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मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता मिलावट तक सीमित नहीं

प्रकाशित: 04-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
भारत में स्कूली छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए मध्याह्न भोजन योजना देश की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक है। 15 अगस्त 1995 को केंद्र सरकार ने ‘नेशनल प्रोग्राम ऑफ न्यूट्रिशनल सपोर्ट टू प्राइमरी एजुकेशन' के रूप में इसकी शुरुआत की थी। वर्ष 2001 में सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्देश के बाद स्कूलों में सूखा राशन देने के स्थान पर बच्चों को पका हुआ गर्म भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था को अनिवार्य बनाया गया। दुर्भाग्यवश देश के अनेक हिस्सों से शिकायतें और घटनाएं सामने आती रही हैं जिनमें भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, मात्रा और सामग्री को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं। कहीं भोजन में कीड़े मिलने की शिकायत होती है, कहीं दूषित या खराब सामग्री के इस्तेमाल की बात सामने आती है और कहीं बच्चों के बीमार पड़ने की घटनाएं सामने आती हैं। सबसे गंभीर समस्या भोजन में मिलावट और खाद्य सुरक्षा की है। इन घटनाओं को केवल स्थानीय लापरवाही मानकर छोड़ देना उचित नहीं है। प्रत्येक ऐसी घटना की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि गलती खरीद प्रािढया में हुई, भंडारण में, खाना पकाने में या वितरण की निगरानी में। भोजन की गुणवत्ता की समस्या केवल मिलावट तक सीमित नहीं है। कई स्थानों पर निर्धारित मेन्यू और पोषण मानकों के अनुरूप भोजन नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आती हैं। बच्चों को पर्याप्त मात्रा में दाल, सब्जी, अनाज और अन्य निर्धारित खाद्य पदार्थ मिलने चाहिए, लेकिन कहीं पतली दाल, कम मात्रा की सब्जी, अपर्याप्त भोजन या खराब तरीके से पकाया गया खाना मिलने की शिकायत होती है। यदि भोजन केवल पेट भरने तक सीमित हो जाए और उसमें आवश्यक प्रोटीन, ऊर्जा, सूक्ष्म पोषक तत्व और विविधता न हो तो योजना अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है। मध्याह्न भोजन व्यवस्था में भ्रष्टाचार की संभावना को भी गंभीरता से लेना होगा। जहां भोजन की मात्रा और गुणवत्ता का रिकॉर्ड कागज पर दर्ज होता है, वहां वास्तविकता और सरकारी रिकॉर्ड के बीच अंतर की संभावना रहती है। यदि किसी स्कूल में जितने बच्चों को भोजन दिया गया, उससे अधिक संख्या कागजों में दर्ज की जाती है तो यह सीधे सार्वजनिक धन और बच्चों के अधिकार से जुड़ा मामला है। इसलिए केवल रजिस्टर और कागजी रिपोर्ट के आधार पर योजना की सफलता का आकलन नहीं किया जाना चाहिए। वास्तविक समय में बच्चों की संख्या, भोजन की मात्रा, सामग्री की खरीद और वितरण की डिजिटल निगरानी आवश्यक है। इस व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी बुनियादी ढांचे की भी है। आज भी सभी स्कूलों में आधुनिक और स्वच्छ रसोईघर, सुरक्षित पानी, गैस आधारित खाना पकाने की व्यवस्था, खाद्य भंडारण की पर्याप्त जगह और साफ-सफाई की उचित सुविधा समान रूप से उपलब्ध नहीं है। जहां खाना खुले या अस्वच्छ स्थानों में पकाया जाता है, वहां धूल, कीड़े-मकौड़े और दूषण का खतरा बढ़ जाता है। भोजन बनाने वाले स्थान को किसी भी हालत में स्कूल की ऐसी जगह नहीं होना चाहिए जहां स्वच्छता के मानकों का पालन संभव न हो।
डिजिटल तकनीक का उपयोग भी इस योजना में क्रांतिकारी सुधार ला सकता है। प्रत्येक स्कूल के लिए डिजिटल स्टॉक रजिस्टर बनाया जा सकता है। कितनी सामग्री खरीदी गई, कब पहुंची, कितने बच्चों को भोजन दिया गया और कितनी सामग्री र्द्व-इट्ट सभी का रिकॉर्ड डिजिटल रूप में रखा जाए। जहां संभव हो वहां फोटो या अन्य प्रमाण के साथ दैनिक रिपोर्टिंग की जाए। हालांकि डिजिटल व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें शिक्षक पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और वास्तविक काम के स्थान पर केवल ऑनलाइन कागजी कार्रवाई न बढ़ जाए।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।