निवेश आकर्षित करने के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान बनाने की जरूरत : लाहिड़ी
प्रकाशित: 07-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली, (भाषा)। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने बृहस्पतिवार को कहा कि देश में और निवेश आकर्षित करने के लिए उद्योग स्थापित करने को लेकर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाने की जरूरत है। लाहिड़ी ने प्रतिष्"ित आर्थिक शोध संस्थान नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के इंडिया पॉलिसी फोरम 2026 को संबोधित करते हुए कहा कि देश में कारोबार सुगमता बढ़ाने के लिए काफी काम हुआ है, लेकिन विशेष रूप से जमीनी स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
उन्होंने कहा, भारत में निवेश को प्रभावित करने वाले कारक मुख्य रूप से संरचनात्मक हैं। उत्पादन कारक (भूमि, श्रम और पूंजी) विशेषकर भूमि और पूंजी से जुड़ी मौजूद खामियां निवेश में बड़ी बाधा हैं। लाहिड़ी ने कहा, केवल औद्योगिक परियोजनाएं ही नहीं, बल्कि सरकार से जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भी भूमि अधिग्रहण कई बाधाओं से घिरा हुआ है, जिनमें कानूनी चुनौतियां भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी बचत (पूंजी) ने भारत की मदद जरूर की है, लेकिन इसका स्तर चीन और सिंगापुर जैसे देशों की तुलना में काफी कम रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी देश में निवेश का प्रमुख स्रोत घरेलू बचत होती है। लाहिड़ी ने कहा, घरेलू बचत की कमी निवेश और वृद्धि की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है। कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए काफी काम हुआ है, लेकिन विशेषकर जमीनी स्तर पर अभी और सुधार की जरूरत है।
निवेश को बढ़ावा देने वाले कारकों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि एनसीएईआर के अध्ययन के अनुसार, 1980 से पहले सार्वजनिक निवेश के कारण निजी निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ता था, लेकिन उसके बाद सार्वजनिक निवेश निजी निवेश का पूरक बन गया है और अब उसे बढ़ावा दे रहा है। लाहिड़ी ने कहा, इसका अर्थ है कि अच्छी तरह लक्षित बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च निजी निवेश को बाधित करने के बजाय उसे बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
जाने-माने अर्थशास्त्राr ने कहा कि घरेलू हो या विदेशी, निवेश वहीं आएगा जहां लाभ कमाने की संभावना होगी।
उन्होंने कहा, इसीलिए भारत को सफल कारोबार करने और लाभ अर्जित करने के लिए दुनिया का सबसे आकर्षक स्थान बनाने की जरूरत है। ऐसा करके हम विकसित भारत-2047 की यात्रा में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं।
लाहिड़ी ने कहा कि भारत ने 1990 के दशक में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए अपने दरवाजे खोले थे। इसके बाद 2002-05 के दौरान वार्षिक एफडीआई प्रवाह औसतन तीन से सात अरब डॉलर था, वहीं 2008 में यह बढ़कर 43 अरब डॉलर और 2019 में 50 अरब डॉलर को पार कर गया।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2025-26 में सकल एफडीआई 95 अरब डॉलर रहा, जो मजबूत वृद्धि संभावनाओं के कारण उत्साहजनक है। हालांकि, लाभ को अपने देश भेजना और विदेशों में भारतीय निवेश बढ़ने से शुद्ध एफडीआई प्रवाह अपेक्षाकृत हल्का रहा।
उन्होंने कहा, भारत में निवेश को प्रभावित करने वाले कारक मुख्य रूप से संरचनात्मक हैं। उत्पादन कारक (भूमि, श्रम और पूंजी) विशेषकर भूमि और पूंजी से जुड़ी मौजूद खामियां निवेश में बड़ी बाधा हैं। लाहिड़ी ने कहा, केवल औद्योगिक परियोजनाएं ही नहीं, बल्कि सरकार से जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भी भूमि अधिग्रहण कई बाधाओं से घिरा हुआ है, जिनमें कानूनी चुनौतियां भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी बचत (पूंजी) ने भारत की मदद जरूर की है, लेकिन इसका स्तर चीन और सिंगापुर जैसे देशों की तुलना में काफी कम रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी देश में निवेश का प्रमुख स्रोत घरेलू बचत होती है। लाहिड़ी ने कहा, घरेलू बचत की कमी निवेश और वृद्धि की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है। कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए काफी काम हुआ है, लेकिन विशेषकर जमीनी स्तर पर अभी और सुधार की जरूरत है।
निवेश को बढ़ावा देने वाले कारकों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि एनसीएईआर के अध्ययन के अनुसार, 1980 से पहले सार्वजनिक निवेश के कारण निजी निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ता था, लेकिन उसके बाद सार्वजनिक निवेश निजी निवेश का पूरक बन गया है और अब उसे बढ़ावा दे रहा है। लाहिड़ी ने कहा, इसका अर्थ है कि अच्छी तरह लक्षित बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च निजी निवेश को बाधित करने के बजाय उसे बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।
जाने-माने अर्थशास्त्राr ने कहा कि घरेलू हो या विदेशी, निवेश वहीं आएगा जहां लाभ कमाने की संभावना होगी।
उन्होंने कहा, इसीलिए भारत को सफल कारोबार करने और लाभ अर्जित करने के लिए दुनिया का सबसे आकर्षक स्थान बनाने की जरूरत है। ऐसा करके हम विकसित भारत-2047 की यात्रा में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं।
लाहिड़ी ने कहा कि भारत ने 1990 के दशक में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए अपने दरवाजे खोले थे। इसके बाद 2002-05 के दौरान वार्षिक एफडीआई प्रवाह औसतन तीन से सात अरब डॉलर था, वहीं 2008 में यह बढ़कर 43 अरब डॉलर और 2019 में 50 अरब डॉलर को पार कर गया।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2025-26 में सकल एफडीआई 95 अरब डॉलर रहा, जो मजबूत वृद्धि संभावनाओं के कारण उत्साहजनक है। हालांकि, लाभ को अपने देश भेजना और विदेशों में भारतीय निवेश बढ़ने से शुद्ध एफडीआई प्रवाह अपेक्षाकृत हल्का रहा।