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दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत

प्रकाशित: 26-08-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत
भारत में पिछले कुछ सप्ताह से चीनी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। त्योहारों का मौसम आने वाला है और चीनी की कीमतें 15 प्रतिशत से 16 प्रतिशत तक बढ़ गई। आजकल चीनी की कीमत 55 रु. से 60 रु. तक प्रति किग्रा पहुंच गई हैं। सरकार और आर्थिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि चीनी का कम उत्पादन और देश के कुछ हिस्सों में जहां चीनी का उत्पादन ज्यादा होता है जैसे महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में बरसात कम होने तथा जमाखोरी है। वास्तविकता यह है कि चीनी अब आयात हो रही है और सरकार जो जवाब दे रही है वे आंशिक रूप से ही सही है।
दरअसल सरकार आंकड़ों पर आंख मूंदकर चलती है और सरकार की इसी कमजोरी का फायदा चीनी उद्योगों ने उठाया। भारत में चीनी की कुल खपत 28 मिलियन टन है और गत वर्ष भी चीनी का उत्पादन 28 मिलियन टन ही हुआ था। इसके पहले यानि 2023-24 में भी उत्पाद 28 मिलियन टन ही हुआ था जिस कारण सरकार ने चीनी निर्यात पर रोक लगा दी। लगातार दो वर्षें तक निर्यात पर रोक से चीनी उद्योग के सामने संकट खड़ा हो गया। चीनी उद्योग के लोगों ने कृषि मंत्रालय के अधिकारियों को समझाया कि इस वर्ष तो गन्ने की उपज बम्पर हुई है और चीनी का उत्पादन भी 34 मिलियन टन तक हो सकता है। कृषि और वाणिज्य मंत्रालय के जो अधिकारी सरकार की तरफ से महंगाई के लिए जवाब दे रहे हैं, उन्होंने ही सरकार को समझा दिया कि हमारे पास तो पहले से ही 6 मिलियन टन बफर स्टाक है फिर 34 मिलियन टन का उत्पादन होगा। कुल चीनी तो 40 मिलियन टन हो जाएगी फिर जब खपत 28 मिलियन टन की है तो शेष 12 मिलियन टन का भण्डार कहां करेंगे। चीनी उद्योग ने कृषि मंत्रालय के अधिकारियों को जो कुछ समझा, वही सब कुछ अधिकारियों ने सरकार को समझाया। इसके बाद सरकार ने लगभग दो वर्षें से बंद चीनी निर्यात को मंजूरी दे दी। परिणाम यह हुआ कि मार्च 2026 आते-आते सारी पोल पट्टी खुल गई। कारण कि चीनी का उत्पादन इस वर्ष भी 28 मिलियन टन ही हुआ था और उसमें से भी लगभग तीन मिलियन टन चीनी एथनॉल के लिए खर्च कर दी गई। बची 25 मिलियन टन सरकार ने मंजूरी देकर 12 मिलियन टन का निर्यात करवा दिया जिसके बाद बचा 13 मिलियन टन। अब सरकार यदि अपने 6 मिलियन टन को भी बाजार में उतार देती है तो कुल 18 मिलियन टन ही होते हैं। बाकी 10 मिलियन टन की कमी कहां से पूरी होगी। इसीलिए विवश होकर सरकार ने चीनी आयात का विकल्प चुना और तत्काल 30 सितम्बर तक चीनी निर्यात पर रोक लगा दी। जब चीनी आयात होगी यानि विदेशी मुद्रा खर्च होगी तो चीनी की कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक है।
बहरहाल अब सरकार के पास बहुत ज्यादा विकल्प तो हैं नहीं किन्तु यदि सरकार में इच्छाशक्ति हो तो स्थिति ज्यादा बिगड़ने से बचा जा सकता है। इसके लिए सरकार को 30 सितम्बर तक लगे चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध की सीमा अगले 6 महीने यानि मार्च 31 तक बढ़ा देना चाहिए। अभी तो सरकार द्वारा जमाखोरी से बचने के लिए सख्त स्टाक सीमा का नियम लागू करते हुए स्टाक समय सीमा घटाकर 15 दिन कर दी गई है। इस नियम को 30 नवम्बर के बाद भी जारी रखना होगा। अभी तो सरकार ने चीनी मिलों को निर्देश दिया है कि वे चीनी उत्पादन को 7 दिनों से ज्यादा अपने गोदामों में रख नहीं सकती। उन्हें 7 दिनों के अंदर स्टाक बाजार में भेजना होगा। सरकार को इस त्वरित डिस्पैच नियम को जारी रखना होगा। साथ ही गन्ने के रस और सीड़ों से बनने वाले एथेनॉल की प्रक्रिया पर तत्काल कटौती करना होगी। एथेनॉल बनाने के लिए चावल और मक्के का इस्तेमाल ज्यादा किया जाना चाहिए ताकि चीनी उत्पादन पर प्रतिकूल असर न पड़े। आयात के अलावा सरकार द्वारा अपनाए गए उपायों के बावजूद चीनी की महंगाई पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसीलिए इस बात का डर है कि जब दुनिया के उपभोक्ता बाजार को भारत सरकार, कृषि मंत्रालय के अधिकारियों, मुनाफाखोर चीनी उद्योगपतियों की हकीकत का पता चलेगा तो कितनी फजीहत होगी भारत की।