विश्व हॉकी में टीमों का प्रदर्शन चिंता का विषय
प्रकाशित: 27-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
विश्व हॉकी कप में भारतीय पुरुष और महिला टीमों का निराशाजनक प्रदर्शन चिंता का विषय है दोनों टीमों का सेमीफाइनल में न पहुंचना यह दर्शाता है कि कहीं ना कहीं इंडिया हॉकी प्रबंधन में बड़ी कमी है। भारत के पूर्व गोलकीपर श्रीजेश एवं अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी प्रगट सिंह ने भी इस बात पर गहरी चिंता जाहिर की है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी कमियां हैं, जिनके कारण भारतीय पुरुष और महिला टीमें विश्व कप जैसे बड़े मंच पर निर्णायक मुकाबलों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इसका एक प्रमुख कारण अंतरराष्ट्रीय हॉकी में बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, बेल्जियम, जर्मनी, अर्जेंटीना और अन्य देशों ने फिटनेस, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, डेटा विश्लेषण, रणनीति और जमीनी स्तर की प्रतिभा को विकसित करने पर लगातार निवेश किया है। बड़े टूर्नामेंटों में केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं होती; दबाव में सही निर्णय लेना, शुरुआती बढ़त को बनाए रखना, पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलना भी जरूरी है। महिला हॉकी की स्थिति विशेष रूप से गंभीर चिंता का विषय है। भारतीय महिला टीम ने पिछले वर्षों में शानदार उपलब्धियां हासिल करके देश में उम्मीद जगाई थी। ओलंपिक में उल्लेखनीय प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बेहतर परिणामों ने महिला हॉकी को नई पहचान दी थी। ऐसे में विश्व कप में अपेक्षाकृत निराशाजनक प्रदर्शन केवल एक टूर्नामेंट की असफलता नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह समीक्षा का अवसर है कि प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय मैच, उच्च स्तरीय प्रतियोगिता और मजबूत खेल विज्ञान की सुविधाएं किस स्तर तक मिल रही हैं। पुरुष हॉकी में भी यही सवाल उठता है। भारत ने टोक्यो ओलंपिक में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीतकर उम्मीद जगाई थी कि देश एक बार फिर विश्व हॉकी की शीर्ष शक्तियों में स्थायी स्थान बना सकता है। विश्व कप जैसे टूर्नामेंट में लगातार शीर्ष चार में जगह बनाने के लिए मजबूत घरेलू ढांचा, लगातार उच्च स्तरीय मुकाबले और लंबी अवधि की स्पष्ट योजना आवश्यक है।
इस निराशाजनक प्रदर्शन ने भारतीयों को इसलिए भी कष्ट पहुंचाया है क्योंकि हॉकी केवल एक खेल नहीं रही है। यह भारत की खेल विरासत का हिस्सा है। जब भारतीय हॉकी टीम मैदान पर उतरती है तो उसके साथ ध्यानचंद और उन महान खिलाड़ियों की स्मृतियां भी जुड़ी होती हैं, जिन्होंने कभी विश्व हॉकी पर भारत का दबदबा कायम किया था। इसलिए किसी बड़े टूर्नामेंट में असफलता का दर्द सामान्य खेल हार से कहीं अधिक महसूस होता है। हालांकि खिलाड़ियों को शर्मिंदा करने के बजाय इस असफलता को व्यवस्था, तैयारी और रणनीति की गंभीर समीक्षा का आधार बनाया जाना चाहिए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
इस निराशाजनक प्रदर्शन ने भारतीयों को इसलिए भी कष्ट पहुंचाया है क्योंकि हॉकी केवल एक खेल नहीं रही है। यह भारत की खेल विरासत का हिस्सा है। जब भारतीय हॉकी टीम मैदान पर उतरती है तो उसके साथ ध्यानचंद और उन महान खिलाड़ियों की स्मृतियां भी जुड़ी होती हैं, जिन्होंने कभी विश्व हॉकी पर भारत का दबदबा कायम किया था। इसलिए किसी बड़े टूर्नामेंट में असफलता का दर्द सामान्य खेल हार से कहीं अधिक महसूस होता है। हालांकि खिलाड़ियों को शर्मिंदा करने के बजाय इस असफलता को व्यवस्था, तैयारी और रणनीति की गंभीर समीक्षा का आधार बनाया जाना चाहिए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।