दूसरों को मौत देने वाला यासीन मलिक मांग रहा है मौत की भीख
प्रकाशित: 06-09-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
कहते हैं कि इंसान को उसके कर्में का फल इसी जन्म में भोगना पड़ता है। तिहाड़ जेल में बंद जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक पर यह कहावत सौ फीसदी खरी उतरती है। कभी दूसरों को मौत देने वाला यासीन मलिक आज खुद मौत की भीख मांग रहा है। इसे ईश्वरीय न्याय नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। राज्य जांच एजेंसी द्वारा 29 जून को कश्मीरी महिला पंडित सरला भट्ट हत्याकांड में जो आरोप पत्र दाखिल किया गया है उसमें यासीन मलिक को आरोपी बनाया गया है। मलिक ने श्रीनगर की एडिशनल सेशंस जज की अदालत में 25 पेज का हलफनामा दाखिल करते हुए इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इससे पूर्व 60 वषीय यासीन मलिक को दिल्ली की विशेष एनआईए अदालत ने टेरर फंडिंग मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मलिक पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा से जुड़े कई गंभीर आरोप हैं। अपने हलफनामे में मलिक ने यह मुकदमा लड़ने से इंकार करते हुए खुद के लिए मौत की सजा मांगी है। उसने मुकदमे की कार्रवाई का विरोध नहीं करने के निर्णय को अपने विवेक से लिया गया फैसला बताया है। मलिक ने कहा कि अपने निजी हालात को देखते हुए मैंने यह मुकदमा न लड़ने का फैसला किया है। मेरे फैसले को अभियोजन के किसी तथ्य या मेरे खिलाफ लगाए गए अपराधों को स्वीकार करना नहीं माना जाए। उसने इस मुकदमे पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह मुकदमा घटना के तीन दशक बाद बनाया गया है। सरला भट्ट की हत्या के समय वह गंभीर रूप से घायल था। हलफनामे में मलिक ने अपनी पत्नी मुशाल हुसैन से निकाह तोड़ने की बात भी कही। उसने अपनी लंबी कैद और आठ साल से परिवार से संपर्क न कर पाने को इसका कारण बताया। उसने कहा कि उसे फोन करने या वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा नहीं मिली। उसने अपनी बेटी से दादी के करीब रहने की अपील की ताकि मुश्किल दौर में उसकी मां को उसकी बेटी का साथ मिलता रहे। यासीन मलिक का जन्म 3 अप्रैल 1966 को श्रीनगर के घनी आबादी वाले इलाके मैसुमा में हुआ था। उसने श्रीनगर के केएसपी कालेज से ग्रेजुएशन की। मलिक ने 2009 में पाकिस्तानी कलाकार मुशाल हुसैन से निकाह किया और मार्च 2012 में एक लड़की रजिया सुल्ताना का पिता बना। यासीन मलिक शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में वेस्टइंडीज के साथ 1983 के क्रिकेट मैच को बाधित करने के प्रयास में शामिल था। उसे इसके लिए चार महीने तक हिरासत में रखा गया। रिहा होने के बाद उसने अपनी ताला पाटी का नाम बदलकर इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग कर दिया। इसमें मलिक महासचिव था। 1987 में मलिक की पाटी विधानसभा चुनावो के लिए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट में शामिल हो गई लेकिन उसने संविधान पर अविश्वास जताते हुए चुनाव नहीं लड़ा परंतु एमयूएफ के लिए प्रचार किया। चुनाव के बाद मलिक ने पीओके के आतंकवादी शिविरों में प्रशिक्षण लिया और जेकेएलएफ के एक प्रमुख सदस्य के रूप में कश्मीर घाटी लौटा। मार्च 2020 में यासीन मलिक और उसके छह सहयोगियों पर 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के रावलपोरा में भारतीय वायुसेना के 40 कर्मियों पर हमले के लिए टाडा के तहत आरोप लगाए गए थे। इस हमले में वायुसेना के चार जवानों की मौत हो गई थी। इसके अलावा यासीन मलिक रूबैया सईद के अपहरण और उसके बाद पांच आतंकियों को छोड़ने की घटना में भी आरोपी है। जाहिर है कि ऐसे में पाकिस्तान यासीन मलिक के समर्थन का मौका नहीं छोड़ेगा। पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि मलिक के खिलाफ कार्यवाही न्याय की बुनियादी जरूरतों के खिलाफ है। यासीन पर मुकदमा और सजा पूरी तरह से राजनीतिक कारणों से प्रेरित थी। पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि भारतीय अदालतें पाकिस्तान की तरह पक्षपाती नहीं हैं। अपने कर्में के चलते ही मलिक जेल में सड़ रहा है। मलिक जानता है कि उसके ऊपर जो आरोप हैं उनके चलते उसका इस जन्म में जेल से बाहर आना मुश्किल है। ऐसे में वह जो सहानुभूति लेकर जेल से बाहर आने का प्रयास कर रहा है उसका कोई फायदा होगा ऐसा लगता नहीं है।
