नेपाल की त्रासदी
प्रकाशित: 28-08-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
तिब्बत से अचानक बुधवार को नेपाल में आई बाढ़ में मरने वालों की संख्या बृहस्पतिवार को 359 हो गई जबकि इस त्रासदी में 288 भारतीय पर्यटक लापता हैं जबकि राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक कुल 826 लोग लापता हैं जिनमें से 590 तो मात्र पर्यटक हैं।
दरअसल नेपाल में आई बाढ़ के लिए जिम्मेदार कारणों पर भारत और अमेरिका के खगोल वैज्ञानिकों में मतभेद है। भारत के भूवैज्ञानिकों इने इस आपदा के लिए भूकम्प को जिम्मेदार बताया है तो अमेरिकी भूवैज्ञानिकों ने ग्लेशियर और भूस्खलन को। हैदराबाद स्थित इसरो की शाखा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र यानि एनआरएससी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि नेपाल में भूकम्प आने से यह भयंकर बाढ़ आई है लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानि यूएजीएस का कहना है कि नेपाल में भूकम्प नहीं आया था। उनका कहना है कि वास्तव में धरती की प्लेटों के टूटने की हलचल नहीं थी बल्कि भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानों और मलबे के तेजी से गिरने के कारण उपजे कंपन को मशीन ने भूकंप समझ लिया। असल में कारण कोई भी हो चाहे भूकंप हो या बर्फ स्खलन अथवा भूस्खलन किन्तु सच तो यही है कि हिमस्खलन के कारण भोटे कोशी की सहायक नदी ल्हेदे के बहाव में रुकावट पैदा होने के बाद यह बाढ़ आई और सबसे पहले चीन की सीमा के पास रसुआगढ़ी स्थित तिमुरे क्षेत्र में ब़ाढ़ का कहर टूटा। इसके बाद कई कई फुट ऊंचे मलबे और पानी का तेज बहाव नीचे की ओर बढ़ा और कई जिलों में तबाही मच गई। नेपाल पर्यटन बोर्ड ने पूरी जानकारी जुटाकर बृहस्पतिवार को यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, इटली, कोरिया सहित 30 से अधिक देशों के पर्यटक लापता हैं।
बहरहाल सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि लापता लोगों की तलाश की जाए और राहत सामग्री को पीड़ितों में समुचित रूप से वितरित किया जाए। भारत आवश्यक दवाइयों एवं खाने-पीने की वस्तुओं को दो बार भेज चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ग्लेशियर टूटने और भूस्खलन के लिए जिम्मेदार कौन लोग हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने पर ही इस तरह की भयंकर तबाही आती है। नेपाल में भी प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के स्थान पर विकास योजनाओं को प्राथमिकताएं दी जा रही हैं। घने जंगलों को काटकर वीरान करने का सिलसिला चल रहा है तो पहाड़ों से पत्थर की चट्टानों को निकालकर पर्वतों से भूस्खलन की घटनाओं को आसान बनाया जा रहा है। नेपाल के लिए जरूरी है कि वह विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन कायम करे अन्यथा इस तरह की त्रासदी झेलने के लिए तैयार रहें।
दरअसल नेपाल में आई बाढ़ के लिए जिम्मेदार कारणों पर भारत और अमेरिका के खगोल वैज्ञानिकों में मतभेद है। भारत के भूवैज्ञानिकों इने इस आपदा के लिए भूकम्प को जिम्मेदार बताया है तो अमेरिकी भूवैज्ञानिकों ने ग्लेशियर और भूस्खलन को। हैदराबाद स्थित इसरो की शाखा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र यानि एनआरएससी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि नेपाल में भूकम्प आने से यह भयंकर बाढ़ आई है लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानि यूएजीएस का कहना है कि नेपाल में भूकम्प नहीं आया था। उनका कहना है कि वास्तव में धरती की प्लेटों के टूटने की हलचल नहीं थी बल्कि भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानों और मलबे के तेजी से गिरने के कारण उपजे कंपन को मशीन ने भूकंप समझ लिया। असल में कारण कोई भी हो चाहे भूकंप हो या बर्फ स्खलन अथवा भूस्खलन किन्तु सच तो यही है कि हिमस्खलन के कारण भोटे कोशी की सहायक नदी ल्हेदे के बहाव में रुकावट पैदा होने के बाद यह बाढ़ आई और सबसे पहले चीन की सीमा के पास रसुआगढ़ी स्थित तिमुरे क्षेत्र में ब़ाढ़ का कहर टूटा। इसके बाद कई कई फुट ऊंचे मलबे और पानी का तेज बहाव नीचे की ओर बढ़ा और कई जिलों में तबाही मच गई। नेपाल पर्यटन बोर्ड ने पूरी जानकारी जुटाकर बृहस्पतिवार को यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, इटली, कोरिया सहित 30 से अधिक देशों के पर्यटक लापता हैं।
बहरहाल सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि लापता लोगों की तलाश की जाए और राहत सामग्री को पीड़ितों में समुचित रूप से वितरित किया जाए। भारत आवश्यक दवाइयों एवं खाने-पीने की वस्तुओं को दो बार भेज चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ग्लेशियर टूटने और भूस्खलन के लिए जिम्मेदार कौन लोग हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने पर ही इस तरह की भयंकर तबाही आती है। नेपाल में भी प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के स्थान पर विकास योजनाओं को प्राथमिकताएं दी जा रही हैं। घने जंगलों को काटकर वीरान करने का सिलसिला चल रहा है तो पहाड़ों से पत्थर की चट्टानों को निकालकर पर्वतों से भूस्खलन की घटनाओं को आसान बनाया जा रहा है। नेपाल के लिए जरूरी है कि वह विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन कायम करे अन्यथा इस तरह की त्रासदी झेलने के लिए तैयार रहें।