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6 महीने बाद फिर धधका ईरान मोर्चा: अमेरिका के लिए निर्णायक लड़ाई या लंबी जंग?

प्रकाशित: 04-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रशांत कुमार
वॉशिंगटन और तेहरान के बीच कुछ हफ्तों की अपेक्षाकृत शांति के बाद फिर मिसाइलों और ड्रोन की आवाज सुनाई दे रही है। अमेरिकी हमले ईरान की सैन्य और समुद्री क्षमताओं को कमजोर करने पर केंद्रित हैं, जबकि तेहरान ने जवाबी कार्रवाई का दायरा अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों तक बढ़ा दिया है। सवाल अब यह नहीं कि युद्ध फिर शुरू हुआ है या नहीं, बल्कि यह है कि इसका अंत किस रास्ते से होगा?
छह महीने पहले शुरू हुआ अमेरिका-ईरान संघर्ष अब उस मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सैन्य शक्ति के बावजूद निर्णायक जीत दूर दिखाई दे रही है। कुछ समय की शांति ने यह उम्मीद जरूर जगाई थी कि दोनों पक्ष किसी समझौते की ओर बढ़ सकते हैं, लेकिन ताजा अमेरिकी हमलों ने उस संभावना को फिलहाल पीछे धकेल दिया है।
अमेरिकी सेना ने ईरान में रिवोल्यूशनरी गार्ड के एयर डिफेंस सिस्टम, रडार, समुद्री क्षमताओं, माइन बिछाने की क्षमता और संचार प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। अमेरिका का तर्क है कि ये हमले होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों और अमेरिकी सैन्य बलों पर हमलों की ईरानी कोशिशों के जवाब में किए गए हैं।
लेकिन युद्ध का दूसरा पक्ष इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। ईरान ने अमेरिकी हमलों के जवाब में जॉर्डन, बहरीन, कुवैत और इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र में अमेरिकी या अमेरिका से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है। कुछ हमलों की स्थानीय अधिकारियों ने पुष्टि की है, जबकि ईरान के कई सैन्य दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
इसका अर्थ साफ है- संघर्ष फिर उसी दौर में लौट रहा है, जिसमें एक पक्ष का हमला दूसरे की जवाबी कार्रवाई को जन्म देता है और फिर जवाब के जवाब में और बड़ा हमला होता है। किसी भी युद्ध को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि छह महीने बाद दोनों पक्ष अपनी शुरुआती रणनीतिक मंजिल के कितने करीब हैं। अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया है। ईरान की एयर डिफेंस, मिसाइल ढांचे, सैन्य कमांड और समुद्री निगरानी क्षमताओं पर लगातार हमले हुए हैं, लेकिन छह महीने की बमबारी के बाद भी तेहरान के पास जवाबी हमला करने की क्षमता बनी हुई है। खबरों के मुताबिक, जंग एक महंगे गतिरोध में बदल गया है- ईरान कमजोर हुआ है, लेकिन उसने आत्मसमर्पण नहीं किया और होर्मुज को अब भी रणनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। यही इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना है। अमेरिका ईरान को इतना कमजोर करना चाहता है कि वह अपनी शर्तें स्वीकार कर ले, जबकि ईरान इतना कमजोर होने के बावजूद संघर्ष जारी रखने की क्षमता बनाए रखना चाहता है। इस अंतर ने जंग को निर्णायक जीत के बजाय क्षरण की लड़ाई में बदल दिया है।
इस संघर्ष का केंद्र सिर्फ ईरान की जमीन नहीं है। असली रणनीतिक दबाव होर्मुज जलडमरूमध्य पर है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। युद्ध के दौरान यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है और हाल के दिनों में सऊदी तेल ले जा रहे दो सुपरटैंकरों पर हमलों ने जोखिम को फिर बढ़ा दिया है। यही कारण है कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का एक बड़ा हिस्सा ईरान की समुद्री निगरानी, माइन बिछाने की क्षमता और तटीय सैन्य ढांचे को निशाना बना रहा है। ईरान के लिए होर्मुज सिर्फ समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि रणनीतिक फायदा है। अगर वह अमेरिका को सीधे सैन्य युद्ध में निर्णायक रूप से नहीं हरा सकता, तो वह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के जोखिम को बढ़ाकर अमेरिका और उसके सहयोगियों पर आर्थिक दबाव डाल सकता है। लेकिन यही रणनीति ईरान के लिए भी जोखिम भरी है। खाड़ी के अरब देश खुद को युद्ध का पक्षकार नहीं बनाना चाहते। अगर उनके बंदरगाह, तेल प्रतिष्ठान या समुद्री रास्ते निशाना बनते हैं, तो वे ईरान से और दूर तथा अमेरिका के और करीब जा सकते हैं।
अमेरिका के पास सैन्य शक्ति में भारी बढ़त है, लेकिन सैन्य श्रेष्ठता और राजनीतिक जीत एक ही चीज नहीं हैं। ईरान बड़ा देश है, उसका भूगोल कठिन है और उसकी सैन्य रणनीति केवल पारंपरिक युद्ध पर निर्भर नहीं करती। मिसाइल, ड्रोन, समुद्री हमले और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए वह अमेरिका के लिए संघर्ष की लागत बढ़ा सकता है। यही वजह है कि छह महीने बाद अमेरिका के सामने मूल प्रश्न अब भी कायम है- ईरान को कितना कमजोर करना पर्याप्त होगा?