कहते हैं कि इंसान को उसके कर्में का फल इसी जन्म में भोगना पड़ता है। तिहाड़ जेल में बंद जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक पर यह कहावत सौ फीसदी खरी उतरती है। कभी दूसरों को मौत देने वाला यासीन मलिक आज खुद मौत की भीख मांग रहा है। इसे ईश्वरीय न्याय नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। राज्य जांच एजेंसी द्वारा 29 जून को कश्मीरी महिला पंडित सरला भट्ट हत्याकांड में जो आरोप पत्र दाखिल किया गया है उसमें यासीन मलिक को आरोपी बनाया गया है। मलिक ने श्रीनगर की एडिशनल सेशंस जज की अदालत में 25 पेज का हलफनामा दाखिल करते हुए इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है। इससे पूर्व 60 वषीय यासीन मलिक को दिल्ली की विशेष एनआईए अदालत ने टेरर फंडिंग मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मलिक पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा से जुड़े कई गंभीर आरोप हैं। अपने हलफनामे में मलिक ने यह मुकदमा लड़ने से इंकार करते हुए खुद के लिए मौत की सजा मांगी है। उसने मुकदमे की कार्रवाई का विरोध नहीं करने के निर्णय को अपने विवेक से लिया गया फैसला बताया है। मलिक ने कहा कि अपने निजी हालात को देखते हुए मैंने यह मुकदमा न लड़ने का फैसला किया है। मेरे फैसले को अभियोजन के किसी तथ्य या मेरे खिलाफ लगाए गए अपराधों को स्वीकार करना नहीं माना जाए। उसने इस मुकदमे पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह मुकदमा घटना के तीन दशक बाद बनाया गया है। सरला भट्ट की हत्या के समय वह गंभीर रूप से घायल था। हलफनामे में मलिक ने अपनी पत्नी मुशाल हुसैन से निकाह तोड़ने की बात भी कही। उसने अपनी लंबी कैद और आठ साल से परिवार से संपर्क न कर पाने को इसका कारण बताया। उसने कहा कि उसे फोन करने या वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा नहीं मिली। उसने अपनी बेटी से दादी के करीब रहने की अपील की ताकि मुश्किल दौर में उसकी मां को उसकी बेटी का साथ मिलता रहे। यासीन मलिक का जन्म 3 अप्रैल 1966 को श्रीनगर के घनी आबादी वाले इलाके मैसुमा में हुआ था। उसने श्रीनगर के केएसपी कालेज से ग्रेजुएशन की। मलिक ने 2009 में पाकिस्तानी कलाकार मुशाल हुसैन से निकाह किया और मार्च 2012 में एक लड़की रजिया सुल्ताना का पिता बना। यासीन मलिक शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में वेस्टइंडीज के साथ 1983 के क्रिकेट मैच को बाधित करने के प्रयास में शामिल था। उसे इसके लिए चार महीने तक हिरासत में रखा गया। रिहा होने के बाद उसने अपनी ताला पाटी का नाम बदलकर इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग कर दिया। इसमें मलिक महासचिव था। 1987 में मलिक की पाटी विधानसभा चुनावो के लिए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट में शामिल हो गई लेकिन उसने संविधान पर अविश्वास जताते हुए चुनाव नहीं लड़ा परंतु एमयूएफ के लिए प्रचार किया। चुनाव के बाद मलिक ने पीओके के आतंकवादी शिविरों में प्रशिक्षण लिया और जेकेएलएफ के एक प्रमुख सदस्य के रूप में कश्मीर घाटी लौटा। मार्च 2020 में यासीन मलिक और उसके छह सहयोगियों पर 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के रावलपोरा में भारतीय वायुसेना के 40 कर्मियों पर हमले के लिए टाडा के तहत आरोप लगाए गए थे। इस हमले में वायुसेना के चार जवानों की मौत हो गई थी। इसके अलावा यासीन मलिक रूबैया सईद के अपहरण और उसके बाद पांच आतंकियों को छोड़ने की घटना में भी आरोपी है। जाहिर है कि ऐसे में पाकिस्तान यासीन मलिक के समर्थन का मौका नहीं छोड़ेगा। पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि मलिक के खिलाफ कार्यवाही न्याय की बुनियादी जरूरतों के खिलाफ है। यासीन पर मुकदमा और सजा पूरी तरह से राजनीतिक कारणों से प्रेरित थी। पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि भारतीय अदालतें पाकिस्तान की तरह पक्षपाती नहीं हैं। अपने कर्में के चलते ही मलिक जेल में सड़ रहा है। मलिक जानता है कि उसके ऊपर जो आरोप हैं उनके चलते उसका इस जन्म में जेल से बाहर आना मुश्किल है। ऐसे में वह जो सहानुभूति लेकर जेल से बाहर आने का प्रयास कर रहा है उसका कोई फायदा होगा ऐसा लगता नहीं है।