पाकिस्तान हताश: गिलगित-बाल्टिस्तान पर कब्जा स्वीकार
प्रकाशित: 20-07-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
पाकिस्तान की हताशा अब चरम पर पहुंच गई है। गिलगित-बाल्टिस्तान (जीबी) को जम्मू-कश्मीर राज्य से अलग कर विशेष दर्जा देने की कवायद में पाकिस्तान ने अनजाने में ही अपने अवैध कब्जे की सच्चाई स्वीकार कर ली है। दशकों से बिना किसी संधि या कानूनी आधार के बलपूर्वक कब्जा बनाए रखने की बात अब सामने आ रही है। इस बीच गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों ने पाकिस्तानी शासन को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के भविष्यवाणी वाले शब्द साकार होते नजर आ रहे हैं कि पीओके भारत में अपनी मर्जी से शामिल होगा।
पाकिस्तान ने हाल ही में गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव कराए और सत्ता साझेदारी के जरिए पीपीपी-पीएमएल-एन गठबंधन बनाया। लेकिन यह कदम स्थानीय लोगों की नाराजगी को बढ़ा रहा है। क्षेत्र में विशेष प्रांतीय दर्जे की मांग के नाम पर पाकिस्तान की कोशिश जीबी को जम्मू-कश्मीर विवाद से अलग दिखाने की है। इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान ने 1947 से बिना किसी औपचारिक संधि के इस क्षेत्र पर कब्जा बनाए रखा था। संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के अनुसार पाकिस्तान को जीबी और पीओके से हटना चाहिए था, लेकिन उसने बल का सहारा लिया।
गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासी अब खुलकर विरोध कर रहे हैं। चुनावों के दौरान रिगिंग के आरोप, सड़क ब्लॉकेज और पाकिस्तानी दलों के बहिष्कार की अपीलें आम हैं। लोग विकास, अधिकार और स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तानी शासन उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा है। हाल के विरोध प्रदर्शनों में स्थानीय नेता और युवा पाकिस्तानी कब्जे के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह राजनाथ सिंह के उस बयान की पुष्टि करता है जिसमें उन्होंने कहा था कि पीओके के लोग अपनी मर्जी से भारत में शामिल होंगे। उन्होंने जोर दिया कि जम्मू-कश्मीर में विकास और शांति देखकर पीओके के लोग भारत की मुख्यधारा में लौटना चाहेंगे।
भारत का रुख स्पष्ट है। अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व विकास हुआ है। इसकी तुलना में पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में गरीबी, दमन और अस्थिरता बढ़ी है। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तानी शोषण से त्रस्त हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, सीमित राजनीतिक अधिकार और बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके गुस्से की वजह है।
राष्ट्रवादी स्वर में स्थानीय लोग कह रहे हैं कि वे भारत के साथ जुड़ना चाहते हैं। पाकिस्तान की हताशा भरी कोशिशें इस तथ्य को छिपा नहीं सकतीं कि पीओके और जीबी के लोग पाकिस्तानी कब्जे से मुक्ति चाहते हैं। भारत सदैव इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग मानता रहा है। राजनाथ सिंह ने सही कहा कि बल प्रयोग की जरूरत नहीं, लोगों की इच्छा ही निर्णायक होगी।
यह घटपाम पाकिस्तान की कमजोर स्थिति को उजागर करता है। आर्थिक संकट, आंतरिक कलह और भारत के मजबूत रुख के सामने उसकी चालें फेल हो रही हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों का विद्रोह पीओके में भी प्रेरणा बन रहा है। भारत सरकार इन आवाजों का सम्मान करती है और क्षेत्र की अखंडता के लिए प्रतिबद्ध है।
-आदित्य नरेन्द्र
पाकिस्तान ने हाल ही में गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव कराए और सत्ता साझेदारी के जरिए पीपीपी-पीएमएल-एन गठबंधन बनाया। लेकिन यह कदम स्थानीय लोगों की नाराजगी को बढ़ा रहा है। क्षेत्र में विशेष प्रांतीय दर्जे की मांग के नाम पर पाकिस्तान की कोशिश जीबी को जम्मू-कश्मीर विवाद से अलग दिखाने की है। इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान ने 1947 से बिना किसी औपचारिक संधि के इस क्षेत्र पर कब्जा बनाए रखा था। संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के अनुसार पाकिस्तान को जीबी और पीओके से हटना चाहिए था, लेकिन उसने बल का सहारा लिया।
गिलगित-बाल्टिस्तान के निवासी अब खुलकर विरोध कर रहे हैं। चुनावों के दौरान रिगिंग के आरोप, सड़क ब्लॉकेज और पाकिस्तानी दलों के बहिष्कार की अपीलें आम हैं। लोग विकास, अधिकार और स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तानी शासन उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा है। हाल के विरोध प्रदर्शनों में स्थानीय नेता और युवा पाकिस्तानी कब्जे के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह राजनाथ सिंह के उस बयान की पुष्टि करता है जिसमें उन्होंने कहा था कि पीओके के लोग अपनी मर्जी से भारत में शामिल होंगे। उन्होंने जोर दिया कि जम्मू-कश्मीर में विकास और शांति देखकर पीओके के लोग भारत की मुख्यधारा में लौटना चाहेंगे।
भारत का रुख स्पष्ट है। अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व विकास हुआ है। इसकी तुलना में पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रों में गरीबी, दमन और अस्थिरता बढ़ी है। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तानी शोषण से त्रस्त हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, सीमित राजनीतिक अधिकार और बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके गुस्से की वजह है।
राष्ट्रवादी स्वर में स्थानीय लोग कह रहे हैं कि वे भारत के साथ जुड़ना चाहते हैं। पाकिस्तान की हताशा भरी कोशिशें इस तथ्य को छिपा नहीं सकतीं कि पीओके और जीबी के लोग पाकिस्तानी कब्जे से मुक्ति चाहते हैं। भारत सदैव इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग मानता रहा है। राजनाथ सिंह ने सही कहा कि बल प्रयोग की जरूरत नहीं, लोगों की इच्छा ही निर्णायक होगी।
यह घटपाम पाकिस्तान की कमजोर स्थिति को उजागर करता है। आर्थिक संकट, आंतरिक कलह और भारत के मजबूत रुख के सामने उसकी चालें फेल हो रही हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों का विद्रोह पीओके में भी प्रेरणा बन रहा है। भारत सरकार इन आवाजों का सम्मान करती है और क्षेत्र की अखंडता के लिए प्रतिबद्ध है।
-आदित्य नरेन्द्र