वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

उपाय समझाना परामर्श नहीं - श्रीकृष्ण

प्रकाशित: 04-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
शिव शंकर द्विवेदी
अर्जुन के इस विनम्र अनुरोध पर कि श्रीकृष्ण उन्हें वह परामर्श दें जो उनके लिए श्रेयस्कर हो, श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में उन्हें जीवन की प्रक्रिया का बोध कराते हुए उपदेश एवं परामर्श दिया। अन्त में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उन्होंने उन्हें गूढ़ से गूढतर ज्ञान दे दिया है। अत विमर्श पूर्वक निर्णय लेकर वह जो उचित समझें उसे करें, तब अर्जुन श्रीकृष्ण को आश्वस्त करते हैं कि वह वही करेंगे जो श्रीकृष्ण का अभिमत है। इतना कहकर अर्जुन युद्ध के मैदान में उतरते हैं और श्रीकृष्ण उनके सारथी के रूप में उनके साथ होते हैं।
श्रीकृष्ण का वचन और अर्जुन का आश्वासन - यहां यह उल्लेखनीय है कि श्रीकृष्ण ने तो अर्जुन को बहुत कुछ समझाया था यथा - ब्राह्मी स्थिति में पहुंचने की साधना, मोक्ष की साधना तथा भगवत् दर्शन की साधना और उसकी फलश्रुतियां आदि। ऐसे में जब अर्जुन यह कहते हुए युद्ध के मैदान में उतरते हैं कि वह श्रीकृष्ण के वचनों का पालन करेंगे और श्रीकृष्ण उनके साथ सारथी के रूप में चले तो प्रश्न उठता है कि
1-क्या यही समझना उपयुक्त होगा कि युद्ध अर्थात् नियत कर्म करना ही श्रीकृष्ण के वचनों का पालन करना है?
2-क्या मोक्ष साधना, स्थितप्रज्ञ साधना या भगवत् दर्शन आदि के लिए की जाने वाली साधनाओं का कोई मूल्य अर्जुन एवं श्रीकृष्ण की दृष्टि में नहीं रहा है?
3-यदि उक्त साधनाओं का कोई मूल्य नहीं रहा है तो श्रीकृष्ण ने उन्हें करने के लिए विधिवत उपाय क्यों समझाया है?
4-क्या इन उपायों को श्रीकृष्ण के वचन या परामर्श के रूप में नहीं समझा जा सकता है?
श्रीमद्भगवद्गीता पर आम जनमानस - उक्त प्रश्न इस लिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि सामान्यत: लोगों का यह कहना है कि यदि श्रीकृष्ण की ऐसी मंशा रही होती कि लोग मोक्ष या भगवत् दर्शन की साधनाएं न करें तो वह इनके लिए समुचित उपाय क्यों समझाते और इन साधनाओं की फलश्रुतियां क्यों समझाते?
इन लोगों का समझना है कि श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में मोक्ष की साधना और भगवत् दर्शन की साधना के उपाय बताया है। इन उपायों की फलश्रुतियां भी समझाया है ऐसे में इसका मतलब यह है कि श्रीकृष्ण का परामर्श है कि लोग मोक्ष की साधना करें या भगवत् दर्शन की साधना करें। उक्त सभी प्रश्नों और इन प्रश्नों के सम्बन्ध में उक्त प्रस्तर में उल्लिखित बातों पर असहमति व्यक्त करते हुए जब मैं अर्जुन का उदाहरण देता हूं कि मोक्ष, भगवत् दर्शन आदि के लिए साधनाएं श्रीकृष्ण का उद्देश्य होता वह अर्जुन के साथ नियत कर्म करने के लिए युद्ध के मैदान में क्यों उतरे? तब लोग बिना विलम्ब किए बोल बैठते हैं कि नियत कर्म करने के लिए युद्ध के मैदान में उतना अर्जुन की समझ थी। अत एव अर्जुन की ही समझ को श्रीकृष्ण की समझ के रूप में समझना श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों की अवहेलना होगी। इनका समझना है कि यह अर्जुन की समझ थी कि युद्ध करना अर्थात् नियत कर्म करना श्रीकृष्ण का परामर्श है किन्तु यदि कोई मोक्ष साधना करे या भगवत् दर्शन की साधना करें तो समझा जाना चाहिए कि वह भी श्रीमद्भगवद्गीता में निहित विचारों का ही अनुसरण कर रहा है।
श्रीमद्भगवद्गीता पर मेरा निष्कर्ष - श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ने के उपरान्त मैं अर्जुन से भिन्न विचारों के साथ जो लोग हैं उनसे भिन्न विचार रखते हुए आश्वस्त हूं कि अर्जुन ने ही श्रीकृष्ण के विचारों को समुचित ढंग से समझा है अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों के प्रति अर्जुन की ही समझ उचित है। इसका कारण यह है कि श्रीकृष्ण का परामर्श नियत कर्म की ओर लोगों को उन्मुख करने के सम्बन्ध में है।
श्रीकृष्ण और लोगों से उनकी अपेक्षा - प्रश्न है कि क्या श्रीकृष्ण लोगों से मोक्ष या भगवत् दर्शन के साधना की अपेक्षा रखते हैं?
