राजधानी में महिला अत्याचार की घटनाएं शर्मनाक
प्रकाशित: 24-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में नाबालिग लड़की के साथ हुई कथित दरिंदगी की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है, बल्कि शहरों में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए सार्वजनिक तंत्र की गंभीर कमियों को भी सामने लाती है। घटना सोमवार रात की है। पुलिस ने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करने और उसके दो साथियों को पकड़े जाने की जानकारी दी है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि आस्था कुंज पार्क के कुछ हिस्सों में सीसीटीवी की व्यवस्था नहीं है और स्थानीय लोगों के अनुसार शाम ढलने के बाद लोग पार्क में आने से बचते हैं। यदि जांच में ये तथ्य पुष्ट होते हैं, तो यह केवल अपराधियों की जवाबदेही का विषय नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक स्थान की सुरक्षा-व्यवस्था की भी समीक्षा आवश्यक होगी। ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चे की पहचान की गोपनीयता, संवेदनशील तरीके से बयान दर्ज करना, चिकित्सकीय एवं मनोवैज्ञानिक सहायता तथा जांच की निष्पक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अपराधी के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ पीड़ित बच्चे और उसके परिवार को आवश्यक संरक्षण एवं सहायता मिलना भी न्याय की प्रािढया का हिस्सा है। इस घटना से दिल्ली के सभी बड़े पार्कों और सुनसान सार्वजनिक स्थलों का सुरक्षा ऑडिट कराने की आवश्यकता सामने आती है। पार्कों में पर्याप्त रोशनी विशेष महत्व रखती है। झाड़ियां, बंद पड़े रास्ते, दीवारों के पीछे के हिस्से और ऐसे कोने जहां से लोगों की आवाजाही दिखाई नहीं देती, अपराध के लिए जोखिम वाले क्षेत्र बन सकते हैं। इसलिए नगर एजेंसियों को नियमित सुरक्षा निरीक्षण कर ऐसे स्थानों को चिन्हित करके वहां प्रकाश, खुला दृश्य क्षेत्र और आवश्यकतानुसार बैरिकेडिंग या नियंत्रित प्रवेश की व्यवस्था करनी चाहिए। सुरक्षा का एक और महत्वपूर्ण पहलू मानव उपस्थिति है। यदि किसी बड़े पार्क में शाम के बाद भी नागरिक आते हैं तो वहां निर्धारित समय के अनुसार पुलिस गश्त और प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की उपस्थिति होनी चाहिए। स्थानीय पुलिस, नगर निकाय, पार्क प्रबंधन और विकास प्राधिकरण के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। किसी घटना के बाद एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने के बजाय पहले से यह तय होना चाहिए कि किस क्षेत्र की सुरक्षा किस संस्था की जिम्मेदारी है। अपराध की रोकथाम के लिए तकनीक के साथ नागरिक भागीदारी भी आवश्यक है। प्रमुख प्रवेश द्वारों पर स्पष्ट सूचना-पट्ट, आपातकालीन फोन नंबर, सहायता केंद्र और जरूरत पड़ने पर तत्काल पुलिस को सूचना देने की व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों और किशोरों को भी यह जानकारी दी जानी चाहिए कि किसी संदिग्ध परिस्थिति में वे किससे सहायता मांग सकते हैं। आपात स्थिति में 112 जैसी आपातकालीन सेवा का उपयोग करने की जानकारी व्यापक रूप से उपलब्ध कराई जा सकती है। इसके साथ ही अभिभावकों को भी बच्चों की सुरक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसी अपराध का बोझ पीड़ित बच्चे या उसके परिवार पर डाल दिया जाए। अपराध की जिम्मेदारी अपराधी की होती है। किसी लड़की या बच्चे का अकेले बाहर निकलना, मित्र के साथ जाना या किसी सार्वजनिक स्थान पर जाना अपराध का कारण नहीं हो सकता। समाज को ऐसी सोच से बचना होगा जिसमें अपराध के बाद पीड़ित के व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को केवल पुलिस का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।