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वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत की कूटनीतिक बढ़त

प्रकाशित: 16-03-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत की कूटनीतिक बढ़त
डॉ. विपिन कुमार
वैश्विक राजनीति के मौजूदा दौर में ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन किसी भी देश की ताकत को परिभाषित करते हैं। पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान से जुड़े घटपामों के बीच दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं। कई देशों में ऊर्जा संकट की आशंका व्यक्त की जा रही है, वहीं भारत के संदर्भ में भी विपक्ष की ओर से पेट्रोल और गैस की कमी को लेकर आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं। लेकिन वास्तविक स्थिति इससे अलग दिखाई देती है। भारत ने कूटनीतिक स्तर पर जो संतुलन और सािढयता दिखाई है, उसने ऊर्जा आपूर्ति को सुचारु बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरकार का कहना है कि भारत में पेट्रोल और गैस की आपूर्ति सामान्य है और आयात में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। युद्ध से पहले जिस प्रकार से तेल और गैस का आयात हो रहा था, लगभग उसी स्तर पर आज भी जारी है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत ने समय रहते ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को विविध बनाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत संबंध स्थापित किए। यही वजह है कि वैश्विक संकट के दौर में भी भारत की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था स्थिर बनी हुई है।
ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कूटनीतिक दक्षता का भी परिणाम होती है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम एशिया, यूरोप, अमेरिका और एशिया-प्रशांत के देशों के साथ अपने संबंधों को नई दिशा दी है। यही संतुलित कूटनीति आज उस समय काम आ रही है जब वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता बढ़ रही है।
भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा है कि उसने किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय बहुध्रुवीय संबंधों को मजबूत किया। यही कारण है कि भारत एक साथ अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों और एशियाई देशों के साथ सहयोग बनाए रखने में सफल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति से लेकर व्यापार और निवेश तक, कई क्षेत्रों में यह संतुलित दृष्टिकोण भारत के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ है।
इस संदर्भ में होरमुज़ जलडमरूमध्य का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। यह वह समुद्री मार्ग है जिसके जरिए दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस का परिवहन करता है। क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति के जहाजों की आवाजाही जारी रहना यह दर्शाता है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा भरोसेमंद वातावरण तैयार किया है जिसमें उसके हितों का सम्मान किया जाता है।
भारत की विदेश नीति की सफलता का एक और संकेत यह है कि पिछले कुछ महीनों में दुनिया के कई बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शीर्ष नेता भारत का दौरा कर चुके हैं। यह केवल औपचारिक यात्राएँ नहीं हैं, बल्कि इन दौरों के साथ व्यापार, निवेश, तकनीक और रणनीतिक सहयोग से जुड़े महत्वपूर्ण समझौते भी सामने आए हैं। कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट या व्यापारिक सहयोग के नए रास्ते खुल रहे हैं। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की संभावना है।
वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत यह भी है कि दुनिया के बड़े नेता भारत के साथ संबंधों को प्राथमिकता दे रहे हैं। अमेरिका से लेकर यूरोप और एशिया तक, कई देशों के साथ भारत की साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत को अब एक ऐसे देश के रूप में देखा जा रहा है जो न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालाँकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और संभावित खतरों की ओर ध्यान दिलाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन ऊर्जा संकट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर तथ्यों और वास्तविक स्थिति को समझना भी उतना ही जरूरी है। यदि देश में तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य है और सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि आयात में कोई बाधा नहीं है, तो इस स्थिति को संतुलित दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
ऊर्जा सुरक्षा का सवाल केवल वर्तमान से नहीं बल्कि भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल आयात पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। सरकार ने इस दिशा में नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने की पहल भी की है। यदि यह प्रयास सफल होते हैं तो आने वाले वर्षों में भारत ऊर्जा के क्षेत्र में और अधिक आत्मनिर्भर बन सकता है।
विदेश नीति के स्तर पर भी भारत की प्राथमिकता स्पष्ट दिखाई देती है। भारत एक ऐसे वैश्विक वातावरण का समर्थन करता है जिसमें सहयोग, व्यापार और स्थिरता को बढ़ावा मिले। यही कारण है कि भारत कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सािढय भूमिका निभा रहा है और वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में भी उभर रहा है। आज की दुनिया में कूटनीति केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं है। यह व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग तक फैली हुई है। भारत ने इन सभी क्षेत्रों में अपने संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि वैश्विक संकट के दौर में भी भारत अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में दिखाई देता है। आखिरकार यह कहा जा सकता है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति का असली परीक्षण भी हो रहा है। ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखना, अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संतुलित रखना और वैश्विक मंच पर सािढय भूमिका निभाना-ये सभी चुनौतियाँ किसी भी देश के लिए आसान नहीं होतीं। लेकिन अब तक के संकेत बताते हैं कि भारत ने इन चुनौतियों का सामना अपेक्षाकृत मजबूती से किया है।
भविष्य में भी भारत को इसी संतुलन और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ना होगा। वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच यदि भारत अपनी कूटनीतिक सािढयता और आर्थिक मजबूती को बनाए रखता है, तो वह न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगा बल्कि विश्व मंच पर अपनी भूमिका को और अधिक प्रभावशाली बना सकेगा।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)