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ग्लासगो का गोल्ड मां का सबसे बड़ा आभूषण : दिलीप

प्रकाशित: 10-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नवीन शर्मा
नई दिल्ली। दिव्यांग एथलीट दिलीप महादू गावित ने ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में 100 मीटर की टी-47 रेस में नए रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता। जिस बच्चे का हाथ एक हादसे में जिंदगी ने छीन लिया उसने हिम्मत का साथ कभी नहीं छोड़ा। दिलीप अब 18 सितंबर से जापान के आईची नागोया में होने वाले एशियाई खेलों के पैरा वर्ग में भारत को एक नहीं ब्लकि दो स्वर्ण पदक दिलाने की तैयारी कर रहे हैं।
महाराष्ट्र में नासिक के किसान परिवार में जन्मे दिलीप कहते हैं जब ग्लासगो में गोल्ड जीता और मां को लाकर दिया तो बहुत खुश हुईं । उन्हें मेडल के बारे में ज्यादा पता नहीं था , मैंने बताया कि बात गोल्ड की नहीं बल्कि देश के लिए अपनी स्पर्धा में सबसे बड़ा मेडल जीतने की है तो उन्होंने कहा कि यह तो सबसे बड़ा आभूषण है जो मेरा हीरा जीत कर लाया है । यह कहते- कहते खुशी से रो पड़ी । मैंने वादा किया है ऐसे गोल्ड और लाने में कोई कोर कसर नहीं रखूंगा। गावित वैसे टी-47 की 400 मीटर रेस के विशेषज्ञ हैं लेकिन ग्लास्गो में 100 मीटर की रेस में दौड़े और बारिश के बीच फिसलन भरे ट्रैक पर 10.71 सेकंड में रेस पूरी कर राष्ट्रमंडल खेलों का नया रिकॉर्ड बना दिया। अब वह पैरा एशियाई खेलों की 100 मीटर और 400 मीटर दोनों रेस में उतरेंगे। उन्हें दोहरी स्वर्णिम सफलता की उम्मीद है। महज 5 साल की उम्र में वह पेड़ से गिर गए थे और पांमण फैलने के कारण डॉक्टरों को दायां हाथ कुहनी से नीचे काटना पड़ा। दिलीप को स्कूली दिनों में कोच बैजनाथ काले ने देखा तो मां-बाप से बात करके उनके गांव तोरण डोंगरी से नासिक ले आए और न केवल ट्रेनिंग दी बल्कि खर्च भी उठाया। गावित कहते हैं मैंने गुरु पूर्णिमा पर मेडल जीता तो सबसे पहले कोच साहब को फोन करके कहा , सर यह गुरु दक्षिणा है। वह अपनी सफलता का श्रेय कोच बैजनाथ काले को ही देते हैं।
एशियाई खेलों की रवानगी से पहले भारतीय पैरालंपिक समिति और एसबीआई लाइफ ने एक अभिनंदन समारोह में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले सात भारतीय पैरा एथलीटों को सम्मानित किया जिसमें गावित के अलावा शर्मिला धनखड , सोमन राणा, मोहम्मद बासिल, शुभम जुयाल, शिल्पा शायला और झंडू कुमार शामिल हैं। उनके प्रशिक्षकों का भी अभिनंदन किया गया।