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प्रदर्शनकारियों में अपराधी-पुलिस के लिए नया ‘सिर दर्द'

प्रकाशित: 02-08-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
प्रदर्शनकारियों में अपराधी-पुलिस के लिए नया ‘सिर दर्द'
आदित्य नरेन्द्र
पिछले दिनों जंतर-मंतर पर काक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के दौरान जो कुछ भी सामने आया उससे लग रहा है कि यदि इस चलन ने जोर पकड़ा तो भविष्य में यह पुलिस के लिए नया “सिर दर्द'' साबित हो सकता है। हालांकि दिल्ली पुलिस ने तकनीक के बेहतर इस्तेमाल से इसका फायदा उठाने वालों के मंसूबों पर पानी फेर दिया है। जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था और नीट पेपर लीक के मुद्दे पर प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों ने महसूस किया कि इस प्रदर्शन में छात्र और आम नागरिकों की आड़ में कुछ अपराधी भी शामिल हो सकते हैं जो मौका मिलते ही हालात बिग़ाडने का प्रयास कर सकते हैं। उन्होंने फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (एफआरएस) और अन्य तकनीकों का सहारा लिया। पुलिस अधिकारी उस समय हैरान रह गए जब उन्हें पता चला कि प्रदर्शन में शामिल 2873 ऐसे लोगों को पहचाना गया जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। इनमें हत्या के 101, हत्या के प्रयास के 62, लूट और डकैती 284, दुष्कर्म के 61, पॉस्को एक्ट के 6, महिलाओं के खिलाफ अपराध के 25, आर्म्स एक्ट के 229, झपटमारी के 135, अपहरण के 19 और एनडीपीएस एक्ट के 67 आरोपी शामिल है।
इस आंकड़े को देखकर पहला सवाल तो यही उठता है कि यह लोग न तो छात्र थे और न ही उनके परिजन या समर्थक। फिर यह लोग वहां क्या करने गए थे। क्या इनका मकसद प्रदर्शन की आड़ में कानून-व्यवस्था को चुनौती देना था। उल्लेखनीय है कि सीजेपी ने 20 जुलाई को संसद चलो मार्च निकाला था। इस दौरान जमकर बवाल हुआ था। इस दौरान झड़पों में 118 से अधिक पुलिसकर्मियों और करीब 60 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की जानकारी मिली थी। स्थिति उस समय गंभीर हो गई थी जब प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह ने संसद के आस-पास के उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में घुसने से रोकने के लिए लगाए गए पुलिस बैरिकेडिंग को तोड़ने की कोशिश की थी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि संसद के दरवाजे भी बंद कर दिए गए थे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि इतनी बड़ी संख्या में अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग एक छात्र आंदोलन का हिस्सा कैसे और क्यूं बने। क्या यह सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर चूक थी या फिर शंतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भड़काने की सुनियोजित साजिश थी। इस सवाल के जवाब से ही यह तय होना चाहिए कि जंतर-मंतर जैसी घनी आबादी वाली जगह पर क्या ऐसे प्रदर्शनों की अनुमति दी जाए जो बड़ा आकार लेकर सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं। भारतीय संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और प्रदर्शन करने का आधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के दायरे में ही इसका प्रयोग किया जा सकता है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा, सरकारी संपति को नुकसान या पुलिसकर्मियों पर हमला होता है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। प्रदर्शन को शांतिपूर्ण रखने की जिम्मेदारी आयोजकों पर डाली जानी चाहिए। यदि ऐसा हागा तो आयोजक हिंसा की आशंका होने पर समय रहते अपना आंदोलन स्थगित करने या वापस लेने पर विचार करने को मजबूर होंगे।
फिलहाल तो दिल्ली पुलिस ने तकनीक का इस्तेमाल करके एक ऐसे अवांछित प्रयोग पर हमला करने का प्रयास किया है जो यदि सफल हो जाता तो कितना नुकसानदेह होता इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। जब इस मामले में जांच आगे बढ़ेगी तो कई नए तथ्य भी सामने आ सकते हैं। देखना होगा कि प्रदर्शनकारी और आयोजकों का गठजोड़ पुलिस के लिए नया सिर दर्द बनता है या पुलिस तकनीक का सहारा लेकर इस गठजोड़ पर लगाम लगाने में कामयाब होती है।