अगर लक्ष्य केवल मिसाइल और एयर डिफेंस क्षमता को नुकसान पहुंचाना है, तो सैन्य अभियान सीमित रखा जा सकता है। अगर लक्ष्य ईरानी नेतृत्व को रणनीतिक रियायतों के लिए मजबूर करना या शासन परिवर्तन तक पहुंचना है, तो मौजूदा अभियान पर्याप्त नहीं होगा।
और यहीं से लंबी जंग का खतरा पैदा होता है। अमेरिका जितना ज्यादा दबाव बढ़ाएगा, ईरान के लिए पीछे हटना उतना ही राजनीतिक रूप से कठिन होगा। ईरान अगर हर हमले का जवाब देता है तो अमेरिका के पास फिर से कार्रवाई करने का कारण होगा।
इस संघर्ष की सबसे असहज स्थिति में वे देश हैं, जो अमेरिका के सहयोगी हैं, लेकिन ईरान के पड़ोसी भी। बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य सुविधाएं ईरान के लिए संभावित लक्ष्य बन गई हैं। ईरान का संदेश साफ है कि अगर अमेरिका उसके खिलाफ इन देशों की जमीन या सैन्य ढांचे का इस्तेमाल करता है, तो वे देश संघर्ष से पूरी तरह बाहर नहीं रह पाएंगे। हालिया हमलों में जॉर्डन, बहरीन और कुवैत के साथ इराकी कुर्दिस्तान का नाम सामने आना इसी व्यापक जोखिम को दिखाता है। लेकिन इसका एक दूसरा परिणाम भी हो सकता है।
खाड़ी के देश अब अमेरिकी सुरक्षा छतरी की विश्वसनीयता और अपनी स्वतंत्र सुरक्षा नीति- दोनों पर नए सिरे से विचार कर सकते हैं। युद्ध के छह महीनों में क्षेत्रीय देशों ने यह भी महसूस किया है कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी सुरक्षा देती है, लेकिन उसी मौजूदगी के कारण वे प्रतिशोध के निशाने पर भी आ सकते हैं। होर्मुज में तनाव का असर मध्य पूर्व की सीमाओं से बहुत दूर तक जाता है।
वैश्विक तेल व्यापार में किसी भी लंबे व्यवधान का सीधा असर कीमतों, शिपिंग बीमा और परिवहन लागत पर पड़ता है। ताजा संघर्ष के बाद कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी देखी गई है।
भारत के लिए यह विशेष चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। अगर तेल महंगा होता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं पड़ता। परिवहन, उर्वरक, रसायन, विमानन और उद्योग की लागत भी प्रभावित होती है। लंबे समय तक महंगा तेल महंगाई के दबाव को बढ़ा सकता है और चालू खाते पर भी असर डाल सकता है। इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार रहते हैं। संघर्ष अगर और फैला तो उनकी सुरक्षा, हवाई संपर्क और रोजगार पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए यह केवल पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक संकट नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का भी सवाल है।
अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। इतिहास बताता है कि गंभीर सैन्य संघर्षों के बीच भी बातचीत के रास्ते खुले रह सकते हैं। समस्या यह है कि दोनों पक्ष इस समय ऐसी बातचीत में जाने से बच रहे हैं जिसमें उन्हें कमजोरी स्वीकार करने का आभास हो। अमेरिका सैन्य और आर्थिक दबाव को अपनी ताकत मानता है। ईरान मानता है कि समय उसके पक्ष में जा सकता है, क्योंकि लंबी लड़ाई अमेरिका और उसके सहयोगियों की राजनीतिक और आर्थिक लागत बढ़ाती है। छह महीने बाद दोनों पक्षों की यही धारणाएं युद्ध को खत्म करने की बजाय उसे लंबा कर रही हैं। यही कारण है कि फिलहाल सबसे संभावित भविष्य कोई निर्णायक शांति समझौता नहीं, बल्कियुद्ध और बातचीत के बीच झूलता हुआ अस्थिर संतुलनदिखाई देता है।
ताजा अमेरिकी हमले निश्चित रूप से युद्ध के एक नए चरण का संकेत हैं, लेकिन इन्हें निर्णायक मोड़ कहना अभी जल्दबाजी होगी। अगर अमेरिकी हमले ईरान की समुद्री और सैन्य क्षमता को इतनी क्षति पहुंचाते हैं कि वो होर्मुज में दबाव बनाए रखने में असमर्थ हो जाए, तो अमेरिका बातचीत की बेहतर स्थिति में आ सकता है। लेकिन अगर ईरान जवाबी हमलों का दायरा बढ़ाता रहा, तो अमेरिका को और सैन्य कार्रवाई करनी पड़ेगी और संघर्ष फिर व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की ओर जा सकता है। सबसे बड़ा खतरा यही है कि दोनों पक्ष जीत की अपनी परिभाषा बदलते रहें।
अमेरिका कहे कि ईरान को कमजोर कर दिया गया, ईरान कहे कि वह अभी भी लड़ रहा है, फिर दोनों अपने-अपने दावों को साबित करने के लिए अगला हमला करें। ऐसी स्थिति में युद्ध का अंत किसी बड़ी जीत से नहीं, बल्कि थकान से होगा। छह महीने बाद सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है किईरान निर्णायक रूप से पराजित नहीं हुआ है, अमेरिका निर्णायक राजनीतिक समाधान हासिल नहीं कर पाया है और क्षेत्रीय देश इस संघर्ष को अपने घरों तक पहुंचने से रोक नहीं पा रहे हैं। इसलिए ताजा हमले युद्ध का अंत नहीं, बल्कि उसके अगले अध्याय की शुरुआत ज्यादा लगते हैं। और इस अध्याय का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अगला अमेरिकी हमला कितना बड़ा होगा या ईरान कितनी मिसाइलें दागेगा। सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष उस बिंदु तक पहुंचने से पहले बातचीत की मेज पर लौटेंगे, जहां सैन्य जीत की कीमत राजनीतिक और आर्थिक हार से भी ज्यादा हो जाए?
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)