सामाजिक एवं धार्मिक विषमता दुर्भाग्यपूर्ण
प्रकाशित: 25-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
लखनऊ के काकोरी क्षेत्र में मंदिर के जीर्णोद्धार समारोह के दौरान पूजा-अर्चना को लेकर भाजपा की दलित विधायक जय देवी कौशल द्वारा लगाए गए आरोपों ने जातिगत भेदभाव और धार्मिक स्थलों पर सामाजिक समानता के सवाल को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विधायक का आरोप है कि मंदिर के जीर्णोद्धार कार्पाम मे उन्हें धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने का अवसर नहीं दिया गया। विधायक ने इस व्यवहार को जातिगत भेदभाव से जोड़ते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं। घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वो क्षेत्र की निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और दलित समुदाय से आती हैं एवं सत्ता पक्ष से है।यदि किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण पूजा में शामिल होने से रोका गया हो, तो मामला केवल मंदिर की पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता हैक दिया गया, तो यह गंभीर सामाजिक भेदभाव की श्रेणी में आता है। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री असीम अरुण विधायक महोदय के साथ मंदिर पहुंचकर पूजा अर्चना की है। भारत के संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया है और जाति के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ सार्वजनिक जीवन में भेदभाव को स्वीकार नहीं किया है।
संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन कूरता है। इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष कानूनी प्रावधान भी मौजूद हैं। इसलिए यदि किसी मंदिर या सार्वजनिक धार्मिक स्थल पर किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाति के कारण प्रवेश, पूजा या धार्मिक गतिविधि में भाग लेने से रोका जाता है, तो यह केवल सामाजिक अपमान का विषय नहीं रह जाता, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार कानूनी प्रश्न भी बन सकता है। जातिगत भेदभाव की घटना को किस तरह देखा जाए, इसका आधार भी स्पष्ट होना चाहिए। पहली कसौटी यह होगी कि क्या व्यक्ति के साथ अलग व्यवहार उसकी जाति के कारण किया गया था। दूसरी कसौटी यह होगी कि क्या समान स्थिति में मौजूद अन्य लोगों को वह सुविधा या अधिकार दिया गया था जो संबंधित व्यक्ति को नहीं दिया गया। तीसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या किसी आयोजक, पुजारी या अन्य व्यक्ति ने जाति से संबंधित कोई टिप्पणी, रोक या निर्देश दिया था। यदि ऐसी बात सामने आती है और उसके प्रमाण उपलब्ध होते हैं, तो आरोप की गंभीरता काफी बढ़ जाती है। इस मामले में विधायक के पति और पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की प्रतिािढया भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि मंदिर के जीर्णोद्धार में उनकी भूमिका रही है और इसके बावजूद उनकी पत्नी के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाना आपत्तिजनक है। यह घटना इसलिए भी विशेष ध्यान आकर्षित कर रही है क्योंकि जातिगत भेदभाव का आरोप किसी विपक्षी दल के नेता की ओर से नहीं बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा की ही एक दलित विधायक द्वारा लगाया गया है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को भी किसी धार्मिक आयोजन में जातिगत कारणों से अलग व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तो सामान्य दलित नागरिकों की स्थिति क्या हो सकती है। हालांकि इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले घटना के स्वतंत्र तथ्यों की पुष्टि आवश्यक है। सार्वजनिक धार्मिक स्थलों पर सामाजिक बराबरी का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।
संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन कूरता है। इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष कानूनी प्रावधान भी मौजूद हैं। इसलिए यदि किसी मंदिर या सार्वजनिक धार्मिक स्थल पर किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाति के कारण प्रवेश, पूजा या धार्मिक गतिविधि में भाग लेने से रोका जाता है, तो यह केवल सामाजिक अपमान का विषय नहीं रह जाता, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार कानूनी प्रश्न भी बन सकता है। जातिगत भेदभाव की घटना को किस तरह देखा जाए, इसका आधार भी स्पष्ट होना चाहिए। पहली कसौटी यह होगी कि क्या व्यक्ति के साथ अलग व्यवहार उसकी जाति के कारण किया गया था। दूसरी कसौटी यह होगी कि क्या समान स्थिति में मौजूद अन्य लोगों को वह सुविधा या अधिकार दिया गया था जो संबंधित व्यक्ति को नहीं दिया गया। तीसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या किसी आयोजक, पुजारी या अन्य व्यक्ति ने जाति से संबंधित कोई टिप्पणी, रोक या निर्देश दिया था। यदि ऐसी बात सामने आती है और उसके प्रमाण उपलब्ध होते हैं, तो आरोप की गंभीरता काफी बढ़ जाती है। इस मामले में विधायक के पति और पूर्व केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की प्रतिािढया भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि मंदिर के जीर्णोद्धार में उनकी भूमिका रही है और इसके बावजूद उनकी पत्नी के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाना आपत्तिजनक है। यह घटना इसलिए भी विशेष ध्यान आकर्षित कर रही है क्योंकि जातिगत भेदभाव का आरोप किसी विपक्षी दल के नेता की ओर से नहीं बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा की ही एक दलित विधायक द्वारा लगाया गया है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को भी किसी धार्मिक आयोजन में जातिगत कारणों से अलग व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तो सामान्य दलित नागरिकों की स्थिति क्या हो सकती है। हालांकि इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले घटना के स्वतंत्र तथ्यों की पुष्टि आवश्यक है। सार्वजनिक धार्मिक स्थलों पर सामाजिक बराबरी का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।