनाया। एनटीपीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री गुरदीप सिंह, पावरग्रिड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री बुर्रा वामसी रामा मोहन, आरईसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री जितेंद्र श्रीवास्तव, पीएफसी की अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्रीमती परमिंदर चोपड़ा, एनएचपीसी तथा एसजेवीएन के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री भूपेंद्र गुप्ता सहित विद्युत क्षेत्र के वरिष्ठ नेतृत्व की सहभागिता यह संदेश देती है कि हिंदी को संस्थागत कार्य-संस्कृति का हिस्सा बनाने की आवश्यकता अब और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। एसजेवीएन को वर्ष 2025-26 में राजभाषा के उत्कृष्ट कार्यान्वयन के लिए तृतीय राजभाषा शील्ड से सम्मानित किया जाना भी उल्लेखनीय है। ऐसे सम्मान केवल पुरस्कार नहीं हैं, बल्कि उन संस्थानों के प्रयासों की सार्वजनिक स्वीकृति हैं, जो हिंदी को अपने नियमित कार्य और प्रशासन का हिस्सा बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
मनोहर लाल का राजभाषा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा और भाषा दोनों विकास की आधारशिला हैं। बिजली उद्योग, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल व्यवस्था को गति देती है, वहीं सरल और सहज भाषा शासन को जनता के निकट लाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी योजनाओं, नागरिक सेवाओं, तकनीकी जानकारी और प्रशासनिक व्यवस्था में हिंदी का प्रयोग केवल औपचारिकता न रहे। हिंदी को ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, डिजिटल व्यवस्था और जनसंवाद की भाषा बनाना होगा।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि हिंदी का विकास भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके सम्मान और सहयोग के साथ हो। भारत की प्रत्येक भाषा हमारी सांस्कृतिक शक्ति है। हिंदी इन भाषाओं के बीच संवाद और संपर्क का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर राजभाषा को मजबूत करने के साथ हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करना भी समय की मांग है। इसी दिशा में विश्व हिंदी परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। परिषद हिंदी प्रेमियों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, प्रवासी भारतीयों और विदेशों में सक्रिय हिंदी संस्थाओं को जोड़ने तथा हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार को गति देने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है।
विश्व हिंदी परिषद द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारतरत्न अटल : हिंदी, राष्ट्रवाद और सुशासन'' इसी व्यापक अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रस्तावित सम्मेलन के माध्यम से भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी के हिंदी, राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति और सुशासन संबंधी विचारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
अटल जी ने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति की भाषा नहीं माना, बल्कि उसे भारत के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में उनका ऐतिहासिक संबोधन आज भी भारतीय भाषाई स्वाभिमान का प्रेरक उदाहरण है। उनके विचारों को नई पीढ़ी और विश्व समुदाय तक पहुँचाना हिंदी के वैश्विक विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विश्व हिंदी परिषद की भूमिका केवल सम्मेलन आयोजित करने तक सीमित नहीं है। विदेशों के विश्वविद्यालयों, हिंदी शिक्षकों, भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं, प्रवासी भारतीय संगठनों और युवाओं को एक साझा मंच से जोड़ना भी इसका महत्वपूर्ण दायित्व है। आज डिजिटल माध्यमों, सामाजिक संचार माध्यमों, चलचित्रों, श्रव्य कार्यक्रमों, कविता, कहानी और ऑनलाइन शिक्षा के जरिए हिंदी को दुनिया के युवाओं तक पहले से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है।
भारत आज विश्व मंच पर तेजी से अपनी नई पहचान बना रहा है। ऐसे समय में हमारी भाषा भी आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने उपस्थित होनी चाहिए। हिंदी का वैश्विक विस्तार केवल भाषा का विस्तार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और विचार-दृष्टि का वैश्विक विस्तार है। मनोहर लाल के नेतृत्व में राजभाषा को प्रशासन और विकास से जोड़ने की पहल तथा विश्व हिंदी परिषद के अंतरराष्ट्रीय प्रयास मिलकर एक बड़े राष्ट्रीय संकल्प का रूप ले सकते हैं-ऐसा भारत, जो विकास में आधुनिक हो, तकनीक में अग्रणी हो और अपनी भाषा तथा संस्कृति के प्रति आत्मविश्वासी भी हो। आज जरूरत है कि राजभाषा की चर्चा फाइलों से निकलकर कार्यालयों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, उद्योगों, डिजिटल मंचों और जनजीवन तक पहुँचे। हिंदी को रोजगार और ज्ञान की भाषा बनाना होगा और भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर उसे विश्व संवाद का सशक्त माध्यम बनाना होगा। अंतत सवाल केवल यह नहीं है कि हिंदी का कितना प्रयोग हो रहा है, असली सवाल यह है कि हिंदी भारत की विकास-यात्रा में कितनी प्रभावी भूमिका निभा रही है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)।
हिंदी को केवल सरकारी कामकाज की भाषा मानने का समय अब पीछे छूट चुका है। आज हिंदी को सुशासन, जनभागीदारी, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संवाद की भाषा बनाने की आवश्यकता है। 2 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में विद्युत मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक में केंद्रीय विद्युत तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल की सक्रिय उपस्थिति इसी बदलती सोच का स्पष्ट संकेत है।
भारत की पहचान केवल उसकी आर्थिक शक्ति और तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और ज्ञान परंपरा से भी होती है। हिंदी देश के विभिन्न क्षेत्रों, समाजों और पीढ़ियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए राजभाषा हिंदी का विस्तार केवल सरकारी कार्यालयों का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मविश्वास, सुशासन और राष्ट्रनिर्माण का विषय है।
