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चुनावी बिगुल

प्रकाशित: 16-03-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
चुनावी बिगुल
केंद्रीय चुनाव आयोग चार राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु तथा केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी विधानसभाओं के चुनावों की रविवार को घोषणा कर दी। सभी 5 विधानसभाओं के 824 सीटों पर 9 अप्रैल से 29 अप्रैल तक मतदान होगा और सभी के परिणाम 4 मई को घोषित होंगे। इन विधानसभा चुनावों में असम और पुडुचेरी में भाजपा को अपनी सरकार बचाने की चुनौती है तो तृणमूल कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु डीएमके के लिए और केरल वाम मोर्चे के लिए सत्ता कायम रखने की चुनौती है। असम में कांग्रेस भाजपा को कड़ी चुनौती देने की तैयारी में है तो पश्चिम बंगाल में भाजपा से टीएमसी को कड़ी चुनौती मिलनी है। केरल में वाम मोर्चा एलडीएफ लगातार दस वर्षों से शासन में है जबकि इस राज्य की परम्परा रही है कि एक बार एलडीएफ तो दूसरी बार कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गठबंधन वाली यूडीएफ सत्ता में आती थी लेकिन 2021 में यह परम्परा टूटी और एलडीएफ दोबारा चुनाव जीत गई। 2026 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ के लिए केरल विधानसभा चुनाव जीतने की उम्मीद की जा सकती है किन्तु इसके लिए आवश्यक है कि कांग्रेस अपने परंपरागत वोटरों का विश्वास हासिल कर ले। कांग्रेस के परंपरागत वोटर ईसाई और मुस्लिम के बीच अब वह एकात्मकता नहीं रही जो पार्टी को जीतने के लिए जरूरी होती है। जिस राज्य में विधानसभा और लोकसभा के टिकट मस्जिदों और चर्चों में सुनिश्चित किए जाते हों, उन राज्यों में मजहबी संवेदनशीलता के आधार पर ही टिकट भी बंटते हैं। जो ईसाई कांग्रेस को ही वोट देते अब वे विवश होकर वाम मोर्चा यानि एलडीएफ और भाजपा को वोट देने लगे हैं। भाजपा के राज्य इकाई के पदाधिकारियों की ज्यादा संख्या ईसाई समुदाय की है। इसका स्पष्ट कारण है कि राज्य में ईसाई समाज मुस्लिम लीग की आाढामकता से भयभीत है।
रही बात तमिलनाडु की तो इस राज्य में भाजपा और कांग्रेस को उत्तर भारत की हिन्दी भाषी पार्टी माना जाता है और द्रविण पार्टियां भले ही इनसे समझौते कर लेती हैं किन्तु वे कदापि नहीं चाहतीं कि ये दोनों अपना जनाधार बढ़ा लें। ये दोनों द्रविण पार्टियां भाजपा और कांग्रेस पार्टियों से अलग समझौते अवसर के अनुमान के आधार पर करती हैं। इसलिए कभी कांग्रेस एआईडीएमके से गठबंधन करती थी किन्तु अब डीएमके से करती है और भाजपा डीएमके से समझौता करती थी किन्तु अब एआईडीएमके के साथ गठबंधन में हैं। इस राज्य में गठबंधन करने में कोई पार्टी किसी को अछूत नहीं मानती। द्रविण पार्टियों का हिन्दी के विरोध में एक जैसा ही दृष्टिकोण क्योंकि ये दोनों तमिल भाषा और तमिल संस्कृति के लिए हिन्दी को घातक मानती हैं। इस राज्य में डीएमके और एआईडीएमके में से जो भी जनता का भरोसा हासिल करेगा वही जीत पाएगा। रही बात पुडुचेरी की तो इस केंद्र शासित प्रदेश में उपराज्यपाल की शक्तियां अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की अपेक्षा कम जरूर हैं इसलिए विधानसभा चुनाव का महत्वपूर्ण राज्य के विधानसभा जैसा ही है। पुडुचेरी में कांग्रेस फिर भाजपा गठबंधन को चुनौती देगी। इसलिए यह सुनिश्चित कर पाना मुश्किल है कि चुनाव में कौन जीतेगा लेकिन इतना तो तय है कि पुडुचेरी भी देश के अन्य विधानसभा के वोटरों से भिन्न नहीं हैं। इसलिए सत्ता से बाहर होना या सत्ता को कायम रख पाना भाजपा और कांग्रेस के लिए एक जैसी ही चुनौती है।
असल में असम और पश्चिम बंगाल में भी चुनाव कम दिलचस्पी नहीं हैं किन्तु दोनों ही राज्यों में सत्ताधारी पार्टियां अपनी विरोधी पार्टियों से ज्यादा सािढय और सुगठित होने के कारण सत्ता परिवर्तन के कारकों को प्रभावहीन साबित कर रहे हैं। इसलिए माना जाता है कि इन दोनों राज्यों में सीटों की संख्या में तो बदलाव संभव है किन्तु सत्ता में बदलाव की आशंका तो कम ही है।
बहरहाल आज का वोटर पोंगापंथी नहीं है। वह जाति, धर्म, भाषा के आधार पर वोट करने से बचता दिख रहा है। राजनीतिक पार्टियां अपनी तरफ से कोशिश तो बहुत कर रही हैं किन्तु युवा वोटरों में अब पहले जैसी रूढ़िवादी प्रवृत्ति नहीं है। यही लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है किन्तु जिन पार्टियों ने इन संकीर्ण प्रवृत्तियों का फायदा उठाकर बार-बार सत्ता हासिल किया है वे इन जकड़नों को जिन्दा रखने की कोशिश करेंगी। किन्तु अभी तो सभी पार्टियां चुनावी उत्सव में व्यस्त हो जाएंगी और मतदाता अपनी पसंद की सरकारों का चुनाव करने में रुचि दिखाएंगी।