मेरी समझ है कि श्रीकृष्ण की किसी से अपेक्षा नहीं है कि कोई मोक्ष प्राप्ति या भगवत् दर्शन के लिए साधनाएं करे। मैं उक्त निष्कर्ष इस आधार पर ही नहीं निकाल रहा हूं कि अर्जुन युद्ध के मैदान में उतरे तो श्रीकृष्ण उनके सारथी के रूप उनके साथ थे अपितु मेरा ध्यान श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 38 पर गया है जिसमें निम्न चार बातें कही गई हैं-
1-दुःखों से दूर रहने के प्रयास से दूर रहो
2-सुखों से जुड़ने के प्रयास से दूर
3-सुख दुःख के प्रति समभाव रखना ही पर्याप्त नहीं
4-सुख-दुखों के प्रति समभाव रखते हुए नियत कर्म अर्थात् युद्ध करो।
स्पष्ट है कि उक्त से यही निष्कर्ष निकलता है कि सुख दुःखों के प्रति समभाव रखते हुए नियत कर्म करने का प्रयास ही अपेक्षित है। श्रीकृष्ण की यह अपेक्षा नहीं है कोई दुःखों से मुक्ति के लिए मोक्ष साधना करे या सुखों से जुड़ने के लिए भगवत् दर्शन की साधना करे अथवा सुख-दुखों के प्रति उदासीनता की स्थिति में जाने की साधना करे-
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि?
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय-2, श्लोक-38।।
उक्त से सुस्पष्ट है कि श्रीकृष्ण ने किसी को भी न तो दुःखों से मुक्ति हेतु मोक्ष साधना करने का परामर्श दिया है न किसी को अक्षुण्ण सुख या आनन्द से जुड़ने हेतु भगवत् दर्शन की साधना का परामर्श दिया न ही सुख-दुखों के प्रति उदासीन रहने की साधना का परामर्श दिया अपितु उनका परामर्श है कि लोग मोक्ष प्राप्ति हेतु, भगवत् दर्शन हेतु या उदासीन रहने हेतु साधनाएं न करें अपितु इनके अर्थात् सुख-दुखों के प्रति समभाव रखते हुए युद्ध अर्थात् नियतकर्म करें। नियत कर्म की ओर उन्मुख होने के लिए आवश्यक साधनाएं करें।
स्पष्ट है कि उक्त श्लोक में जो बातें कही गई हैं और श्रीमद्भगवद्गीता में अन्य स्थानों पर जो बातें कही गई हैं उनका यह अर्थ है कि श्रीकृष्ण ने भले ही मोक्ष के उपाय समझाया है, भले ही सुख-दुखों के प्रति उदासीन रहने का उपाय समझाया है या भले ही भगवत् दर्शन के उपाय समझाया है और इनकी फलश्रुतियों को भी समझाया है किन्तु इनके लिए जो उपाय समझाया है उन्हें करने की अपेक्षा नहीं की है न परामर्श दिया है हां यदि किसी की अभिलाषा है कि वह मोक्ष प्राप्ति हेतु साधना करे, उदासीन रहने की साधना करे या भगवत् दर्शन की प्राप्ति हेतु साधना करे तो उसके लिए श्रीकृष्ण ने उपाय समझाया है जबकि उक्त श्लोक में वह नियत कर्म करने का परामर्श देते हुए नियत कर्म करने का उपाय भी समझाते हैं इसके साथ ही नियत कर्म कर पाने या न कर पाने की फलश्रुतियां भी समझाते हैं जिन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 33-37 में देखा जा सकता है।
उपाय समझाना परामर्श नहीं - ऐसे में यह समझ कदापि उचित नहीं कि श्रीकृष्ण किसी को मोक्ष प्राप्त करने हेतु साधना या भगवत् दर्शन हेतु साधना करने का परामर्श देते हैं। वास्तविकता तो यह है कि उपाय समझाना और उपाय के अनुसार कार्य करने का परामर्श देना दोनों अलग-अलग हैं। दोनों को एक समझना ही त्रुटिपूर्ण सोच है क्योंकि उपाय के अनुसार कार्य करना या न करना उपाय समझने वाले की इच्छा पर निर्भर है किन्तु परामर्श के अनुसार कार्य कराने की सोच रखना तो अपेक्षा है और इस परामर्श के आधार पर कार्य करना ऐच्छिक नहीं अपितु बाध्यता होती है। अपेक्षित परामर्श के अनुसार कार्य करना तो परामर्श देने वाले की अपेक्षा या वचन का पालन करना होता है। इस प्रकार जो लोग मोक्ष साधना या भक्ति साधना को श्रीकृष्ण की अपेक्षा समझ रहे क्योंकि श्रीकृष्ण ने इनके लिए उपाय समझाया है वे लोग श्रीकृष्ण की उस अपेक्षा को नहीं समझ पा रहे हैं जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 38 में व्यक्त किया गया है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण से प्रार्थना है कि वह हमें सद्बुद्धि दें ताकि हम उनके परामर्श को समझ सकें।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव, उत्तर प्रदेश शासन हैं।)