2 सितंबर की बैठक में केंद्रीय विद्युत तथा आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल, विद्युत राज्य मंत्री श्री श्रीपाद येसो नाईक तथा विद्युत मंत्रालय के सचिव श्री पंकज अग्रवाल सहित मंत्रालय और विद्युत क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। इस सहभागिता का विशेष महत्व इसलिए है कि विद्युत क्षेत्र देश की विकास यात्रा का आधार है और राजभाषा उस विकास को जन-जन तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
विद्युत क्षेत्र के प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों की भागीदारी ने इस पहल को और व्यापक बनाया। एनटीपीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री गुरदीप सिंह, पावरग्रिड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री बुर्रा वामसी रामा मोहन, आरईसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री जितेंद्र श्रीवास्तव, पीएफसी की अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्रीमती परमिंदर चोपड़ा, एनएचपीसी तथा एसजेवीएन के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री भूपेंद्र गुप्ता सहित विद्युत क्षेत्र के वरिष्ठ नेतृत्व की सहभागिता यह संदेश देती है कि हिंदी को संस्थागत कार्य-संस्कृति का हिस्सा बनाने की आवश्यकता अब और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। एसजेवीएन को वर्ष 2025-26 में राजभाषा के उत्कृष्ट कार्यान्वयन के लिए तृतीय राजभाषा शील्ड से सम्मानित किया जाना भी उल्लेखनीय है। ऐसे सम्मान केवल पुरस्कार नहीं हैं, बल्कि उन संस्थानों के प्रयासों की सार्वजनिक स्वीकृति हैं, जो हिंदी को अपने नियमित कार्य और प्रशासन का हिस्सा बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
मनोहर लाल का राजभाषा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊर्जा और भाषा दोनों विकास की आधारशिला हैं। बिजली उद्योग, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल व्यवस्था को गति देती है, वहीं सरल और सहज भाषा शासन को जनता के निकट लाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी योजनाओं, नागरिक सेवाओं, तकनीकी जानकारी और प्रशासनिक व्यवस्था में हिंदी का प्रयोग केवल औपचारिकता न रहे। हिंदी को ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, डिजिटल व्यवस्था और जनसंवाद की भाषा बनाना होगा।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि हिंदी का विकास भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके सम्मान और सहयोग के साथ हो। भारत की प्रत्येक भाषा हमारी सांस्कृतिक शक्ति है। हिंदी इन भाषाओं के बीच संवाद और संपर्क का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर राजभाषा को मजबूत करने के साथ हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करना भी समय की मांग है। इसी दिशा में विश्व हिंदी परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। परिषद हिंदी प्रेमियों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, प्रवासी भारतीयों और विदेशों में सक्रिय हिंदी संस्थाओं को जोड़ने तथा हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार को गति देने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है।
विश्व हिंदी परिषद द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारतरत्न अटल : हिंदी, राष्ट्रवाद और सुशासन'' इसी व्यापक अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रस्तावित सम्मेलन के माध्यम से भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी के हिंदी, राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति और सुशासन संबंधी विचारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
अटल जी ने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति की भाषा नहीं माना, बल्कि उसे भारत के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ा। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में उनका ऐतिहासिक संबोधन आज भी भारतीय भाषाई स्वाभिमान का प्रेरक उदाहरण है। उनके विचारों को नई पीढ़ी और विश्व समुदाय तक पहुँचाना हिंदी के वैश्विक विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विश्व हिंदी परिषद की भूमिका केवल सम्मेलन आयोजित करने तक सीमित नहीं है। विदेशों के विश्वविद्यालयों, हिंदी शिक्षकों, भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं, प्रवासी भारतीय संगठनों और युवाओं को एक साझा मंच से जोड़ना भी इसका महत्वपूर्ण दायित्व है। आज डिजिटल माध्यमों, सामाजिक संचार माध्यमों, चलचित्रों, श्रव्य कार्यक्रमों, कविता, कहानी और ऑनलाइन शिक्षा के जरिए हिंदी को दुनिया के युवाओं तक पहले से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है।
भारत आज विश्व मंच पर तेजी से अपनी नई पहचान बना रहा है। ऐसे समय में हमारी भाषा भी आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने उपस्थित होनी चाहिए। हिंदी का वैश्विक विस्तार केवल भाषा का विस्तार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और विचार-दृष्टि का वैश्विक विस्तार है। मनोहर लाल के नेतृत्व में राजभाषा को प्रशासन और विकास से जोड़ने की पहल तथा विश्व हिंदी परिषद के अंतरराष्ट्रीय प्रयास मिलकर एक बड़े राष्ट्रीय संकल्प का रूप ले सकते हैं-ऐसा भारत, जो विकास में आधुनिक हो, तकनीक में अग्रणी हो और अपनी भाषा तथा संस्कृति के प्रति आत्मविश्वासी भी हो। आज जरूरत है कि राजभाषा की चर्चा फाइलों से निकलकर कार्यालयों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, उद्योगों, डिजिटल मंचों और जनजीवन तक पहुँचे। हिंदी को रोजगार और ज्ञान की भाषा बनाना होगा और भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर उसे विश्व संवाद का सशक्त माध्यम बनाना होगा। अंतत सवाल केवल यह नहीं है कि हिंदी का कितना प्रयोग हो रहा है, असली सवाल यह है कि हिंदी भारत की विकास-यात्रा में कितनी प्रभावी भूमिका निभा रही है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)।