कम से कम अपनी कौम के तो सगे रहो शहबाज-मुनीर
प्रकाशित: 15-03-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
आदित्य नरेन्द्र
पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान जिस हालात से गुजर रहा है उसकी उसने शायद ही कभी कल्पना की होगी। सऊदी अरब के साथ उसने सितम्बर 2025 में एक रक्षा समझौता किया था। यह समझौता अब मार्च 2026 में सािढय हो गया है। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान को लग रहा था कि यह समझौता कर उसने भारत के खिलाफ मैदान मार लिया है। उसका सोचना था कि भविष्य में जब भी कभी भारत के साथ युद्ध होगा या युद्ध जैसे हालात बनेंगे तो सऊदी अरब के साथ-साथ संपूर्ण अरब जगत उसके पीछे लामबंद हो जाएगा। पाकिस्तान को यह भी लग रहा था कि इस रक्षा समझौते के जरिए उसे वित्तीय मदद भी सऊदी अरब से मिलती रहेगी जिसकी उसे हर समय जरूरत रहती है। उधर सऊदी अरब का अमेरिका पर से भरोसा धीरे-धीरे कम हो रहा था। उसे लग रहा था कि परमाणु शक्ति संपन्न इजरायल के खिलाफ उसका पाकिस्तान के साथ गठजोड़ उसकी स्थिति को मजबूत करेगा। पाकिस्तान के दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसके उलट अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया। यह पाकिस्तान के लिए विकट स्थिति है। ईरान उसका पड़ोसी होने के साथ-साथ शिया बहुल सबसे बड़ा अरब देश है। उसे नजरअंदाज करना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं है। पाकिस्तान के जन्म से लेकर हाल के समय तक चीन और अमेरिका उसकी सैन्य और आर्थिक मदद करते आ रहे हैं। अपनी रणनीतिक स्थिति के चलते पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका से भरपूर फायदा लिया और ज्यादातर इस मदद का उपयोग भारत के खिलाफ किया। जब उसे चीन और अमेरिका से मदद मिलनी कुछ कम हो गई तो शातिर पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के डर का फायदा उठाते हुए उसे अघोषित परमाणु छतरी के नीचे ले लिया। अमेरिका और इजरायल नहीं चाहते कि किसी मुस्लिम देश के पास परमाणु शक्ति हो या उसकी मिसाइलें उन तक पहुंचे। जब उसने पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनने से नहीं रोका था उस समय हालात अलग थे। दूर बैठा अमेरिका पाकिस्तान को अपने हिसाब से चलाता था। ईरान के साथ युद्ध के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान की तीन बड़ी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिनका संबंध मिसाइल प्रोग्राम से बताया जा रहा है। इसके साथ-साथ अमेरिका ने पेशावर में अपना वाणिज्य दूतावास भी स्थायी रूप से बंद कर दिया है। यही नहीं अमेरिका ने पाकिस्तान को उन 75 देशों की सूची में भी शामिल कर दिया है जहां अप्रवासी वीजा पर रोक लगाई गई है। इन प्रतिबंधों के कारण पाकिस्तान के मिसाइल प्रोग्राम और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है। ऐसे में पाकिस्तान से आए एक बयान ने उसे और मुश्किल में डाल दिया है। इस कथित बयान के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी जंग के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब के प्रति अपनी प्रतिबद्धता फिर से दोहराई है और कहा है कि पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद के लिए पूरी तरह तैयार है। इस पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को सऊदी अरब का खुलकर समर्थन करने के बयान को लेकर सावधान रहने को कहा है। उल्लेखनीय है कि दो देशों के बीच कोई समझौता तभी कारगर होता है जब दोनों देशों का उद्देश्य एक हो। पाकिस्तान और सऊदी अरब के मामले में ऐसा नहीं है। जो पाकिस्तान कभी भारत से मुकाबला करने के लिए मुस्लिम उम्मा के नाम पर मुस्लिम देशों से समर्थन मांगा करता था वही पाकिस्तान आज अपने हितों की पूर्ति के लिए ईरान को नजरंदाज करने के लिए तैयार है। पाकिस्तान की जनता चाहती है कि इस मुश्किल में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर कम से कम अपनी कौम के तो सगे रहें। ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है और पाकिस्तान की लगभग पंद्रह से बीस फीसदी आबादी शिया हैं। ऐसे में ईरान के खिलाफ जाना पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है। मुस्लिम उम्माह की भावना के साथ पाकिस्तान में जनता यदि सड़कों पर उतरी तो पाकिस्तान के हुक्मरानों के लिए मुश्किल रहेगी।
पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान जिस हालात से गुजर रहा है उसकी उसने शायद ही कभी कल्पना की होगी। सऊदी अरब के साथ उसने सितम्बर 2025 में एक रक्षा समझौता किया था। यह समझौता अब मार्च 2026 में सािढय हो गया है। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान को लग रहा था कि यह समझौता कर उसने भारत के खिलाफ मैदान मार लिया है। उसका सोचना था कि भविष्य में जब भी कभी भारत के साथ युद्ध होगा या युद्ध जैसे हालात बनेंगे तो सऊदी अरब के साथ-साथ संपूर्ण अरब जगत उसके पीछे लामबंद हो जाएगा। पाकिस्तान को यह भी लग रहा था कि इस रक्षा समझौते के जरिए उसे वित्तीय मदद भी सऊदी अरब से मिलती रहेगी जिसकी उसे हर समय जरूरत रहती है। उधर सऊदी अरब का अमेरिका पर से भरोसा धीरे-धीरे कम हो रहा था। उसे लग रहा था कि परमाणु शक्ति संपन्न इजरायल के खिलाफ उसका पाकिस्तान के साथ गठजोड़ उसकी स्थिति को मजबूत करेगा। पाकिस्तान के दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसके उलट अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया। यह पाकिस्तान के लिए विकट स्थिति है। ईरान उसका पड़ोसी होने के साथ-साथ शिया बहुल सबसे बड़ा अरब देश है। उसे नजरअंदाज करना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं है। पाकिस्तान के जन्म से लेकर हाल के समय तक चीन और अमेरिका उसकी सैन्य और आर्थिक मदद करते आ रहे हैं। अपनी रणनीतिक स्थिति के चलते पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका से भरपूर फायदा लिया और ज्यादातर इस मदद का उपयोग भारत के खिलाफ किया। जब उसे चीन और अमेरिका से मदद मिलनी कुछ कम हो गई तो शातिर पाकिस्तान ने ईरान के खिलाफ सऊदी अरब के डर का फायदा उठाते हुए उसे अघोषित परमाणु छतरी के नीचे ले लिया। अमेरिका और इजरायल नहीं चाहते कि किसी मुस्लिम देश के पास परमाणु शक्ति हो या उसकी मिसाइलें उन तक पहुंचे। जब उसने पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनने से नहीं रोका था उस समय हालात अलग थे। दूर बैठा अमेरिका पाकिस्तान को अपने हिसाब से चलाता था। ईरान के साथ युद्ध के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान की तीन बड़ी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिनका संबंध मिसाइल प्रोग्राम से बताया जा रहा है। इसके साथ-साथ अमेरिका ने पेशावर में अपना वाणिज्य दूतावास भी स्थायी रूप से बंद कर दिया है। यही नहीं अमेरिका ने पाकिस्तान को उन 75 देशों की सूची में भी शामिल कर दिया है जहां अप्रवासी वीजा पर रोक लगाई गई है। इन प्रतिबंधों के कारण पाकिस्तान के मिसाइल प्रोग्राम और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है। ऐसे में पाकिस्तान से आए एक बयान ने उसे और मुश्किल में डाल दिया है। इस कथित बयान के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी जंग के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब के प्रति अपनी प्रतिबद्धता फिर से दोहराई है और कहा है कि पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद के लिए पूरी तरह तैयार है। इस पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को सऊदी अरब का खुलकर समर्थन करने के बयान को लेकर सावधान रहने को कहा है। उल्लेखनीय है कि दो देशों के बीच कोई समझौता तभी कारगर होता है जब दोनों देशों का उद्देश्य एक हो। पाकिस्तान और सऊदी अरब के मामले में ऐसा नहीं है। जो पाकिस्तान कभी भारत से मुकाबला करने के लिए मुस्लिम उम्मा के नाम पर मुस्लिम देशों से समर्थन मांगा करता था वही पाकिस्तान आज अपने हितों की पूर्ति के लिए ईरान को नजरंदाज करने के लिए तैयार है। पाकिस्तान की जनता चाहती है कि इस मुश्किल में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर कम से कम अपनी कौम के तो सगे रहें। ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है और पाकिस्तान की लगभग पंद्रह से बीस फीसदी आबादी शिया हैं। ऐसे में ईरान के खिलाफ जाना पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह भी हो सकता है। मुस्लिम उम्माह की भावना के साथ पाकिस्तान में जनता यदि सड़कों पर उतरी तो पाकिस्तान के हुक्मरानों के लिए मुश्किल रहेगी।