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महंगाई पर नियंत्रण भी जरूरी

प्रकाशित: 04-09-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
महंगाई पर नियंत्रण भी जरूरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के उनके समकक्ष बार्ट डी बेवर के बीच लम्बी बातचीत के बाद दोनों देशों ने बृहस्पतिवार को व्यापार, रक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, स्वच्छ ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में आगे सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। महत्वपूर्ण बात यह हुई कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछली तिमाही में भारत द्वारा 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर का विशेष उल्लेख किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इस वृद्धि दर को बड़ी उपलब्धि बताया और कहा कि देश की आर्थिक प्रगति दुनिया के लिए विश्वास और नए अवसरों का स्त्रोत है। भारत की वृद्धि दर पर प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर निश्चित रूप विश्लेषण आवश्यक है। यह सच है कि जब दुनिया भर में उथल-पुथल मची है, ऊर्जा संकट छाया हुआ है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ टेरर से मंदी की आहट साफ सुनाई पड़ रही हो, ऐसे में यदि भारत की पिछली तिमाही में वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई हो तो निश्चित तौर पर देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है। किन्तु आंकड़ें पर ही बात करें तो अच्छी एवं सुदृढ़ अर्थव्यवस्था वह मानी जाती है जिसमें मुद्रास्फीति महंगाई दर वृद्धि दर से ठीक आधी या आधी से भी कम हो। किन्तु भारत में समग्र मुद्रास्फीति दर 4.45 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्र में यह दर 4.84 प्रतिशत है तो शहरी क्षेत्र में 3.96 प्रतिशत है। यहां तक तो माना जा सकता है कि सैद्धांतिक रूप से भारतीय आर्थिक व्यवस्था बहुत ही अच्छी है। किन्तु खाद्य मुद्रास्फीति दर 5.52 प्रतिशत है और यही आम आदमी के जीवन पर प्रभाव डालती है। भारत में चीनी आयात से भी आर्थिक बोझ बढ़ा है। सरकार की मजबूरी है कि वह कृषि उपज के आंकड़े पिछले साल से कम देखना चाहती नहीं और नौकरशाही से ग्रस्त अर्थनीति इसी वजह से प्रभावित होती है। कृषि मंत्रालय के अधिकारी ही उपज का आकलन करके सरकार को इस खुशफहमी में डाल देते हैं कि गन्ने, दलहन और तिलहन की बम्पर उपज होने वाली है और जब सरकार चीनी, दाल और खाद्य तेलों का निर्यात करने का लक्ष्य निर्धारित कर देती है तब भी ये अधिकारी चुप्पी साधे रहते हैं किन्तु जब निर्यात के बाद चीनी, दाल और तेल का बाजार में टोटा होता है तो सरकार न सिर्फ निर्यात पर प्रतिबंध लगाने पर मजबूर होती, बल्कि आयात करने पर विवश भी होती है। यह खाद्य मुद्रास्फीति 5.52 प्रतिशत तक पहुंची है, इसका कारण मात्र यही है कि सरकार आंख मूंदकर अधिकारियों के आकलन पर भरोसा करती है। सरकार को खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रयास करना चाहिए। यह तभी संभव है जब सरकार निष्पक्ष एजेंसियों से व्यापक स्तर पर डेटा संग्रह करवाए और निष्पक्ष रूप से विश्लेषण की व्यवस्था करे। भारत में बहुत ज्यादा जनसंख्या है इसलिए खाद्य क्षेत्र में किसी भी गड़बड़ से अर्थव्यवस्था को चुनौती मिलना स्वाभाविक है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 7.8 प्रतिशत वृद्धि दर पर खुश होने का पूरा अधिकार है किन्तु उन्हें इस चुनौती को नजरंदाज नहीं करना चाहिए कि खाद्य मुद्रास्फीति खतरे की घंटी है। सच तो यही है कि आम आदमी के लिए वृद्धि दर में तेजी का लाभ तो तभी मिलेगा जब रोजगार पैदा हों और उस पर महंगाई का बोझ कम हो। इसलिए खुशफहमी के साथ-साथ सावधानी और सतर्कता भी आवश्यक है।