जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा हो रहा है स्वाहा
प्रकाशित: 01-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
20 जुलाई से शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र लगता है बिना किसी सार्थक बहस और जनहित के मुद्दों पर चर्चा के बिना हंगामे की भेंट चढ़ने जा रहा है। हंगामे के बीच ही एंटी पेपर लीक बिल पारित हो चुका है। शिक्षा मंत्री का इस्त़ीफा भी हो चुका है और अब गृह मंत्री के इस्तीफे को लेकर संसद की कार्यवाही बाधित हो रही है। जनता के खून पसीने की कमाई हंगामे पर सवाहा हो रही है।
बताया जा रहा है सदन चलाने में डेढ़ करोड़ रुपये प्रति घंटा खर्च होता है। एक-एक मिनट का ढाई लाख रुपया खर्च होता है। एक दिन में 9 करोड़ खर्च होता है।
संसद के मौजूदा सत्र के दौरान विपक्ष और सरकार के बीच गतिरोध चरम पर पहुंच गया है। ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है। हंगामे की राजनीति नई नहीं है। संसद के सदनों में दशकों से यह समस्या रही है। पिछले कई सालों की संसद की कार्यवाही पर नज़र डालें तो देखेंगे हर सत्र शुरू होते ही विपक्ष अपने कुछ मुद्दों पर कार्यवाही रोककर सबसे पहले चर्चा करने पर अड़ जाता है और अध्यक्ष या सभापति संसद को नियमानुसार चलाने पर जोर देते है। यहीं से पक्ष और विपक्ष में आरोप प्रत्यारोप शुरू हो जाते है और संसद ठप्प हो जाती है। स्पीकर कहते है सदन आपका है, सबका है और देश भी चाहता है कि संसद चले।
स्पीकर विपक्षी सदस्यों से अपनी सीट पर जाने का आग्रह करते हुए कहते है कि हर विषय, हर मुद्दे पर नियम-प्रािढयाओं के तहत चर्चा करने का पर्याप्त अवसर दूंगा मगर स्पीकर की अपील का विपक्षी सदस्यों पर कोई असर नहीं होता और संसद बिना कोई विधि सम्मत कार्यवाही के हंगामे की भेंट चढ़ जाती है।
पिछले कुछ दशकों के दौरान शायद ही संसद का कोई सत्र ऐसा रहा हो, जिसका आधे से ज्यादा समय हंगामे में ज़ाया न हुआ हो। संसद में बार-बार ऐसे हालात क्यों पैदा हो रहे हैं। जनता जानना चाहती है कि सदन के अहम सत्र हंगामे की भेंट क्यों चढ़ जाते हैं। भारतीय राजनीति में विपक्ष का अर्थ, जो सत्ता में नहीं है,से है। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ विपक्ष का कार्य सरकार की सकारात्मक तरीके से आलोचना करना होना चाहिए। स्वस्थ विपक्ष के रूप में विपक्ष को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सरकार की आलोचना व बहस करना चाहिए।
1967 से पूर्व देश में सत्ता और विपक्ष में आलोचना के बावजूद आपसी सम्बन्ध बहुत मधुर थे। उस दौरान सत्ता पक्ष बहुत मजबूत था और विपक्ष बिखरे हुए। इसके बाद भी विपक्ष बहुत प्रभावी था।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।
बताया जा रहा है सदन चलाने में डेढ़ करोड़ रुपये प्रति घंटा खर्च होता है। एक-एक मिनट का ढाई लाख रुपया खर्च होता है। एक दिन में 9 करोड़ खर्च होता है।
संसद के मौजूदा सत्र के दौरान विपक्ष और सरकार के बीच गतिरोध चरम पर पहुंच गया है। ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है। हंगामे की राजनीति नई नहीं है। संसद के सदनों में दशकों से यह समस्या रही है। पिछले कई सालों की संसद की कार्यवाही पर नज़र डालें तो देखेंगे हर सत्र शुरू होते ही विपक्ष अपने कुछ मुद्दों पर कार्यवाही रोककर सबसे पहले चर्चा करने पर अड़ जाता है और अध्यक्ष या सभापति संसद को नियमानुसार चलाने पर जोर देते है। यहीं से पक्ष और विपक्ष में आरोप प्रत्यारोप शुरू हो जाते है और संसद ठप्प हो जाती है। स्पीकर कहते है सदन आपका है, सबका है और देश भी चाहता है कि संसद चले।
स्पीकर विपक्षी सदस्यों से अपनी सीट पर जाने का आग्रह करते हुए कहते है कि हर विषय, हर मुद्दे पर नियम-प्रािढयाओं के तहत चर्चा करने का पर्याप्त अवसर दूंगा मगर स्पीकर की अपील का विपक्षी सदस्यों पर कोई असर नहीं होता और संसद बिना कोई विधि सम्मत कार्यवाही के हंगामे की भेंट चढ़ जाती है।
पिछले कुछ दशकों के दौरान शायद ही संसद का कोई सत्र ऐसा रहा हो, जिसका आधे से ज्यादा समय हंगामे में ज़ाया न हुआ हो। संसद में बार-बार ऐसे हालात क्यों पैदा हो रहे हैं। जनता जानना चाहती है कि सदन के अहम सत्र हंगामे की भेंट क्यों चढ़ जाते हैं। भारतीय राजनीति में विपक्ष का अर्थ, जो सत्ता में नहीं है,से है। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ विपक्ष का कार्य सरकार की सकारात्मक तरीके से आलोचना करना होना चाहिए। स्वस्थ विपक्ष के रूप में विपक्ष को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सरकार की आलोचना व बहस करना चाहिए।
1967 से पूर्व देश में सत्ता और विपक्ष में आलोचना के बावजूद आपसी सम्बन्ध बहुत मधुर थे। उस दौरान सत्ता पक्ष बहुत मजबूत था और विपक्ष बिखरे हुए। इसके बाद भी विपक्ष बहुत प्रभावी था।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।