दूध में मिलावट का जहर और ईमानदार किसानों की विश्वसनीयता पर संकट
प्रकाशित: 16-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
भारत में दूध केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य का आधार माना जाता है। बच्चों की पहली खुराक से लेकर बुजुर्गों के पोषण तक दूध को पूर्ण आहार का दर्जा दिया गया है। यही कारण है कि भारतीय समाज में दूध को अमृत की संज्ञा दी जाती है। लेकिन आज यही अमृत मिलावटखोरों की लालच भरी मानसिकता के कारण संदेह और भय का विषय बनता जा रहा है। हाल के वर्षों में सामने आई घटनाओं और जांच रिपोर्टों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दूध में मिलावट का जाल देश के कई हिस्सों में फैल चुका है और इसका खामियाजा आम उपभोक्ता के साथ साथ ईमानदार किसानों को भी भुगतना पड़ रहा है। हाल ही में आंध्रप्रदेश के गोदावरी जिले में दूध पीने के बाद कई लोगों की मौत की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि उस गहरी समस्या का संकेत है जो वर्षों से धीरे धीरे बढ़ती जा रही है। दूध में मिलावट करने वाले लोग केवल पानी मिलाकर लाभ कमाने तक सीमित नहीं रहे बल्कि अब यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, हाइड्रोजन पेरोक्साइड और फॉर्मेलिन जैसे खतरनाक रसायनों का उपयोग भी करने लगे हैं। ये रसायन दूध को गाढ़ा और सफेद दिखाने के लिए डाले जाते हैं ताकि उपभोक्ता को असली दूध का भ्रम हो। लेकिन वास्तव में यह दूध नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए खतरनाक रसायनों का मिश्रण बन जाता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार देश में दूध के कई नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर पाए। विशेष रूप से उत्तर भारत के कई राज्यों में बड़ी संख्या में दूध के नमूने असुरक्षित पाए गए। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और यहां करोड़ों परिवारों की आजीविका इस पर निर्भर है। ऐसे में मिलावटखोरों की करतूतों ने न केवल लोगों की सेहत को खतरे में डाला है बल्कि ईमानदारी से दूध उत्पादन करने वाले किसानों की साख को भी नुकसान पहुंचाया है। यह समझना बहुत जरूरी है कि दूध में मिलावट करने वाले और दूध उत्पादन करने वाले किसान दो अलग अलग वर्ग हैं। किसान अपनी मेहनत और पशुपालन के माध्यम से दूध का उत्पादन करते हैं। वे अपने पशुओं की देखभाल करते हैं, चारा खिलाते हैं, दवाइयों का खर्च उठाते हैं और दिन रात मेहनत करके दूध बाजार तक पहुंचाते हैं। इसके विपरीत मिलावटखोर वे लोग हैं जो इस मेहनत से पैदा हुए दूध में रसायन मिलाकर अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं। इन लोगों का किसानों की मेहनत या उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं होता। उनका एकमात्र उद्देश्य जल्दी से जल्दी अधिक पैसा कमाना होता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि जब भी दूध में मिलावट की खबर सामने आती है तो आम लोगों के मन में सबसे पहले संदेह दूध उत्पादकों और छोटे पोताओं पर जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि अधिकतर किसान ईमानदारी से दूध का उत्पादन करते हैं और उनकी आय पूरी तरह इसी पर निर्भर होती है। देश में लगभग आठ से नौ करोड़ किसान किसी न किसी रूप में डेयरी व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। यदि दूध की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं तो इसका सबसे बड़ा नुकसान इन्हीं किसानों को होता है क्योंकि उपभोक्ताओं का भरोसा कमजोर हो जाता है। दूध में मिलावट के पीछे सबसे बड़ी वजह लालच और तेजी से धन कमाने की प्रवृत्ति है। पहले के समय में भी मिलावट के कुछ मामले सामने आते थे लेकिन उस दौर में समाज में ईमानदारी और संतोष की भावना अधिक थी। लोग जितना मिलता था उसी में संतुष्ट रहते थे और व्यवसाय में नैतिकता को महत्व देते थे। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आधुनिक उपभोक्तावाद और त्वरित सफलता की चाहत ने कई लोगों को गलत रास्तों की ओर धकेल दिया है। रातों रात अमीर बनने की मानसिकता ने कई लोगों को यह भूलने पर मजबूर कर दिया है कि उनके इस लालच की कीमत किसी की सेहत या जीवन से चुकाई जा सकती है। सरकार ने दूध में मिलावट रोकने के लिए कई कानूनी प्रावधान बनाए हैं। खाद्य सुरक्षा कानून के तहत मिलावटी दूध बनाने और बेचने वालों के लिए जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है। यदि मिलावटी दूध से किसी की मृत्यु हो जाए तो आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है। इसके बावजूद यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। इसका कारण यह है कि कानून का कठोर और निरंतर पालन उतनी प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा जितना होना चाहिए। दूध पोताओं के लिए लाइसेंस अनिवार्य करने जैसे कदम भी उठाए गए हैं लेकिन इस व्यवस्था के व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। भारत में दूध का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से आता है जहां छोटे किसान और स्थानीय पोता प्रमुख भूमिका निभाते हैं। यदि लाइसेंस प्रािढया अत्यधिक जटिल हो जाती है तो छोटे किसान इससे दूर हो सकते हैं और बाजार धीरे धीरे बड़ी कंपनियों के हाथों में सिमट सकता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार ऐसी नीति बनाए जो एक ओर मिलावटखोरों पर सख्ती करे और दूसरी ओर ईमानदार किसानों को संरक्षण दे। सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है मजबूत निगरानी प्रणाली की।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।